- चीन ने अमेरिकी बैन के बावजूद ईरान से तेल युआन में खरीदने के लिए बैंक ऑफ कुनलुन का पेमेंट सिस्टम बनाया था
- बैंक ऑफ कुनलुन ईरान-चीन तेल व्यापार का मुख्य वित्तीय माध्यम था, जो डॉलर लेन-देन को पूरी तरह बायपास करता था
- ईरानी तेल को नकली सर्टिफिकेट के जरिए मलेशिया का तेल बताकर चीन में आयात किया जाता था- रिपोर्ट
China Stand on US-Iran War: चीन सिर्फ ईरान से तेल नहीं खरीद रहा था, वह चुपचाप एक ऐसा पेमेंट सिस्टम बना रहा था जो अमेरिकी डॉलर को बायपास करता था. अब जब युद्ध ईरान को घेर रहा है और तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच रही है, तो यह सिस्टम फिर से चर्चा में आ गया है. मैग्नम फिनवेस्ट सर्विसेज के फाउंडर सौरभ जैन बताते हैं कि यह कैसे काम करता था. उनके अनुसार “अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों किया? असली वजह वह नहीं है जो आप सोचते हैं. यह एक ऐसे चीनी बैंक के बारे में है जिसका नाम आपने शायद कभी नहीं सुना होगा- बैंक ऑफ कुनलुन.”
कुनलुन एक छोटा कमर्शियल बैंक है, जिसे चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (CNPC) नियंत्रित करता है. जब अमेरिकी प्रतिबंधों ने ईरान की डॉलर तक पहुंच लगभग बंद कर दी, तब यह बैंक चीन-ईरान तेल व्यापार की मुख्य वित्तीय नस (financial artery) बन गया है. जैन बताते हैं कि इसे वह पेमेंट “लूप” कहते हैं.
भुगतान बैंक ऑफ कुनलुन के युआन खातों में जाता था. क्योंकि प्रतिबंधों के कारण डॉलर में लेन-देन लगभग असंभव था, इसलिए ईरान उन पैसों को ज़्यादातर सिर्फ चीन के अंदर ही खर्च कर सकता था- जैसे मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और उपभोक्ता सामान खरीदने में.
जैन कहते हैं, “यह एक परफेक्ट बंद लूप था.” ईरान को युआन मिलता है, वह उसे सिर्फ चीन में ही खर्च कर सकता है, उससे चीनी मशीनें और सामान खरीदता है, और वह पैसा फिर चीन की वित्तीय प्रणाली में चला जाता है और कभी डॉलर सिस्टम में वापस नहीं आता. उनके अनुसार “कोई अमेरिकी डॉलर जरूरी नहीं. बिल्कुल शून्य.”
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2012 में बैंक ऑफ कुनलुन पर लगा था बैन
2012 में अमेरिका की ट्रेजरी ने बैंक ऑफ कुनलुन पर प्रतिबंध लगाए थे, क्योंकि उसने ईरानी बैंकों के साथ, जिनमें ईरान का केंद्रीय बैंक भी शामिल था, बड़े लेन-देन किए थे. लेकिन चूंकि बैंक ऑफ कुनलुन पहले से ही पश्चिमी वित्तीय सिस्टम से काफी हद तक कटा हुआ था, इसलिए बीजिंग ने उसे उच्च-जोखिम वाले व्यापार के लिए एक सीमित चैनल के रूप में काम करने दिया.
ब्रिटेन के निवेश प्रबंधक डेविड विलियम स्कॉट बताते हैं कि “ईरान का लगभग 90% तेल चीन को निर्यात होता था.” यह तेल लगभग 10 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर, लगभग 13 लाख बैरल प्रतिदिन की मात्रा में बेचा जाता था और भुगतान डॉलर में नहीं बल्कि युआन में होता था. वह कहते हैं कि ईरानी बैंकों पर दबाव होने के कारण, उस युआन का बड़ा हिस्सा सीधे चीन को वापस चला जाता था, जहां उससे तैयार चीनी उत्पाद खरीदे जाते थे और वह भी खुदरा (रिटेल) कीमतों पर.
ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस में Asia FX के चीफ और रेट रणनीतिकार स्टीफन चिउ ने मंगलवार को एक नोट में लिखा कि ईरान युद्ध के दौरान युआन की गिरावट “शायद वही है जो चीन चाहता है,” क्योंकि बीजिंग अपने मुद्रा की स्थिरता को संभाल रहा है. दूसरे शब्दों में, बाहर से जो चीज बाजार में तनाव जैसी लगती है, उसे चीन की व्यापक आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार एक प्रबंधित (मैनेज किया हुआ) कदम भी माना जा सकता है.
वैश्विक स्तर पर बैंक ऑफ कुनलुन का यह चैनल अभी भी छोटा है. लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ रहा है, डॉलर के बिना चलने वाला यह तेल व्यापार लूप फिर से जांच और चर्चा के दायरे में आ गया है.













