परिसीमन का विरोध कर अपना ही नुकसान तो नहीं कर रहे हैं दक्षिण के राज्य? क्या है संवैधानिक व्यवस्था

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पंकज कुमार कपाड़िया

पिछले 12 साल में यह पहली बार है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से लाया गया कोई संविधान संशोधन विधेयक सदन में गिर गया हो. महिला आरक्षण के लिए संसदीय लोकसभा क्षेत्रों की संख्या फिर से निर्धारित करने के लिए लाया जा रहा परिसीमन विधेयक भी इसके साथ जुड़ा हुआ था. सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक भी इन दोनों विधेयकों के साथ पेश किया था.इस विधेयक का मक़सद केंद्र शासित प्रदेशों के निर्वाचन‑क़ानून व आरक्षण‑व्यवस्था को नए परिसीमन और लोकसभा‑विस्तार  से जोड़ना था. 

क्या परिसीमन करना अनिवार्य है

संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 जनगणना के बाद परिसीमन अनिवार्य करता है. अनुच्छेद 81- लोकसभा की संरचना (Composition of the House of the People) यह अनुच्छेद लोकसभा (निम्न सदन) के गठन के नियमों को परिभाषित करता है. सदस्य संख्या- राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा निर्वाचित अधिकतम 530 सदस्य और केंद्र शासित प्रदेशों से अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं. प्रतिनिधित्व- प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आवंटित की जाती हैं, ताकि सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व मिले. क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र- प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में इस तरह विभाजित किया जाता है कि हर निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसे आवंटित सीटों का अनुपात पूरे राज्य में समान हो.

अनुच्छेद 82- प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्व्यवस्थापन (Readjustment after each census) यह अनुच्छेद यह सुनिश्चित करता है कि लोकसभा में प्रतिनिधित्व समय के साथ बदलती जनसंख्या के अनुरूप रहे. इस अनुच्छेद का आधार भारत में 'एक वोट, एक मूल्य' का सिद्धांत है. संविधान सभा ने इस सिद्धांत की स्थापना की, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के वोट का समान मूल्य है.

परिसीमन की भूमिका- संविधान परिसीमन आयोग को सीटों और सीमाओं की संख्या को समायोजित करने का दायित्व देता है. जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि प्रत्येक सीट लगभग समान संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करती है, जो इस सिद्धांत को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है.

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यह प्रक्रिया एक संतुलित और समावेशी लोकतांत्रिक ढांचे को बनाए रखने में सहायक है. परिसीमन आयोग हर जनगणना पूरी होने के बाद, संसद द्वारा निर्धारित एक प्राधिकरण (आमतौर पर परिसीमन आयोग) द्वारा राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण और निर्वाचन क्षेत्रों का सीमांकन किया जाता है.

कबसे फ्रीज है लोकसभा में सीटों की संख्या

परिसीमन की इस प्रक्रिया को 84वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक के लिए स्थगित कर दिया गया है. भारत में  इंदिरा गांधी के शासनकाल में 1976 में सीटों का पुनर्वितरण रोक दिया गया था. अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में संसद में सीटों की वर्तमान संख्या को 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया था. अतः  लगभग 15 सालों से यह सर्वविदित है कि 2026 की तारीख परिसीमन के लिए तय है. इसके अलावा इस प्रक्रिया का निर्णय 
न तो कोई राजनीतिक दल और न ही 'उत्तर भारतीय' करते हैं, परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है. सत्ता में जो भी हो, उसे इसे लागू करना संवैधानिक जिम्मेदारी होगी. इससे पहले 2008 में मनमोहन सिंह की सरकार में परिसीमन हुआ था.

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महिला आरक्षण विधेयक 2023 में पारित हुआ था, लेकिन इसे लागू करने के लिए अनुच्छेद 334ए के माध्यम से परिसीमन अनिवार्य है. मोदी सरकार ने दक्षिणी राज्यों की सुरक्षा के लिए लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने हेतु एक नया संवैधानिक संशोधन प्रस्तावित किया. इसमें सीटों की संख्या, जनसंख्या के आधार पर न बढ़ाकर वर्तमान अनुपात में ही वृद्धि का प्रस्ताव रखा है. जैसे, आज 543 में से यूपी की 80 सीटें हैं. परिसीमन में 50 फीसदी सीटें बढ़ने के बाद यूपी की सीटों की संख्या 120 हो जाएगी. वहीं केरल की आज 543 में से 20 सीट हैं. परिसीमन के बाद केरल की सीटों की संख्या 30 सीट हो जाएगी. लेकिन इसका विरोध हुआ, मुख्य रूप से डीएमके की ओर से. इसलिए कोई विधेयक पारित नहीं किया जा सका. संवैधानिक अनिवार्यता के कारण परिसीमन और आरक्षण दोनों अंततः लागू होंगे.लेकिन अब यह परिसीमन संभवतः अनुच्छेद 81 और 82 के अनुसार होगा. इसमें जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण होगा. इसमें दक्षिणी राज्यों को सीटों का नुकसान हो सकता है. तमिलनाडु इससे सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से एक होगा. इसका कारण दक्षिण के बजाए उत्तर के राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है. भारत में लोकसभा सीटों की संख्या जनसंख्या पर आधारित है. यदि राजनीतिक नजरिये से देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि डीएमके ने दक्षिण के राज्यों को गुमराह करने का काम किया. दूसरी तरफ़ बीजेपी को यह कहने का मौक़ा मिल जाएगा,''हमने सभी राज्यों की सुरक्षा का प्रयास किया, लेकिन विपक्ष ने इसे रोक दिया.'' लेकिन इसके  दूरगामी राजनीतिक परिणाम होंगे. उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच दूरिया बढ़ेंगी और यह राष्ट्रीय एकता और भाईचारे के रास्ते में बाधक बन सकता है. 

विपक्ष का विरोध तार्किक और संवैधानिक नहीं

महिला आरक्षण विधेयक के अंदर अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण का प्रावधान है, क्योंकि इसकी व्यवस्था संविधान में है. जबकि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण की मांग करना ग़ैर संवैधानिक है. संविधान में  धर्म के आधार पर आरक्षण की बात नहीं करता. धर्म के आधार पर राजनीतिक आरक्षण की बात कर विपक्ष ने देश में एक नए तरह के विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा देने का काम कर रही है. इसी तरह ओबीसी महिलाओं की राजनीतिक आरक्षण का प्रावधान भी संविधान में वर्णित नहीं है. तो क्या विपक्ष जानबूझ कर ग़ैर संवैधानिक आरक्षण की मांग कर एक प्रगतिशील महिला आरक्षण बिल, जिससे वास्तव में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विस्तार की संभावना को सीमित करने का काम किया है!

जहां तक ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल है तो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले राजनीतिक दल अपने पार्टी में इस तबके के महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें किसी किसी भी तरह की आरक्षण बिल की ज़रूरत नहीं है. इसके विपरीत यदि वर्तमान में इन राजनीतिक पार्टियों के मौजूदा प्रतिनिधित्व को देखें तो यह दल भी अपने यहां ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर उदासीन हैं. 

क्या विपक्ष ने लोगों को गुमराह किया

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में यह तर्क देना चाहा कि 2023 वाले विधेयक को लागू कीजिए. उसमें यदि थोड़ा संशोधन करना पड़े तो भी कीजिए. पत्रकारों के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि 543 में से ही 33 फीसदी आरक्षण देने की बात थी. यह सही नहीं लगता है, 2023 में पारित विधेयक और गज़ट में ये स्पष्ट है कि आरक्षण 2029 से लागू होगा और ये परिसीमन के बाद तय होगा. प्रियंका गांधी का ये भ्रम फैलाने और गुमराह करने की राजनीति है.

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टीएमसी सांसद तो मौजूदा सीटों में 50 फीसदी आरक्षण लागू करने की बेतर्क वाली बातें कर रहे हैं. वस्तुत: सभी पार्टियों का लब्बोलुबाब ये है कि हर कोई महिला आरक्षण के पक्ष में खड़ा प्रतीत होना चाहता है. लेकिन अपने किंतु-परंतु के साथ इसी राह में बाधा उत्पन्न कर रहा है. सबको भय है की बीजेपी को इसका राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा. मेरे विचार से बीजेपी को  राजनैतिक फ़ायदा तो इस विरोध का भी मिलेगा.

महिला आरक्षण की वास्तविक चुनौती क्या है

महिला सशक्तिकरण सिर्फ आरक्षण देने से नहीं होगा. वर्तमान राजनीति में पुरुषों में वंशवाद से प्रेरित यदि 25 फीसदी लोग हैं तो महिलाओं में ये 50 फीसदी से अधिक है. चर्चित पंचायत सीरीज के माध्यम से हम प्रधान-पति की प्रासंगिकता देख चुके हैं. महिला आरक्षण राजनैतिक परिवार की बहू बेटियों और पत्नियों तक सीमित ना होकर एक आम महिला जिसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनैतिक ना हो और महिला प्रतिनिधि केवल नाम के सांसद विधायक ना रहें ये वास्तविक चुनौती होगी. जैसे ओबीसी आरक्षण का फ़ायदा कुछ विशेष जातियों तक अधिक रहा, रोहिणी कमीशन के रिपोर्ट के मुताबिक ओबीसी वर्ग का एक बड़ा तबका आरक्षण के लाभ से वंचित है. ऐसी स्थिति में महिला आरक्षण भी विशेषकर राजनैतिक परिवारों की महिलाओं तक ना सीमित रहे, ये असल चुनौती होगी. इसमें सभी राजनीतिक दल के साथ-साथ आम जनता को भी इसमें सहभागिता देनी होगी. परंतु, इन सभी किंतु-परंतु के ऊपर उठ इस ऐतिहासिक विधेयक का पास होना आवश्यक है क्योंकि यह काफ़ी दिनों से लंबित है. यदि आज़ यह किसी कारणवश पास नहीं होता तो इतिहास के कालखंड में महिलाओं के साथ न्याय का भारतीय राज्य की प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न खड़े होंगे. 

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(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के भारतीय प्रद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) से स्नातक हैं और स्वतंत्र लेखन करते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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