- सीजफायर अक्सर स्थायी शांति नहीं बल्कि अस्थायी विराम होता है जो जल्दी टूट जाता है.
- सीजफायर की सफलता के लिए भरोसा जरूरी है, लेकिन दशकों से चले आ रहे अविश्वास के कारण यह कमजोर पड़ जाता है.
- प्रॉक्सी युद्ध और आतंकवादी समूहों की भूमिका संघर्ष को जटिल बनाती है जिससे सीजफायर का उल्लंघन होता रहता है.
सीजफायर, नाम सुनते ही लगता है कि जंग रुक गई. लेकिन हकीकत अक्सर इससे उलट होती है. मिडिल ईस्ट हो या कोई और जंग का मैदान. शांति समझौते कई बार सिर्फ एक अस्थायी विराम साबित होते हैं. ईरान और इज़राइल के बीच हालिया तनाव हो या भारत-पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (LoC) पर सीजफायर पैटर्न लगभग एक जैसा है. पहले समझौता होता है, उम्मीद बनती है, छोटी घटना होती है और फिर शांति टूट जाती है.
यानी असली सवाल ये नहीं कि सीजफायर हुआ या नहीं, बल्कि ये है कि वो टिक क्यों नहीं पाता?
भरोसे की कमी
सीजफायर की नींव भरोसे पर टिकी होती है और यही सबसे कमजोर कड़ी है. ईरान-इजरायल की तरह ही भारत-पाक के बीच भी दशकों का अविश्वास है. LoC पर अक्सर 'पहले किसने गोली चलाई' ये विवाद रहता है. हर पक्ष खुद को सही और दूसरे को दोषी बताता है. ऐसे में छोटी सी फायरिंग भी बड़ा उल्लंघन बन जाती है और जवाबी कार्रवाई शुरू हो जाती है. यानी शांति कागज पर रहती है, ज़मीन पर नहीं.
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प्रॉक्सी वॉर से बढ़ती मुश्किलें
मिडिल ईस्ट में हिज़्बुल्लाह और हमास जैसे संगठन इस संघर्ष को जटिल बनाते हैं. ठीक इसी पाकिस्तान भी आतंकियों के सहारे भारत में घुसपैठ की कोशिश में लगा रहता है. ऐसे में ये ग्रुप्स हमले करते हैं, लेकिन जिम्मेदारी सीधे तय नहीं होती. नतीजतन हमला तीसरा पक्ष करता है, जवाब 'देश' को देना पड़ता है और सीजफायर टूट जाता है.
‘कमजोर' दिखने का डर
हर सरकार के लिए सीजफायर सिर्फ सैन्य नहीं, राजनीतिक फैसला भी होता है. भारत-पाक और ईरान-इजरायल दोनों ही मामलों में जनता सख्त जवाब चाहती है. विपक्ष सरकार को घेरता है. सेना की भूमिका अहम होती है. अगर हमला हो जाए और सरकार शांत रहे, तो उसे कमजोरी माना जाता है. अगर जवाब दे, तो सीजफायर खत्म हो जाता है. इस दुविधा में अक्सर शांति पीछे छूट जाती है.
गलतफहमी और इंटेलिजेंस फेल्योर
कई बार जंग जानबूझकर नहीं, बल्कि गलत आकलन से भड़कती है. भारत–पाक LoC पर भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां, लोकल कमांडर के स्तर पर फायरिंग शुरू हुई. या किसी गतिविधि को खतरा समझ लिया गया. मिडिल ईस्ट में भी यही होता है- एक अलर्ट, एक शक, और 'पहले हमला' की रणनीति. जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक सीजफायर टूट चुका होता है.
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सीजफायर: शांति नहीं, रणनीतिक ब्रेक
इतिहास बताता है कि कई बार सीजफायर का मतलब होता है- तैयारी का समय. भारत-पाक के बीच भी 2003 का LoC सीजफायर कई साल चला, लेकिन बीच-बीच में उल्लंघन होते रहे. इसी तरह मई 2023 के सीजफायर के बाद भी बॉर्डर पर छुटपुट फायरिंग की खबरें आती रहीं. मिडिल ईस्ट में भी यही पैटर्न है.
कहां-कहां टूटे सीजफायर? कुछ अहम उदाहरण
गाज–इजरायल संघर्ष (2021, 2023): सीजफायर के कुछ ही समय बाद रॉकेट हमले और जवाबी एयरस्ट्राइक.
लेबनान बॉर्डर (हिज़्बुल्लाह-इजरायल): सीमित झड़पें अक्सर बड़े संघर्ष में बदलने की कगार पर.
बाहरी ताकतों से भी उलझता है खेल
संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश मिडिल ईस्ट में बड़ा रोल निभाते हैं, जबकि दक्षिण एशिया में भी अंतरराष्ट्रीय दबाव अहम रहता है. कहीं मध्यस्थ्ता, कहीं प्रेशर और कहीं रणनीतिक हित. लेकिन हर बाहरी ताकत का अपना एजेंडा होता है, जो शांति को और fragile बना देता है.













