- सम्राट चौधरी ने बिहार के CM के रूप में नीतीश कुमार को पीछे छोड़कर राजनीतिक क्षेत्र में नया दौर शुरू किया है
- उनका राजनीतिक सफर एक साधारण ग्रामीण परिवेश से शुरू होकर लगातार मेहनत और अनुभव के आधार पर ऊंचाई तक पहुंचा है
- उन्होंने RJD से राजनीति शुरू की और बाद में जनता दल यूनाइटेड तथा भाजपा में शामिल होकर महत्वपूर्ण पद संभाले
बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. लंबे समय तक राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार को पीछे छोड़ सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. यह बदलाव केवल एक नेता के बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे बिहार की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है. सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इसलिए भी खास माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने एक साधारण ग्रामीण माहौल से निकलकर राजनीति में लगातार मेहनत करते हुए सत्ता के सबसे ऊंचे पद तक का सफर तय किया है.
सम्राट चौधरी का मूल निवास बिहार के मुंगेर जिले के तारापुर इलाके से जुड़ा माना जाता है. उनका बचपन गांव के माहौल में बीता, जहां खेती-किसानी और साधारण जीवनशैली आम बात थी. गांव में रहने के कारण उन्होंने बचपन से ही आम लोगों की समस्याओं को करीब से देखा और समझा. बिजली, सड़क, पानी और रोजगार जैसी जरूरतें गांव के लोगों के लिए कितनी महत्वपूर्ण होती हैं, इसका अनुभव उन्हें छोटी उम्र में ही हो गया था. यही वजह है कि वे अक्सर अपने भाषणों में गांव और किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं.
कॉलेज के दिनों से ही राजनीति में सक्रिय हुए थे
सम्राट चौधरी की पढ़ाई-लिखाई बिहार में ही हुई. छात्र जीवन के दौरान वे पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहने लगे. कॉलेज के दिनों में उन्होंने छात्र राजनीति में हिस्सा लेना शुरू किया. युवाओं के मुद्दों पर बोलने और कार्यक्रमों में सक्रिय रहने के कारण उन्हें जल्दी पहचान मिलने लगी. यही समय उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत माना जाता है. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की थी. उस समय लालू प्रसाद यादव की पार्टी बहुत मजबूत थी और राज्य की राजनीति में उसका बड़ा प्रभाव था. सम्राट चौधरी ने पार्टी के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और संगठन के साथ काम किया. लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो गए. यह उनका पहला बड़ा राजनीतिक बदलाव माना जाता है.
JDU का भी थामा था हाथ
जेडीयू में शामिल होने के बाद उनका राजनीतिक कद बढ़ने लगा. उन्हें सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला और उन्होंने कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली. मंत्री रहते हुए उन्हें प्रशासनिक कामकाज का अनुभव मिला और सरकार चलाने की प्रक्रिया को समझने का मौका मिला. इसी दौरान वे एक ऐसे नेता के रूप में सामने आए, जो सक्रिय और काम करने वाले नेता की छवि बनाना चाहते थे.साल 2018 में उन्होंने एक और बड़ा फैसला लिया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. उस समय यह कदम काफी चर्चा में रहा, क्योंकि वे एक मजबूत पिछड़ा वर्ग के नेता के रूप में उभर रहे थे. भाजपा में आने के बाद उनका राजनीतिक सफर तेजी से आगे बढ़ा. पार्टी ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं और वे संगठन के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.
पगड़ी पहनने को लेकर चर्चित हुआ था उनका बयान
सम्राट चौधरी के राजनीतिक जीवन की एक चर्चित घटना वह रही, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि जब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे, तब तक वे अपनी पगड़ी नहीं पहनेंगे. यह बयान उस समय काफी चर्चा में रहा और इससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और आत्मविश्वास का संकेत मिला. बाद में जब वे खुद मुख्यमंत्री बने, तो पगड़ी पहनकर उन्होंने अपने समर्थकों को यह संदेश दिया कि उनका लक्ष्य पूरा हो गया है. सम्राट चौधरी को पहले उपमुख्यमंत्री बनाया गया और वित्त विभाग जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई. वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने राज्य का बजट पेश किया और आर्थिक फैसलों में भागीदारी की. इस अनुभव ने उन्हें सरकार चलाने की समझ दी और प्रशासनिक तौर पर मजबूत बनाया.आज सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की राजनीति के केंद्र में हैं. गांव के साधारण माहौल से शुरू हुआ उनका सफर लगातार मेहनत, राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक क्षमता के कारण यहां तक पहुंचा है. अब उनके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वे राज्य की उम्मीदों पर खरे उतरें और विकास के कामों को आगे बढ़ाएं.
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