मैसूर सिल्क साड़ी की ऐसी दीवानगी! सुबह 4 बजे से टोकन लेकर कतार में खड़ी महिलाएं, वायरल हुआ VIDEO

कर्नाटक में मैसूर सिल्क साड़ी खरीदने के लिए सुबह 4 बजे से महिलाओं की लंबी कतार लग रही है. 23 हजार रु से 2.5 लाख रुपये तक की इन साड़ियों का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.

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मैसूर सिल्क की ऐसी दीवानगी!

Mysore silk saree: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें हजारों महिलाएं सुबह 4 बजे से एक लंबी लाइन में खड़ी नजर आ रही हैं. वजह कोई सरकारी फॉर्म नहीं, बल्कि मैसूर की असली सिल्क साड़ी है. यह वीडियो कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्री से जुड़ी उस सच्चाई को दिखाता है, जहां मांग आसमान पर है और सप्लाई सीमित.

मैसूर सिल्क के लिए सुबह 4 बजे से कतार

वीडियो में देखा जा सकता है कि महिलाएं कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज़ कॉर्पोरेशन (KSIC) के शोरूम के बाहर सुबह 4 बजे से लाइन में खड़ी हैं. वीडियो के साथ कैप्शन में बताया गया है कि साड़ियों की कीमत 23,000 रुपये से 2,50,000 रुपये तक है. एक ग्राहक को सिर्फ एक साड़ी दी जा रही है. खरीदारी के लिए टोकन जरूरी है. इस वीडियो को एक्स पर @ByRakeshSimha नाम के यूजर ने शेयर किया है, जिसे अब तक एक लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

देखें Video:

क्यों है मैसूर सिल्क साड़ियों की भारी किल्लत?

असल में, 2025 से ही असली मैसूर सिल्क साड़ियों की सप्लाई में भारी कमी देखी जा रही है और 2026 तक भी इसके खत्म होने के संकेत नहीं हैं. इसकी कई वजहें हैं- KSIC के पास सीमित संख्या में प्रशिक्षित बुनकर हैं. एक कारीगर को तैयार होने में 6 से 7 महीने का वक्त लगता है. प्रोडक्शन सिर्फ सरकारी प्रशिक्षित वर्कफोर्स तक सीमित है. शादी सीजन, वरलक्ष्मी पूजा, गौरी-गणेश और दीपावली जैसे त्योहारों में मांग कई गुना बढ़ जाती है. इन हालात में शोरूम का स्टॉक कुछ ही घंटों में खत्म हो जाता है. 

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नकली सिल्क का खतरा और सरकारी भरोसा

कई यूजर्स ने कमेंट में निजी कंपनियों पर सवाल उठाए हैं. एक यूजर ने लिखा, कुछ असली खरीदार हैं, जबकि कुछ स्टोर मालिक अपने कर्मचारियों को थोक में खरीदने भेजते हैं. दरअसल, प्राइवेट सेक्टर में नकली या चाइनीज आर्टिफिशियल सिल्क बेचने के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं. तिरुपति मंदिर में भक्तों को नकली सिल्क सप्लाई किए जाने का मामला इसका उदाहरण है. यही वजह है कि KSIC की साड़ियों पर भरोसा ज्यादा किया जाता है, क्योंकि वहीं GI-टैग वाली असली मैसूर सिल्क मिलती है.

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सोवियत यूनियन से तुलना, लेकिन भरोसे के साथ

वीडियो के कैप्शन में इसकी तुलना सोवियत यूनियन से भी की गई है, जहां कभी हर चीज की किल्लत रहती थी. हालांकि, यहां फर्क सिर्फ इतना है कि कम से कम असलियत की गारंटी तो मिलती है. महंगी होने के बावजूद मैसूर सिल्क साड़ियों की दीवानगी यह साबित करती है कि भारतीय महिलाएं आज भी क्वालिटी, परंपरा और भरोसे को सबसे ऊपर रखती हैं. यही वजह है कि सुबह 4 बजे की लाइन भी उन्हें मंजूर है.

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