बिहार में लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं. राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़ों के मुताबिक, यौन हिंसा मामले में इजाफा हुआ है. 18 से 29 साल तक की लड़कियों और महिलाओं के साथ हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. आंकड़े बताते हैं कि प्रेग्नेंसी के दौरान मारपीट झेलने वाली महिलाओं की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है. राष्ट्रीय स्तर पर इन सभी मानकों में सुधार हुआ है, लेकिन बिहार पीछे गया है. सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 18-29 साल की उन महिलाओं की संख्या बिहार में बढ़ी हैं, जिन्हें यौन हिंसा झेलनी पड़ी है. NFHS-5 की रिपोर्ट में बिहार की 1.8% महिलाओं ने कहा था कि उन्होंने यौन हिंसा झेली है. यह आंकड़ा अब बढ़कर 2.1% हो गया. जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 1.2% से घटकर 0.7 हो गया है. गर्भावस्था के दौरान मारपीट झेलने वाली महिलाओं की संख्या करीब दोगुनी हो गई है. यह आंकड़ा 2.8 से बढ़कर 5.4 फीसदी तक पहुंच गया है. राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 1.2 फीसदी से घटकर 0.7% रह गया है. बिहार के यह आंकड़े उस वक्त के हैं, जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे. उनके राज में महिला सशक्तिकरण पर काफी जोर दिया गया है, ऐसे में यह रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली है.
महिलाओं के लिए असुरक्षित क्यों है बिहार?
सवाल यह है कि देशभर में जब इन मानकों में सुधार हो रहा है तो बिहार में ऐसे मामले क्यों बढ़े हैं? एनडीटीवी से बातचीत में महिला अधिकार कार्यकर्ता शाहिना परवीन ने बताया कि अब लड़कियां-महिलाएं हिंसा के खिलाफ पहले की तुलना में मुखर हुई हैं. यही वजह है कि हिंसा के मामलों की रिपोर्टिंग बढ़ी है, लेकिन यह बढ़े हुए आंकड़े अब भी सच्चाई से दूर हैं. वे कहती हैं कि अब लड़कियां शादी और बच्चे पैदा करने से जुड़े फैसले खुद करना चाहती हैं. उनके लिए इको-सिस्टम नहीं बदला है. महिलाएं जितना मुखर हो रही हैं, उन्हें उतना ही दबाने की कोशिश भी हो रही है. यही वजह है कि महिलाओं के प्रति हिंसा और उसकी रिपोर्टिंग बढ़ी है.
घर के फैसले लेने में भी महिलाओं की भागीदारी घटी
घरेलू मामलों में फैसला लेने में भी महिलाओं की भागीदारी घटी है. NFHS-5 के मुताबिक, महिलाओं की भागीदारी 86.5 फीसदी थी, जो 85.1% तक पहुंच गई. जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 88.7% से मामूली रूप से बढ़कर 89% पर पहुंच गया है. हालांकि, शाहिना इसकी दूसरी तस्वीर बयां करती हैं. वे कहती हैं, "बिहार से बड़ी संख्या में पुरुषों का पलायन होता है. ऐसे में सतही फैसलों में महिलाओं की भागीदारी होती है, लेकिन अहम फैसले अब भी पुरुषों के नियंत्रण में हैं. यही कारण है कि महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ और लिंगानुपात में भी गिरावट है. महिलाओं पर लड़के पैदा करने का दबाव है. ऐसे में ऊपर के आंकड़े भी ठीक तरीके से जमीनी सच्चाई नहीं बता पाते."
मंत्री बोले- जागरूकता की वजह से बढ़े मामले
इस पूरे मामले में समाज कल्याण मंत्री श्वेता गुप्ता की राय अलग है. उनका मानना है कि महिलाओं में जागरूकता के कारण अब मामले ज्यादा दिखाई दे रहे हैं. वे कहती हैं, "पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काफी काम किया है. आप देखेंगे कि स्कूल जाने में, मोबाइल और इंटरनेट के इस्तेमाल में महिलाओं की संख्या बढ़ी है. हिंसा के मामले इसलिए बढ़े हुए नजर आ रहे हैं, क्योंकि अब जागरूकता बढ़ी है. हमने यह सुनिश्चित किया है कि महिलाएं बिना डरे शिकायत कर पाएं. आंकड़े सिर्फ इसीलिए बढ़े हुए नजर आ रहे हैं. आरक्षण की व्यवस्था, साइकिल योजना से महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ी है."
विपक्ष ने मंत्री के दावों पर उठाए सवाल
सरकार के इन दावों पर विपक्ष कई सवाल उठा रहा है. भाकपा माले नेत्री दिव्या गौतम कहती हैं कि अगर सिर्फ रिपोर्टिंग बढ़ने से आंकड़े बढ़ते तो पूरे देश के आंकड़े बढ़ने चाहिए. नीट छात्रा का रेप, दलित बच्ची के साथ रेप जैसी घटनाएं रिपोर्टिंग बढ़ने के कारण तो नहीं हो रही हैं. यह बता रहे हैं कि लॉ एंड ऑर्डर, सुशासन मॉडल पूरी तरह फेल है. अगर राष्ट्रीय स्तर पर हिंसा के आंकड़े घट रहे हैं और बिहार में बढ़ रहे हैं तो यह चिंताजनक हैं. जबकि सभी महिलाएं अब भी शारीरिक और यौन हिंसा की रिपोर्टिंग नहीं कर पाती हैं. यह साफ है कि महिलाओं के प्राइवेट या पब्लिक स्पेस, सेफ स्पेस नहीं रह गया है. जिन्हें जिम्मेदारी लेनी चाहिए, वे जिम्मेदारी लेने की बजाय रिपोर्टिंग को कारण बता रहे हैं.
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