- US श्रम विभाग ने H-1B वीज़ा कार्यक्रम के तहत विदेशी वर्कर्स के न्यूनतम वेतन बढ़ाने के नियम प्रस्तावित किए हैं
- नए नियमों के अनुसार एंट्री-लेवल कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 17वें से बढ़ाकर 34वें पर्सेंटाइल तक किया जाएगा
- इसका मकसद विदेशी कर्मचारियों को US बाजार के समान वेतन देना और अमेरिकी कामगारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है
अमेरिकी श्रम विभाग ने एच-1बी और अन्य वीज़ा कार्यक्रमों के तहत विदेशी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन बढ़ाने के नए नियम प्रस्तावित किए हैं. इस कदम का मकसद विदेशी कर्मचारियों की सैलरी को अमेरिकी बाजार की सैलरी के बराबर लाना है. अधिकारियों का कहना है कि इससे अमेरिकी कामगरों की सुरक्षा होगी और सिस्टम के दुरुपयोग को कम किया जा सकेगा.ट्रंप के इस फैसले से वहां काम करने वाले भारतीय पेशेवरों पर असर पड़ने की संभावना है. बता दें कि H-1B वीजा अमेरिका में दूसरे देशों से जाकर नौकरी करने वाले प्रवासियों की पहली पसंद होती है. ट्रंप सरकार ने पहले ही इस वीजा के पर एक लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) की फीस थोप दी थी. अब नए नियमों का प्रस्ताव दिया है.
ट्रंप के फैसले का असर भारतीय प्रोफेशनल्स पर भी संभव
दरअसल एच-1बी वीजा अभी भी अमेरिकी कंपनियों के लिए कुशल विदेशी प्रेफोशनल्स को हायर करने का अहम तरीका है. इस वीजा के जरिए अमेरिका जाने वाले कई लोग बाद में अन्य वीजा कैटेगरी के जरिए वहां के स्थायी नागरिक बन जाते हैं. लेकिन प्रपोज्ड सैलरी रिवीजन से अमेरिकी कंपनियों के लिए काम करने वाले भारतीयों खासकर टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करने वालों पर खास प्रभाव देखा जा सकता है, जो लोग एच-1बी कार्यक्रम पर ज्यादा निर्भर हैं.
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अमेरिकी श्रम सचिव लोरी चावेज डिरेमर का कहना है कि ट्रंप प्रशासन यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि अमेरिकी कामगर अन्यायपूर्ण वेतन प्रथाओं से असहाय न हों. इस प्रस्ताव के तहत “प्रचलित वेतन” (प्रिविलेज वेजेज) की गणना का तरीका बदल जाएगा. ये वेतन न्यूनतम भुगतान तय करते हैं जो नियोक्ताओं को विदेशी कर्मचारियों को देना होता है.
एंट्री-लेवल वेतन तेजी से बढ़ेगा
नई योजना के मुताबिक, एंट्री-लेवल वेतन में तेजी से वृद्धि होगी. न्यूनतम स्तर लगभग 17वें पर्सेंटाइल से बढ़कर 34वें पर्सेंटाइल तक जाएगा और उच्चतम स्तर 67वें पर्सेंटाइल से बढ़कर 88वें पर्सेंटाइल तक पहुंच जाएगा. अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान वेतन स्तर बहुत कम हैं. उनका तर्क है कि इससे कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में सस्ते विदेशी श्रमिकों को भर्ती कर लेती हैं.
सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि एच-1बी श्रमिकों को समान नौकरियों में अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में अक्सर कम वेतन मिलता है. औसतन यह अंतर लगभग 10,000 डॉलर है. प्रस्ताव के अनुसार, यह अमेरिकी कर्मचारियों को कम वेतन वाले विदेशी श्रमिकों से बदलने का प्रलोभन पैदा करता है.
सैलरी बढ़ोतरी का मकसद क्या है?
मौजूदा नियमों के तहत, नियोक्ताओं को या तो प्रचलित वेतन या अमेरिकी कर्मचारियों को दिया गया वास्तविक वेतन देना होता है, और दोनों में अधिक लागू होता है. हालांकि प्रचलित वेतन न्यूनतम सीमा के रूप में कार्य करता है और आलोचकों का कहना है कि इसे बहुत कम रखा गया है. नए नियम का मकसद उस न्यूनतम सीमा को बढ़ाना है, ताकि यह समान कौशल और अनुभव वाले कर्मचारियों का सही प्रतिबिंब दिखाए. प्रस्ताव नए आवेदन पर लागू होगा और मौजूदा स्वीकृतियों में कोई बदलाव नहीं करेगा.
श्रम विभाग का अनुमान है कि प्रति कर्मचारी वार्षिक वेतन लगभग 14,000 डॉलर बढ़ सकता है, जिससे नियोक्ताओं के लिए श्रम लागत बढ़ जाएगी.
अधिकारियों का कहना है कि लक्ष्य श्रम बाजार में निष्पक्षता बहाल करना है और विदेशी कर्मचारियों को अमेरिकी वेतन को कम करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. संघीय रजिस्टर में 27 मार्च को प्रकाशित होने के बाद सार्वजनिक टिप्पणियां 60 दिनों तक स्वीकार की जाएंगी. प्रस्तावित बदलाव नियोक्ताओं और विदेशी पेशेवरों विशेष रूप से तकनीकी क्षेत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं.
इनपुट-IANS













