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This Article is From Aug 18, 2025

बांग्लादेश में हुआ जन्म, एक्टिंग देख नहीं रोक पाता कोई भी हंसी, जानें कैसी शख्सियत थे उत्पल दत्त

ड़ी-बड़ी आंखें, घनी मूंछें और गंभीर आवाज, इन खूबियों ने उत्पल दत्त को पर्दे पर एक खतरनाक खलनायक जैसा लुक दिया, लेकिन जैसे ही वह अपने संवाद बोलते, दर्शकों की हंसी छूट जाती.

बांग्लादेश में हुआ जन्म, एक्टिंग देख नहीं रोक पाता कोई भी हंसी, जानें कैसी शख्सियत थे उत्पल दत्त
बांग्लादेश में हुआ जन्म, एक्टिंग देख नहीं रोक पाता कोई भी हंसी
नई दिल्ली:

बड़ी-बड़ी आंखें, घनी मूंछें और गंभीर आवाज, इन खूबियों ने उत्पल दत्त को पर्दे पर एक खतरनाक खलनायक जैसा लुक दिया, लेकिन जैसे ही वह अपने संवाद बोलते, दर्शकों की हंसी छूट जाती. उत्पल दत्त, एक ऐसा नाम, जो अभिनय की गंभीरता में हास्य का रस भरना जानते थे. 19 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि है. दत्त ने अभिनय दिल से किया, ऐसे में हर किरदार में जादू भरने वाले 'अच्छा...' को अभिनय का जादूगर कहें तो कोई गलती नहीं होगी. उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च 1929 को बांग्लादेश के बारिसाल में हुआ था. पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने थिएटर की दुनिया में कदम रख दिया था. उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों में अंग्रेजी में अभिनय किया और बाद में बंगाली थिएटर के स्तंभ बन गए. उनकी पहली बंगाली फिल्म 'माइकल मधुसूदन' थी, जो साल 1950 में आई थी.

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हिंदी सिनेमा में दत्त ने कम और यादगार फिल्में कीं. ‘गोलमाल' (1979) में 'भावुक और अनुशासनप्रिय' भास्कर शंकराचार्य की भूमिका आज भी क्लासिक मानी जाती है. इसके अलावा ‘नरम गरम', ‘शौकीन', ‘किसी से न कहना', और ‘अंगूर' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसी से लोटपोट कर दिया. एक दिलचस्प तथ्य यह है कि उत्पल दत्त की शुरुआत एक गंभीर थिएटर कलाकार के रूप में हुई थी और उन्हें खूब पसंद किया जाता था. लेकिन, जब उन्होंने कॉमेडी की, तो दर्शकों को उनका दूसरा रूप भी बेहद पसंद आया. दत्त वह अभिनेता थे, जो एक ही फ्रेम में डर भी पैदा कर सकते थे और हंसी भी. उनकी आवाज और एक्सप्रेशन इतने प्रभावशाली थे कि बिना कुछ बोले ही सीन में छा जाते थे. दत्त ने एक इंटरव्यू में खुद स्वीकारा था, “कॉमेडी करना आसान नहीं, लेकिन अगर आप किरदार को पूरी तरह समझ लें, तो हर हाव-भाव में हंसी होती है.”

उनकी कुछ फिल्मों और निभाए यादगार किरदारों पर नजर डालें तो उसमें ‘गोलमाल' है, जो उत्पल दत्त के करियर की सबसे शानदार फिल्मों में से एक है, जिसका निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था. साल 1979 में रिलीज हुई फिल्म 'भवानी' (उत्पल दत्त) और राम प्रसाद (अमोल पालेकर) नाम के दो किरदारों की कहानी को पर्दे पर उतारती है. भवानी अमीर है, लेकिन उसे ऐसे लड़कों से नफरत है, जो आधुनिक तरीके से जीते हैं और अय्याशी करते हैं. इस फिल्म के जरिए दत्त ने दर्शकों को हंसाया. अमोल पालेकर फिल्म में दोहरी भूमिका में नजर आए थे. फिल्म में बिंदिया गोस्वामी भी मुख्य भूमिका में दिखीं.

उत्पल दत्त की फिल्म ‘शौकीन' साल 1982 में आई थी, जिसे बासु चटर्जी ने निर्देशित किया था. 'शौकीन' तीन ऐसे बुजुर्गों की कहानी है, जिनकी कमजोरी महिलाएं रहती हैं और इसी घेरे में वे खूब हंसाते हैं. फिल्म में उत्पल दत्त के साथ अशोक कुमार, एके हंगल, मिथुन चक्रवर्ती और रति अग्निहोत्री मुख्य भूमिकाओं में हैं.

उत्पल दत्त ने ‘कैलाश पति' के किरदार संग भी दर्शकों का खूब मनोरंजन किया. ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘किसी से ना कहना' 1983 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म में दत्त ने एक ऐसे पिता का किरदार निभाया था, जो बेटे की शादी किसी ऐसी लड़की से करवाना चाहता है, जो अनपढ़ हो और जिसे अंग्रेजी न आती हो, लेकिन लड़के (फारुख शेख) को पढ़ी-लिखी लड़की रमोला (दीप्ति नवल) से प्यार हो जाता है. फिल्म में कई मजेदार घटनाएं घटती हैं.

बात उत्पल दत्त और कॉमेडी की हो तो फिर साल 1981 में रिलीज हुई ‘नरम गरम' को कैसे भूला जा सकता है. फिल्म कुसुम (स्वरूप संपत) और उसके पिता विष्णु प्रसाद (एके हंगल) की कहानी है, जो स्थानीय साहूकार से कर्ज न चुका पाने के कारण बेघर हो जाते हैं और उनकी मदद रामप्रसाद (अमोल पालेकर) करता है, जो कुसुम से प्यार करता है. फिल्म में उत्पल दत्त ने एक बूढ़े जमींदार का किरदार निभाया था. फिल्म में उनकी कॉमिक टाइमिंग को खूब पसंद किया गया.

विलियम शेक्सपियर के नाटक 'ए कॉमेडी ऑफ एरर्स' से प्रेरित फिल्म 'अंगूर' साल 1982 में रिलीज हुई थी, जिसमें उत्पल दत्त ने संजीव कुमार और देवेन वर्मा के साथ खूब हंसाया था. फिल्म में संजीव कुमार और देवेन वर्मा दोहरी भूमिका में रहते हैं और दत्त ने उनके पिता का रोल प्ले किया था. जुड़वा बच्चों की कहानी को दिखाती फिल्म का निर्देशन मशहूर गीतकार गुलजार ने किया था.

उत्पल दत्त न केवल अभिनेता थे, बल्कि एक क्रांतिकारी विचारक और लेखक भी थे. उन्होंने कई नाटक लिखे, जो राजनीति, समाज और व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते थे. उन्होंने 1949 में 'लिटिल थिएटर ग्रुप' की स्थापना की. बंगाल में उन्हें ‘नाटककारों का गांधी' कहा जाता था. उनके नाटक ‘टीनेर तलवार' और ‘बरे बांगाली' आज भी थिएटर प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं.

उत्पल केवल बेहतरीन कलाकार ही नहीं बल्कि आंदोलनकारी भी थे. देश में जब इमरजेंसी लगी, तो उत्पल दत्त ने इसका रचनात्मक विरोध किया. इमरजेंसी के खिलाफ उन्होंने उस वक्त तीन नाटक ‘बैरीकेड', ‘सिटी ऑफ नाइटमेयर्स' और ‘इंटर द किंग' लिखे. सरकार ने उनके इन तीनों नाटकों को बैन कर दिया, लेकिन, जहां भी यह नाटक हुए, लोगों ने खूब पसंद किया. उत्पल दत्त का निधन 19 अगस्त 1993 को हुआ था. 

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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