नई दिल्ली: बिहार में विधान परिषद के चुनाव के लिए NDA की तरफ से 9 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा हो गई है. पर बिहार की सम्राट सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश का नाम लिस्ट में नहीं है. MLC चुनाव के लिए बीजेपी और जेडीयू ने 4-4 उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि चिराग पासवान की पार्टी LJP(R) को एक सीट मिली है. अब राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश का लिस्ट में नाम न होना तरह-तरह की चर्चाओं को हवा दे रहा है. अगर राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं को आधार मानें, तो दीपक प्रकाश का विधान परिषद नहीं पहुंच पाना केवल एक सीट का मामला नहीं माना जा रहा है. NDA के भीतर इसे उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) की राजनीतिक हैसियत से जोड़कर भी देखा जा रहा है.
उपेंद्र कुशवाहा पर भाजपा में विलय का दबाव
सूत्रों के मुताबिक, पिछले कुछ समय से भाजपा के कुछ नेताओं की ओर से यह संकेत दिया जा रहा था कि छोटे सहयोगी दलों को भविष्य में भाजपा के साथ और अधिक मजबूती से जुड़ना चाहिए. राजनीतिक हलकों में यहां तक चर्चा रही कि उपेंद्र कुशवाहा पर अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करने का दबाव भी था. हालांकि कुशवाहा ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखने का फैसला किया और विलय के किसी भी प्रस्ताव से दूरी बनाई. आधिकारिक तौर पर न भाजपा ने कभी ऐसी बात स्वीकार की है और न ही कुशवाहा ने सार्वजनिक रूप से इस पर विस्तार से कुछ कहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस तरह की चर्चाएं लगातार होती रही हैं.
इसी वजह से कुछ राजनीतिक विश्लेषक दीपक प्रकाश के मामले को सामान्य सीट बंटवारे से आगे जाकर देख रहे हैं. उनका मानना है कि यह केवल उम्मीदवार चयन का मामला नहीं, बल्कि NDA के भीतर ताकत और राजनीतिक संदेश की लड़ाई भी है. अगर कुशवाहा की पार्टी को उनकी अपेक्षा के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, तो यह संदेश जा सकता है कि NDA के भीतर छोटे सहयोगी दलों की भूमिका सीमित होती जा रही है.
हालांकि दूसरी राय रखने वाले नेताओं का कहना है कि दीपक प्रकाश का नाम सूची में नहीं आने का मुख्य कारण सीटों की कमी और दावेदारों की अधिक संख्या है. इस बार मांझी, चिराग पासवान और अन्य सहयोगी दलों की मांगों ने पहले ही NDA का गणित जटिल बना दिया था. ऐसे में हर नेता और हर दल की मांग पूरी कर पाना संभव नहीं था.
RLM प्रमुख के पास अब क्या विकल्प
अब जब दीपक प्रकाश को विधान परिषद में जगह नहीं मिली तो जाहिर तौर पर उन्हें मंत्रिपद से इस्तीफ़ा देना होगा. ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा के पास 2 विकल्प है. या तो वो अपने पत्नी को मंत्री बना दे, जो कि फिलहाल सासाराम से विधायक हैं या फिर अपने कोटे की मंत्री को खाली जाने दे और कुशवाहा समाज को एकजुट करने की अपनी कवायत जारी रखें.
हालांकि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से NDA को किसी कुशवाहा नेता की कोई ख़ास ज़रूरत है नहीं और वही दूसरी ओर अगर उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता नाराज भी होते हैं तो जाएंगे कहां? क्योंकि अभी फ़िलहाल बिहार में विपक्ष के लिए कोई ख़ास भूमिका बची नहीं है. दीपक प्रकाश का मामला अब केवल विधान परिषद चुनाव का विषय नहीं रह गया है. यह NDA के भीतर शक्ति संतुलन, सहयोगी दलों की हैसियत, राजनीतिक संदेश और भविष्य के गठबंधन समीकरणों से जुड़ा मुद्दा बन चुका है. विधानसभा चुनाव से पहले इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी.
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