चर्च-नेतृत्व बड़ी चतुराई से धर्मांतरित ईसाइयों के विकास की बात करता है. उन्हें हिंदू दलितों से जोड़ देता है. उनकी जड़ें और समस्या एक बताता है. यह सच है कि वे इन समुदायों की जातिवादी व्यवस्था से विद्रोह कर ईसाइयत में आए हैं, लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि उसके बाद उनका गैर-ईसाई दलितों के साथ कोई खास रिश्ता नहीं रहा. यहां तक कि उनकी पूजा-पद्धति, प्रतीक, रहन-सहन और जीवन जीने का ढंग सब बदल गया है. उनकी समस्याओं और तकलीफों को गैर-ईसाई दलितों के समान नहीं देखा जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया के पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि धर्मांतरण करने वाला व्यक्ति एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कानून के प्रावधानों का पात्र नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जिस मामले में फैसला सुनाया, वह आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है. दरअसल, पिछले साल आंध्र हाई कोर्ट में एक ईसाई पादरी की ओर से एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज कराए गए केस की वैधता पर सुनवाई हुई थी. इस मामले में अप्रैल 2025 में फैसला आया था.
किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिया यह फैसला
आनंद पॉल नाम का एक व्यक्ति, जो 10 साल से एक चर्च में पादरी के रूप में जुड़े थे, उन्होंने कुछ लोगों पर मारपीट करने और जातिसूचक गालियां देने का आरोप लगाते हुए एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई थी. उन्होंने आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी. यह मामला बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंच गया. 30 अप्रैल 2025 को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस हरिनाथ एन ने कहा कि ईसाई धर्म में जाति-व्यवस्था का कोई अस्तित्व नहीं है. अदालत ने फैसला सुनाया कि जैसे ही कोई व्यक्ति ईसाई धर्म में परिवर्तित होता है, उसी दिन वह अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय का सदस्य नहीं रह जाता. इसलिए, वह व्यक्ति एससी-एसटी एक्ट जैसे संरक्षण वाले कानून का सहारा नहीं ले सकता. इसी आधार पर अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया था.
आनंद पॉल ने आंध्र हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. 24 मार्च 2026 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के इस फैसले को सही ठहराते हुए बरकरार रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल प्रभाव से पूरी तरह खत्म हो जाता है.
एससी की सूची में कैसे शामिल होंगे दलित ईसाई
दरअसल सुप्रीम कोर्ट के फैसले में नया कुछ भी नहीं है, यह फैसला प्रेसिडेंशियल ऑर्डर 1950 के पैरा 3 पर आधारित है. यही देश का कानून है. अदालत का काम केवल कानून की व्याख्या करना है. जब तक 1950 के उस राष्ट्रपति आदेश में संशोधन नहीं किया जाता, जिसे नेहरू की कैबिनेट में पारित किया गया था या ईसाइयों और मुसलमानों को शामिल करने के लिए कोई नया कानून नहीं बनाया जाता, तब तक यह कानून बना रहेगा.
चर्च नेतृत्व दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल कराने के लिए भारत सरकार पर लगातार दबाव डालता रहा है. भारतीय चर्च नेतृत्व पिछले कई दशकों से अनुसूचित जातियों से ईसाइयत में दीक्षित होने वालों के लिए हिंदू मूल के अनुसूचित जातियों के समान ही सुविधाओं की मांग करता आ रहा है. इसलिए कि धर्म बदलते ही अनुसूचित जाति वालों की वे तमाम सुविधाएं खत्म हो जाती हैं जो उन्हें हिंदू रहते हुए उपलब्ध होती हैं. इस कारण अनुसूचित जातियों से ईसाइयत में दीक्षित होने वालों की संख्या उनकी आबादी के हिसाब से आदिवासी समूहों के मुकाबले बहुत कम है.
भारत में धर्म क्यों बदलते हैं लोग
भारत में धर्मांतरण दो कारणों से हुआ है.पहला-सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों एवं शोषण के ख़िला़फ नाराजगी और दूसरा, लाभ के लिए व्यक्तिवादी सोच. जातिवादी व्यवस्था और सामाजिक उत्पीड़न-शोषण से मुक्ति की आशा में ही बड़ी संख्या में अनुसूचित जातियों के लोगों ने ईसाइयत की दीक्षा ली. माना गया कि ईसाइयत में किसी भी प्रकार के जातिवादी भेदभाव या शोषण के लिए कोई स्थान नहीं है. लेकिन चर्च नेतृत्व ने मुक्ति की आशा में आए लोगों को महज़ एक संख्या ही माना और उनके विकास पर ध्यान देने की जगह वह अपना साम्राज्य बढ़ाने में लगा रहा. धर्मांतरित ईसाइयों की इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि जिस चर्च नेतृत्व पर उन्होंने विश्वास करते हुए अपने पूवर्जों के धर्म तक का त्याग कर दिया, उसी चर्च नेतृत्व ने उनकी आस्था के साथ विश्वासघात करते हुए उन्हें वापस उसी जातिवादी व्यवस्था में धकेलने का बीड़ा उठा लिया है.
चर्च नेतृत्व ने वंचित वर्गों के बीच अपना आधार ही इस प्रलोभन के तहत बढ़ाया कि ईसाइयत के बीच जाति भेदभाव नहीं है और ईसाई धर्म के बीच दलितों से मत परिवर्तित करके ईसाइयत अपनाने वाले लोगों के साथ समानता का व्यवहार किया जाएगा. ईसाई समाज में समानता के इस स्थान की झूठी आशा में ही दलितों ने ईसाई धर्म अपनाया. चर्च-नेतृत्व बड़ी चतुराई से धर्मान्तरित ईसाइयों के विकास की बात करता है. उन्हें हिंदू दलितों से जोड़ देता है. उनकी जड़ें और समस्या एक बताता है. यह सच है कि वे इन समुदायों की जातिवादी व्यवस्था से विद्रोह कर ईसाइयत में आए हैं, लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि उसके बाद उनका गैर-ईसाई दलितों के साथ कोई खास रिश्ता नहीं रहा. यहां तक कि उनकी पूजा-पद्धति, प्रतीक, रहन-सहन और जीवन जीने का ढंग सब बदल गया है. उनकी समस्याओं और तकलीफों को गैर-ईसाई दलितों के समान नहीं देखा जा सकता.
क्या भारत में दलित ईसाइयों के साथ अन्याय होता है
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने 2016 में 'पॉलिसी ऑफ दलित एम्पावरमेंट इन द कैथोलिक चर्च इन इंडिया' नाम से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि दलित ईसाइयों के साथ अन्याय हो रहा है और चर्च में बदलाव की जरूरत है ताकि उन्हें पर्याप्त अधिकार दिए जा सकें. यह रिपोर्ट शायद उन लोगों की आंखें खोल सके, जो ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण को देखना नहीं चाहते. वामपंथी और कुछ दलित चिंतक अक्सर कहते हैं कि जो हिंदुत्व दलितों को बराबरी नहीं दे सकता, उससे निकल जाना ही बेहतर है. इस रिपोर्ट के बहाने उन्हें यह बताना चाहिए कि आखिर वे हिंदुत्व से निकलकर भी दलदल में क्यों हैं? इसी रिपोर्ट में कैथोलिक चर्च ने दोहराया है कि हम लंबे समय से दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल करवाने के लिए लड़ रहे हैं और यह उन्हें मिलना ही चाहिए.
उल्लेखनीय है कि भारतीय चर्च, वेटिकन और वर्ल्ड चर्च काउंसिल, कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सहायता से पिछले छह दशकों से दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल करवाने के लिए कानूनी-राजनीतिक मोर्चों पर लड़ रहा है. मार्च 1996 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने के लिए संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश में संशोधन करने का प्रयास किया, कल्याण मंत्रालय की सिफारिश पर विधेयक पेश किया गया था, लेकिन पारित नहीं हो सका. इसके बाद, राव सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से भी यह प्रयास किया, जो राष्ट्रपति की मंजूरी न मिलने के कारण लागू नहीं हो सका. 1950 का मूल आदेश केवल हिंदू दलितों तक सीमित था, जिसे 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों तक बढ़ाया गया था. पीवी नरसिम्हा राव की सरकार इसमें दलित ईसाइयों को शामिल करना चाहती थी, लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाई.
किसने की दलित ईसाइयों को एससी में शामिल करने की सिफारिश
भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर अधिकतर राजनीतिक दल भारतीय चर्च की इस मांग के समर्थन में खड़े हैं. वर्ष 2000 से चर्च नेतृत्व ने अपनी इस मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. साल 2004 में यूपीए सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग का गठन किया. उस आयोग ने 2007 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में अनुसूचित जाति दर्जे को धर्म से अलग करने की सिफारिश की थी. इसी तरह, सच्चर समिति (2005) ने बताया कि धर्म परिवर्तन के बाद भी दलित मुसलमानों और ईसाइयों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ है.
मोदी सरकार ने 2022 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया है.यह आयोग इस मुद्दे की जांच करेगा कि क्या उन दलितों को अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा दिया जा सकता है, जिन्होंने सालों से सिख या बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्मों को अपना लिया है. आयोग की समय सीमा 2 साल तय की गई थी.आयोग को 2024 तक अपनी रिपोर्ट दी थी. हालांकि रिपोर्ट को लेकर अब तक कोई आधिकारिक अपडेट नहीं आया है, आयोग अभी भी अपना काम कर रहा है और यह मुद्दा अभी भी लंबित है. संविधान के अनुसार, अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले दलितों को दिया जाता है.
एससी की सूची में किस किस धर्म के दलित शामिल हैं
भारत के रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय (RGI) के अनुसार, अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा उन समुदायों के लिए है जो अस्पृश्यता की प्रथा के कारण सामाजिक असमानताओं का सामना करते हैं. RGI ने सरकार को सलाह दी थी कि ऐसी स्थिति हिंदू और सिख समुदायों में ही पाई जाती है. इसके साथ ही, RGI ने यह भी कहा था कि दलित ईसाइयों और मुसलमानों को अनुसूचित जाति (एससी) सूची में शामिल करने से देशभर में अनुसूचित जाति की आबादी में भारी बढ़ोतरी हो सकती है.
2001 में रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय (RGI) ने 1978 के एक नोट का हवाला देते हुए कहा था कि दलित ईसाई और मुसलमान, दलित बौद्धों की तरह, विभिन्न जाति समूहों से आते हैं न कि एक ही समुदाय से. इस वजह से, उन्हें एकल जातीय समूह के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, जो संविधान के अनुच्छेद 341 के खंड (2) के तहत अनुसूचित जाति की सूची में शामिल होने के लिए आवश्यक है.
चर्च एक तरफ हिंदू दलितों को अपने बाड़े में ला रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह इनके ईसाइयत में आते ही उन्हें दोबारा हिंदू दलितों की सूची में शामिल करने की मांग करने लगता है, अगर उन्हें अनुसूचित जातियों की श्रेणी में ही रखना है तो फिर धर्मांतरण के नाम पर ऐसी धोखाधड़ी क्यों? भारतीय चर्च नेतृत्व पिछले कई दशकों से अनुसूचित जातियों से ईसाइयत में दीक्षित होने वालों के लिए हिंदू मूल के अनुसूचित जातियों के समान ही सुविधाओं की मांग करता आ रहा है. इसलिए कि धर्म बदलते ही अनुसूचित जाति वालों की वे तमाम सुविधाएं खत्म हो जाती हैं जो उन्हें हिंदू रहते हुए उपलब्ध होती हैं. इस कारण अनुसूचित जातियों से ईसाइयत में दीक्षित होने वालों की संख्या उनकी आबादी के हिसाब से आदिवासी समूहों के मुकाबले बहुत कम है.
डिस्क्लेमर: लेखक पूअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














