- अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की किल्लत उत्पन्न हो गई है
- पाकिस्तान दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर रहा है, इस्लामाबाद में वार्ता का दूसरा दौर होने की संभावना है
- प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए कतर के अमीर से मुलाकात कर संवाद के महत्व पर जोर दिया
अमेरिका-ईरान में युद्ध के कारण पूरी दुनिया में तेल-गैस की किल्लत हो गई है. पाकिस्तान मध्यस्थ बना, लेकिन इस्लामाबाद में हुई दोनों देशों की बातचीत बेनतीजा रही. हालांकि, दोनों देशों की तरफ से ये संकेत दिए गए कि बातचीत पूरी तरह फेल नहीं मानी जानी चाहिए. पाकिस्तान से भी ऐसे ही बयान आए. अब फिर पाकिस्तान मध्यस्थ बनने के लिए प्रयास कर रहा है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गुरुवार को कतर के अमीर से मुलाकात कर तनाव कम करने का आह्वान किया. वहीं एक पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान वार्ता के दूसरे दौर का मार्ग प्रशस्त करने के लिए ईरान में बातचीत कर रहा है.
शरीफ-मुनीर अलग-अलग देशों के दौरे पर
पाकिस्तानी मीडिया आउटलेट डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गुरुवार को कतर के अमीर तमीम बिन हमद बिन खलीफा अल थानी से मुलाकात की और क्षेत्रीय स्थिति के मद्देनजर तनाव कम करने और संवाद के महत्व पर जोर दिया. रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ 15 से 18 अप्रैल तक सऊदी अरब, कतर और तुर्की की आधिकारिक यात्राओं पर हैं. यह यात्रा ऐसे समय हुई जब ईरान के शीर्ष वार्ताकार और संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ ने गुरुवार को पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर के नेतृत्व वाले पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की.
क्या इस्लामाबाद में होगी फिर वार्ता?
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने गुरुवार को कहा कि इस्लामाबाद, पाकिस्तान की राजधानी में दूसरे दौर की वार्ता होने की उम्मीद है. एपी के अनुसार, व्हाइट हाउस ने कहा कि आगे की कोई भी बातचीत संभवतः पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होगी, हालांकि बातचीत फिर से शुरू करने के बारे में अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है. वहीं बृहस्पतिवार को ही ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि ईरान अपने एनरिच्ड यूरेनियम अमेरिका को सौंपने के लिए तैयार है और शायद युद्धविराम को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. लेबनान और इजरायल में भी सीजफायर का ऐलान उन्होंने कर ही दिया है. साथ ही ये भी कह दिया कि अगर ईरान से वार्ता होती है तो वो खुद इस्लामाबाद जा सकते हैं.
ईरान के अलग तेवर
हालांकि, आज ही अंताल्या कूटनीति मंच के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह ने कहा कि किसी भी युद्धविराम में लेबनान से लेकर लाल सागर तक के सभी संघर्ष क्षेत्र शामिल होने चाहिए, जिसे उन्होंने ईरान के लिए "लाल रेखा" बताया. उन्होंने कहा, "हम किसी भी अस्थायी युद्धविराम को स्वीकार नहीं कर रहे हैं," और कहा कि संघर्ष का यह चक्र "यहाँ हमेशा के लिए समाप्त होना चाहिए."होर्मुज जलडमरूमध्य के बारे में उन्होंने कहा कि यह जलमार्ग ऐतिहासिक रूप से खुला रहा है, और यह ईरान के क्षेत्रीय जल क्षेत्र में स्थित है, लेकिन लंबे समय से सुलभ रहा है. उन्होंने अमेरिका और इजरायल पर क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया और कहा कि उनके कार्यों ने वैश्विक व्यापार और व्यापक अर्थव्यवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है.
Photo Credit: Ali Shirband/ Wikimedia Commons
ईरान के सरकारी ब्रॉडकास्टर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ब्रॉडकास्टिंग (IRIB) ने अपने आधिकारिक X अकाउंट पर ट्रंप की मीडिया से बातचीत की एक क्लिप साझा करते हुए दावा किया कि अमेरिकी नेता "हवा में महल बना रहे हैं". IRIB ने एक फारसी कहावत भी साझा की जिसके अनुसार ऊंट बिनौला के सपने देखता है, सपने में कभी-कभी उसे निगल जाता है, कभी-कभी उसे दाना-दाना खाता रहता है."
क्या हो जाएगी अमेरिका-ईरान में डील?
जाहिर है दोनों देश समझौते के करीब तो पहुंच गए हैं, लेकिन अब भी अविश्वास काफी है. ईरान न्यूक्लियर प्रोग्राम पर कितना आगे तक राजी है, इस पर दोनों देशों की अलग-अलग रेड लाइन है. ईरान अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम को जांच के दायरे में रख सकता है, मगर वो एनरिच्ड यूरेनियम को अमेरिका को सौंपेगा या नहीं, ये कहा नहीं जा सकता. ट्रंप के दावे का ईरान की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया है. उधर, इजरायल-लेबनान में युद्धविराम तो हो गया है, पर ईरान और लेबनान के लिए हिज्बुल्लाह को भूल जाना असंभव सा है. इसी तरह इजरायल हिज्बुल्लाह को अमेरिका के कहने भर से छोड़ देगा, ये भी मुश्किल है. यही दो प्वाइंट तो पिछली शांति वार्ता को भी पटरी से उतारने की वजह थे और इस पर अभी भी बहुत से हां-ना बचे हुए हैं. यही कारण है कि आज खुद ट्रंप ने ही कहा कि संभव है कि ईरान में चल रहे संघर्ष का समाधान न हो पाए.
7 अप्रैल को अमेरिका-ईरान में दो सप्ताह का सीजफायर हुआ था. इस तरह से 21 अप्रैल तक या तो दोनों को डील करनी होगी या फिर सीजफायर बढ़ाने का ऐलान करना होगा. ऐसा भी हो सकता है कि दोनों फिर से एक-दूसरे के ठिकानों पर हमले करने लगें. क्योंकि रिपोर्ट है कि ईरान युद्ध के कारण फिलहाल अमेरिका यूरोप को भी गोला-बारूद अभी नहीं दे रहा है. अमेरिका ने सेना ईरान के करीब तैनात कर ही रखी है.
IEA की चेतावनी कितनी गंभीर?
इस बीच अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA)प्रमुख फातिह बिरोल ने चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के लंबे समय तक बंद रहने के परिणामों को बाजार कम आंक रहे हैं और ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी. बिरोल ने कहा कि एशियाई बाजारों में तेल, गैस या ईंधन की कोई नई आपूर्ति नहीं हुई है, और अब आपूर्ति में कमी आने लगी है. उन्होंने आगे कहा कि कमजोर मुद्राओं और सीमित वित्तीय संसाधनों के कारण गरीब देशों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ सकता है. बिरोल ने यह भी चेतावनी दी कि अगर कच्चा तेल रिफाइनरियों तक नहीं पहुंच पाता है, तो केरोसिन और डीजल जैसे परिष्कृत उत्पादों की कमी हो सकती है, जिससे कुछ देशों में उड़ानें बाधित हो सकती हैं, रद्द हो सकती हैं और औद्योगिक आपूर्ति में समस्याएं आ सकती हैं. IEA प्रमुख ने बृहस्पतिवार को एसोसिएटेड प्रेस को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में कहा कि यूरोप के पास "शायद छह सप्ताह का जेट ईंधन बचा है." उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान युद्ध के कारण तेल आपूर्ति अवरुद्ध रही तो जल्द ही फ्लाइट कैंसिल हो सकती हैं. जाहिर है भारत, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल जैसे देश जो अपना लगभग तेल और गैस दूसरे देशों से खरीदते हैं, वहां तेल-गैस की भयंकर किल्लत हो सकती है. साथ ही उद्योग-धंधे पर भी असर पड़ सकता है.
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