हरीश राणा केस और Guzaarish: जब सिनेमा में उठा इच्छा मृत्यु का सवाल

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हिमांशु जोशी

हरीश राणा केस की वजह से देशभर में इच्छा मृत्यु पर बात हो रही है और इन सब के बीच साल 2010 में आई संजय लीला भंसाली की फिल्म Guzaarish याद आ जाती है. एक जादूगर की कहानी के जरिए यह फिल्म जीवन, पीड़ा और गरिमा के अधिकार पर गहरे सवाल छोड़ गई थी.

अदालत का फैसला और सिनेमा की याद

इच्छा मृत्यु या पैसिव यूथेनेशिया के विषय पर संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी फिल्म Guzaarish जीवन, पीड़ा और गरिमा के अधिकार पर एक संवेदनशील कृति है. संजय लीला भंसाली की फिल्मों की एक पहचान उनका गहरा और डार्क विजुअल टोन रहा है और Guzaarish में यह शैली साफ दिखाई देती है, जिसमें रंग और रोशनी मिलकर किरदार के भीतर के अंधेरे को भी सामने लाते हैं. फिल्म की शुरुआत से ही ऋतिक रोशन के निभाए किरदार के जीवन में छाया अंधकार पर्दे पर भी दिखाई देता है.

एक जादूगर की कहानी और इच्छामृत्यु

फिल्म में ऋतिक रोशन ने ईथन मस्कारेंहास का किरदार निभाया है. ईथन कभी एक मशहूर जादूगर था, लेकिन एक दुर्घटना के बाद उसका शरीर लगभग पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है. वह व्हीलचेयर पर जीवन बिताने को मजबूर है और पिछले चौदह वर्षों से बिस्तर और सीमित गतिशीलता के बीच जी रहा है. वह एक रेडियो शो के जरिए लोगों से बातचीत करता है और उन्हें जीवन जीने की कला सिखाता है, लेकिन भीतर से खुद ही असहनीय शारीरिक पीड़ा से जूझ रहा है और दूसरों पर निर्भर है. इसी स्थिति में वह अदालत से इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगता है.

फिल्म की कहानी अदालत, परिवार और समाज के बीच चलने वाली उस बहस को सामने लाती है, जिसमें यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या किसी व्यक्ति को ऐसी हालत में जीने के लिए बाध्य किया जा सकता है जब जीवन केवल पीड़ा और निर्भरता बनकर रह जाए.

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अदालत में डॉक्टर की दुविधा और मां का समर्थन

इच्छा मृत्यु पर बहस के दौरान फिल्म में एक अहम क्षण तब आता है जब ईथन का डॉक्टर गवाही देता है. वह कहता है, 'मेरा पेशा मुझे जिंदगी बचाना सिखाता है.' इसके बावजूद वह ईथन की इच्छा मृत्यु की मांग का समर्थन करता है.

यह दृश्य उस दुविधा को सामने लाता है जिसमें डॉक्टर खुद को पाते हैं. एक तरफ उनका पेशा जीवन बचाने का है, दूसरी तरफ मरीज की असहनीय पीड़ा भी उनके सामने होती है. कुछ हद तक यही स्थिति हरीश राणा के डॉक्टरों के सामने भी दिखाई देती है.

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ईथन की मां अदालत में अपने बेटे के फैसले का समर्थन करती हैं. वह कहती हैं, 'ये जिंदगी सिर्फ और सिर्फ ईथन की है.' उनके लिए यह बहस कानून की नहीं, अपने बेटे के दर्द की है. यह दृश्य दिखाता है कि इच्छा मृत्यु का सवाल केवल अदालत या कानून तक सीमित नहीं रहता. इसमें परिवार की भावनाएं और वर्षों से देखी जा रही पीड़ा भी शामिल होती है.

संवाद जो बहस को आईना दिखाता है

फिल्म में एक क्षण ऐसा भी आता है जब ईथन वकील से कहता है, 'ईथन मस्कारेंहास की जिंदगी के 60 सेकेंड्स बर्दाश्त नहीं कर पाए आप.'

यह संवाद फिल्म के सबसे असरदार पलों में से एक बन जाता है. यह उन सवालों को भी चुनौती देता है जो इच्छा मृत्यु को केवल सिद्धांत की बहस की तरह देखते हैं. हरीश राणा के मामले को लेकर जब इच्छा मृत्यु पर सवाल उठ रहे हैं, तब यह संवाद उस पीड़ा की ओर ध्यान भी खींचता है जिसे बाहर से समझ पाना आसान नहीं होता.

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