तुर्की और ईरान के बीच सदियों पुरानी प्रतिस्पर्धा रही है, लेकिन दोनों देशों ने कभी पूर्ण युद्ध नहीं किया. तुर्की एक 'कमजोर ईरान' तो देख सकता है, लेकिन 'तबाह ईरान' उसके अपने अस्तित्व के लिए खतरा है. अगर ईरान का प्रभाव खत्म होता है, तो तुर्की और इजरायल के बीच का 'बफर' (Buffer) खत्म हो जाएगा. आने वाले समय में मिडिल-ईस्ट की स्थिरता इस बात पर टिकी है कि तुर्की अपनी 'ओटोमन साम्राज्य' जैसी महत्वाकांक्षाओं और पश्चिम के साथ अपने समझौतों के बीच कैसे संतुलन बिठाता है? फिलहाल, मिडिल-ईस्ट के दरवाजे पर दस्तक देती यह नई मुसीबत तुर्की के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है.
इन दिनों चिंतित क्यों हैं तुर्की
मिडिल-ईस्ट की बिसात पर इस वक्त जो मोहरे चले जा रहे हैं, वे केवल ईरान की सत्ता बदलने (Regime Change) तक सीमित नहीं हैं. अंकारा के गलियारों में इस बात को लेकर सुगबुगाहट तेज है कि अमेरिका और इजरायल का यह साझा अभियान ईरान को घुटनों पर लाकर उसे पश्चिमी शर्तें मानने पर मजबूर करने की एक बड़ी पटकथा है. रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में पैदा होने वाली कोई भी अस्थिरता तुर्की के लिए एक 'डोमिनो इफेक्ट' (Domino Effect) शुरू कर सकती है.इसकी आंच अंकारा तक पहुंचना तय है.
डोमिनो इफ़ेक्ट (Domino Effect) एक ऐसी प्रतिक्रिया (Chain Reaction) है, जहां एक छोटी सी घटना या बदलाव अपने आस-पास की अन्य घटनाओं को भी प्रभावित करती है. सीधे शब्दों में एक घटना अन्य घटनाओं को ट्रिगर कर सकती है, जो पहले की तुलना में अधिक गंभीर हो सकती हैं.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर ईरान इस दबाव में ढह गया, तो क्या इसका खमियाजा तुर्की को भुगतना पड़ेगा?
कुर्दिश आंदोलन: तुर्की का सबसे पुराना डर
तुर्की के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय ईरान का कमजोर होना नहीं, बल्कि उसका 'विखंडन' है. इराक और सीरिया के कड़वे अनुभवों से सीख चुका तुर्की जानता है कि सत्ता का खालीपन (Power Vacuum) हमेशा अलगाववाद को जन्म देता है. ईरान में सक्रिय कुर्द विद्रोही संगठन 'कुर्दिस्तान फ्री लाइफ पार्टी' (PJAK) वैचारिक रूप से तुर्की के जानी दुश्मन 'कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी' (PKK) से जुड़ा है. अगर तेहरान कमजोर पड़ता है, तो ये उग्रवादी गुट इस नए कॉरिडोर में अपनी गतिविधियां तेज कर देंगे. तुर्की को डर है कि उसकी सीमाओं के साथ एक नया कुर्दिश उग्रवाद का कॉरिडोर तैयार हो सकता है, जिसे बाहरी ताकतों का समर्थन मिलना तय है. जाहिर तौर पर इसका असर तुर्की की अर्थव्यवस्था पर होगा.
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तुर्की पहले से ही सीरिया,इराक और अफगानिस्तान के लाखों शरणार्थियों का बोझ उठा रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की में 120,000 से अधिक पंजीकृत अफगान शरणार्थी और 300,000 से अधिक अनियमित प्रवासी हैं, जो सीरियाई लोगों के बाद दूसरा सबसे बड़ा समूह हैं. वर्तमान में देश के भीतर प्रवासियों के खिलाफ जनभावनाएं प्रबल हैं और अर्थव्यवस्था दबाव में है. ईरान के ढहने का मतलब होगा लाखों ईरानी नागरिकों का पलायन. अगर शरणार्थियों की एक और लहर तुर्की की ओर बढ़ती है, तो यह अर्दोआन प्रशासन के लिए न केवल आर्थिक बल्कि एक बड़ा राजनीतिक जोखिम भी साबित होगा.
क्या तुर्की है इजरायल के लिए 'नया ईरान'?
बीते कुछ समय से, अब तुर्की को इजरायल के लिए ईरान से भी बड़ा और आधुनिक खतरा माना जाना रहा है. इसके पीछे ठोस तर्क हैं.
वैचारिक नेतृत्व: ईरान एक 'शिया' शक्ति है, वहीं राष्ट्रपति अर्दोआन के नेतृत्व में तुर्की 'सुन्नी' जगत का नेतृत्व करने की कोशिश कर रहा है.
सैन्य श्रेष्ठता: ईरान की तुलना में तुर्की एक NATO सदस्य है. उसके पास आधुनिक ड्रोन (Bayraktar) और मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसी तकनीक है, जो उसे कहीं अधिक सक्षम प्रतिद्वंद्वी बनाती है.
आर्थिक युद्ध: G20 देशों में तुर्की अकेला ऐसा देश है, जिसने इजरायल के साथ व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है, जो एक सीधे टकराव का संकेत है.
हॉर्मुज और व्यापारिक हितों का गणित
तमाम सुरक्षा चुनौतियों के बीच, अर्दोआन का तात्कालिक फोकस आर्थिक गलियारों को सुरक्षित रखना है. तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब ने मिलकर अमेरिका को होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खुला रखने के लिए एक प्रस्ताव सौंपा है. तेहरान अब स्वेज नहर की तर्ज पर जहाजों से टोल वसूलने की योजना बना रहा है. चर्चा है कि तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब मिलकर इस जलमार्ग से तेल के प्रवाह को प्रबंधित करने के लिए एक संघ बना सकते हैं. यह तुर्की की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह क्षेत्र में खुद को एक 'पावर हाउस' के रूप में स्थापित करना चाहता है.
ईरान युद्ध से दूरी बनाने में जुटा तुर्की
ईरान-इजरायल युद्ध की तपिश तुर्की के एयरस्पेस तक भी पहुंच चुकी है. हाल ही में ईरान की ओर से दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों ने तुर्की के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया, जिन्हें पूर्वी भूमध्य सागर में NATO के मिसाइल डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया. यह तुर्की के लिए चौथी ऐसी घटना है, जो यह साबित करती है कि वह चाहकर भी इस युद्ध से अलग नहीं रह सकता. ईरान ने मध्य पूर्व में मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए हैं, जिनमें इज़रायल, इराक, जॉर्डन और सभी छह खाड़ी देशों पर हमले शामिल हैं, जिनका उद्देश्य अमेरिकी संपत्तियों पर हमला करना था.
लेकिन तुर्की ऐसा नहीं है, हालांकि वहां कई अत्यंत संवेदनशील स्थल मौजूद हैं जहां अज्ञात संख्या में अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. तुर्की के दक्षिणी शहर अदाना के पास स्थित एक महत्वपूर्ण नाटो एयरबेस इंसिरलिक है, जिसका उपयोग दशकों से अमेरिकी सैनिकों द्वारा किया जाता रहा है. दूसरा, कुरेसिक, जो मालत्या प्रांत में स्थित एक नाटो (NATO) रडार बेस है. हालांकि तुर्की ने इस बात से साफ इनकार किया है कि रडार डेटा का इस्तेमाल कभी भी इजरायल की मदद के लिए किया गया है, लेकिन इसकी मौजूदगी ने तेहरान को परेशान कर दिया है. हालांकि ईरान नाटो के किसी सदस्य देश पर हमले का परिणाम भी जानता है. ईरान द्वारा तुर्की पर हमला न करने का निर्णय सद्भावना का मामला नहीं है, बल्कि यह एक जटिल रणनीतिक गणना का परिणाम है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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