बिहार में एक ऐसा स्कूल जहां पढ़ते हैं केवल 9 बच्चे, पढ़ाने आते हैं 4 टीचर

इस स्कूल की दिनचर्या की बात करें तो वह भी उतनी ही अनोखी है. जहां प्रतिदिन मध्याह्न भोजन में बच्चों के लिए मात्र एक किलो चावल पकाया जाता है, और उसी अनुपात में दाल और सब्ज़ी बनती है. पूरे महीने का मध्याह्न भोजन खर्च लगभग 1500 रुपये बताया जा रहा है।

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इस स्कूल में महज 9 बच्चे ही पढ़ने आते हैं
NDTV
मुजफ्फरपुर:

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक ऐसा स्कूल भी है जहां महज 9 छात्र पढ़ने आते हैं. हैरान करने वाली बात ये है कि इन 9 छात्रों को पढ़ाने के लिए इस स्कूल में 4 शिक्षकों को नियुक्त किया गया है. ऐसा हो रहा है सकरा प्रखंड के एक सरकारी स्कूल में. इस स्कूल में कक्षा 1 से 5 तक की  पढ़ाई होती है. बड़ी बात यह है सरकारी तंत्र का उस 9 बच्चो को पढ़ाने के लिए एक हेडमास्टर सहित 4 शिक्षक और मध्याह भोजन के लिए दो कर्मी नियुक्त है.

खास है स्कूल की दिनचर्या

इस स्कूल की दिनचर्या की बात करें तो वह भी उतनी ही अनोखी है. जहां प्रतिदिन मध्याह्न भोजन में बच्चों के लिए मात्र एक किलो चावल पकाया जाता है, और उसी अनुपात में दाल और सब्ज़ी बनती है. पूरे महीने का मध्याह्न भोजन खर्च लगभग 1500 रुपये बताया जा रहा है. वहीं इतने कम संसाधनों और बच्चों की संख्या के बावजूद यह विद्यालय नियमित रूप से संचालित हो रहा है. लेकिन किसी सरकारी कर्मी की इस पर नजर नहीं जाती है 

स्कूल प्रिंसिपल ने बताई बड़ी बात

वहीं, स्कूल की प्रिंसिपल कुमारी मीनू का कहना हैं कि स्कूल में कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई नियमित रूप से होती है और सभी 9 बच्चे प्रतिदिन स्कूल भी आते हैं. वहीं उनके द्वारा बताया कि गया की “कक्षा एक में एक लड़का और एक लड़की, कक्षा दो में एक लड़का और दो लड़कियां, कक्षा तीन में एक लड़की, कक्षा चार में एक लड़का और एक लड़की, जबकि कक्षा पांच में कुल एक लड़की नामांकित है. कुमारी मीनू के अनुसार, मध्याह्न भोजन सरकारी मेन्यू के अनुसार ही कर्मी द्वारा तैयार कर बच्चों को दिया जाता है और सभी 9 बच्चों की उपस्थिति भी नियमित रहती है.

स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों का कहना है कि स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए वे लोग लगातार प्रयास कर रहे हैं. हर सप्ताह शिक्षकों की टीम गांव में बच्चों के परिजनों से मिलने जाती है, और परिजनों को बच्चों को गांव के स्कूल में ही एडमिशन कराने के लिए प्रेरित भी किया जाता है. शिक्षा का महत्व समझाने के साथ-साथ सरकारी योजनाओं की जानकारी भी दी जाती है. बाबजूद इसके स्कूल में बच्चों की संख्या नहीं बढ़ पा रही है. 

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