क्यों विफल हुई अमेरिका-ईरान की बातचीत, अब पश्चिम एशिया की राजनीति किस दिशा में जाएगी

अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम समझौते को स्थायी बनाने के लिए पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई बातचीत बेनतीजा रही. दोनों देश अपनी अपनी स्थिति से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए. अब इसका मध्य पूर्व की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा बता रहे हैं डॉक्टर अमर सिंह.

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नई दिल्ली:

इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे तक चली मैराथन वार्ता के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस शांति समझौता नहीं हो पाया. यह विफलता केवल एक कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे गहरे अविश्वास, वैचारिक टकराव और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है. इसकी जड़ें 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति तक जाती हैं. हालांकि दो सप्ताह के युद्धविराम में अभी लगभग नौ दिन शेष है. बैक-चैनल कूटनीति के माध्यम से संवाद जारी रहने की उम्मीद है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह आशा है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी 'रेड लाइन्स' में कुछ लचीलापन दिखाएंगे. लेकिन मौजूदा घटनाक्रम संकेत देते हैं कि स्थिति अभी भी अत्यंत नाजुक बनी हुई है.

टकराव का बिंदु बना होर्मुज स्ट्रेट 

वर्तमान संकट का सबसे खतरनाक पहलू होर्मुज स्ट्रेट को लेकर उभरता टकराव है. युद्धविराम लागू होने के बाद अब अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती बंद होर्मुज स्ट्रेट को खोलने की है, जो की युद्ध के पूर्व खुला हुआ था. यह संकरा जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति विशेषकर एशिया के देशों की ऊर्जा आपूर्ति की धुरी है, जहां से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल और गैस की आपूर्ति गुजरती है. इसके अलावा खेती से लेकर हाई टेक्नोलॉजी तक की इंडस्ट्रीज़ के लिए ज़रूरी पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट और सल्फर भी यहीं से जाता है. इस पर नियंत्रण या टोल वसूलने की क्षमता ईरान का एक मज़बूत स्ट्रेटेजिक टूल बनकर उभरा है. यह ईरान के लिए परमाणु हथियार बनाने के मुकाबले ज़्यादा किफायती और तुरंत असर करने वाला बचाव का तरीका साबित हो रहा है. शांति वार्ता विफल होने के बाद स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है. संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका सभी ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी (Blockade) कर सकता है. इसका अर्थ है कि होर्मुज स्ट्रेट का लगभग पूर्ण अवरोध, जहां ईरान अन्य देशों के जहाजों को गुजरने नहीं देगा और अमेरिका ईरानी जहाजों को आने-जाने या उन्हें सप्लाई करने वाले किसी भी पोत को अनुमति नहीं देगा. यह कदम एक बड़ा एस्केलेशन होगा, जो केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक संकट का रूप ले सकता है. 

दूसरा प्रमुख मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. ईरान और छह देशों (P5+1)—अमेरिका सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य और जर्मनी के बीच 2015 में हुआ संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) Donald Trump प्रशासन ने 2018 में एकतरफा समाप्त कर दिया था. उसके बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन तेज कर दिया. जून 2025 के 'ट्वेल्व-डे वॉर' और फरवरी 2026 के हमलों ने ईरान की परमाणु क्षमता को काफी क्षति पहुंचाई है, लेकिन इसे पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सका है. IAEA रिपोर्ट्स के अनुसार युद्ध से पहले ईरान के पास 440.9 किलोग्राम 60 फीसदी संवर्धित यूरेनियम था, जो हथियार-ग्रेड (90 फीसदी) बनाने के लिए कुछ कम था. हमलों के बाद IAEA निरीक्षण बंद हो गया और स्टॉकपाइल की सटीक स्थिति अज्ञात बनी हुई है. अमेरिका ईरान से परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने, उच्च स्तर का संवर्धन रोकने, स्टॉकपाइल IAEA को सौंपने और पूर्ण अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करने की मांग कर रहा है. वहीं ईरान दावा करता है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और वह अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा. हालांकि इस युद्ध के शुरू होने के पूर्व ओमान की मध्यस्थता मे चल रही वार्ता में ईरान ने इन सभी मुद्दों पर सकारात्मक रुख अपनाया था.  

मध्य पूर्व में ईरान की बढ़ती भूमिका

तीसरा महत्वपूर्ण कारण क्षेत्रीय राजनीति है. मध्य-पूर्व में ईरान की बढ़ती भूमिका इराक, सीरिया और लेबनान में स्पष्ट है. ईरान हिजबुल्लाह, हमास और हूती जैसे प्रॉक्सी समूहों के जरिए 'प्रतिरोध की धुरी'(Axis of Resistance) बनाए रखना चाहता है, जो अमेरिका और इज़रायल के लिए बड़ी चुनौती है. इसी संदर्भ में इज़रायल ने लेबनान में लितानी नदी के दक्षिण में करीब 30 किमी तक का 'सुरक्षा बफर जोन' बनाने की घोषणा की है और उस पर लगातार हमले कर रहा है. इसका उद्देश्य हिजबुल्लाह के रॉकेट और एंटी-टैंक हमलों को रोकना है. इससे लेबनान की संप्रभुता प्रभावित हो रही है और लाखों लोग विस्थापित हैं. ईरान शांति वार्ता को क्षेत्रीय बनाने पर जोर दे रहा है. ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर घालिबाफ ने कहा है कि लेबनान और पूरी 'प्रतिरोध की धुरी', संघर्षविराम का अभिन्न अंग है. तेहरान इसे द्विपक्षीय मुद्दा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का हिस्सा मानता है. वहीं, अमेरिका और इज़रायल, लेबनान को संघर्ष विराम से बाहर रखना चाहते हैं, इससे तनाव बढ़ रहा है.

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इस पूरे घटनाक्रम में यह स्पष्ट होता है कि यह केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का हिस्सा है. अमेरिका जहां अपने सहयोगियों, विशेषकर इज़रायल की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है, वहीं ईरान इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है. अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आने वाले दिनों में दोनों देश अपनी 'रेड लाइन्स' को नरम करेंगे या फिर यह संघर्ष एक नए और अधिक जटिल चरण में प्रवेश करेगा.

अविश्वास का बढ़ता दायरा

अमेरिका–इज़रायल–ईरान संघर्ष में मौजूदा स्ट्रेटेजिक ठहराव में कुछ मूलभूत प्रश्न निहित हैं, क्या अमेरिका और इज़रायल यह भरोसेमंद आश्वासन दे सकते हैं कि वे भविष्य में नए हमले नहीं करेंगे और क्या ऐसे आश्वासनों पर विश्वास किया जा सकता है? समान रूप से महत्वपूर्ण यह भी है कि क्या ईरान होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से वैश्विक नौवहन को प्रभावित करने की अपनी क्षमता पर आवश्यक सीमाएं स्वीकार करने के लिए तैयार है. इसके साथ ही ईरान द्वारा अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने और हिजबुला, हमास और हूती जैसे संगठनों पर नियंत्रण रखने जैसे प्रश्न किसी भी दीर्घकालिक समझौते की आधारशिला हैं, किंतु वर्तमान परिस्थितियों में सभी पक्ष एक-दूसरे के इरादों को लेकर गहरे अविश्वास से ग्रस्त हैं.

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डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम को प्रारंभ में एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु गहराई से विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि यह एक मजबूरी में लिया गया निर्णय था. अमेरिका, जिसने इस युद्ध में निर्णायक जीत की अपेक्षा की थी, अपने घोषित लक्ष्यों ईरान की सैन्य क्षमता को समाप्त करना, उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकना और उसकी क्षेत्रीय शक्ति को कमजोर करना को हासिल करने में विफल रहा. वहीं दूसरी ओर अपने मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर और इकॉनमी को काफ़ी नुकसान होने के बावजूद, ईरान ने मज़बूती दिखाई है. उसके पास अब भी मिसाइल और ड्रोन क्षमताएं मौजूद हैं. उसकी नेतृत्व-व्यवस्था देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभाव बनाए रखने में सक्षम रही है. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट बंद कर वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित की, इससे अमेरिका पर दबाव बढ़ा है. हालांकि, ईरान में तबाही का पैमाना बहुत बड़ा है. कई शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर (रिफाइनरी, पावर प्लांट, पुल) तबाह हो गया. आर्थिक गतिविधियां ठप हो गईं, महंगाई 100-200 फीसदी बढ़ गई, खाद्य पदार्थों की कमी हुई और आम लोगों का जीवन बेहद कठिन हो गया है. बेरोजगारी बढ़ी और बुनियादी जरूरतें प्रभावित हुई हैं.

अमेरिका को क्यों हटना पड़ा पीछे

इस परिस्थिति ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की गहरी कमजोरियों को भी उजागर किया है. विशेष रूप से अमेरिकी सुरक्षा गारंटी की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठने लगे हैं, खासकर उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच. यह युद्ध अमेरिका की रणनीतिक सीमाओं को भी सामने लाता है, जहां अपेक्षाकृत मात्र 40 दिन के युद्ध के बाद उसे पीछे हटना पड़ा और उसके घोषित उद्देश्य अधूरे रह गए. परिणामस्वरूप, उसकी वैश्विक विश्वसनीयता और नेतृत्व क्षमता पर संदेह गहरा हुआ है. यदि अमेरिका इतने महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असमर्थ या अनिच्छुक दिखता है तो उसके व्यापक अंतरराष्ट्रीय आश्वासनों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है. इस भरोसे के क्षरण के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, इनमें परमाणु और पारंपरिक हथियारों की दौड़ में तेजी, नए सामरिक गठबंधनों का उभरना और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्थाओं में व्यापक पुनर्संरचना शामिल है. ऐसे परिदृश्य में देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिक आत्मनिर्भर और स्वायत्त रणनीतियों की ओर अग्रसर हो सकते हैं.

इस संघर्ष का प्रभाव केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे क्षेत्र विशेषकर खाड़ी देशों पर गहराई से पड़ा है. खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों ने वैश्विक व्यापार, पर्यटन और वित्तीय केंद्र बनने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया था. अब उनकी स्थिरता और सुरक्षा की छवि बुरी तरह प्रभावित हुई है. ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से यूएई, सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत की ऊर्जा सुविधाएं, हवाई अड्डे और बंदरगाह क्षतिग्रस्त हुए. पर्यटन क्षेत्र को अकेले $34-56 बिलियन का नुकसान हुआ, जबकि दैनिक आर्थिक क्षति सैकड़ों मिलियन डॉलर तक पहुंच गई. यद्यपि अमेरिका के साथ उनके संबंध टूटने की संभावना कम है, फिर भी सुरक्षा के लिए केवल एक शक्ति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं, यह धारणा मजबूत हुई है.ईरान के हमलों ने दिखाया कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों की उपस्थिति खाड़ी देशों को 'Collateral Damage' का निशान बना सकती है. अब ये देश एक अधिक आत्मनिर्भर, आक्रामक और सतर्क ईरान के साथ सह-अस्तित्व का सामना कर रहे हैं. परिणामस्वरूप, खाड़ी देश अपनी सुरक्षा और कूटनीति में विविधता लाने की दिशा में गंभीर हो गए हैं. वे यूरोप, तुर्की, पाकिस्तान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे नए साझेदारों के साथ सुरक्षा साझेदारियां बढ़ा रहे हैं. इसके साथ ही, स्वदेशी रक्षा उद्योग और GCC के अंदर संयुक्त वायु रक्षा प्रणाली विकसित करने पर जोर दे रहे हैं. अमेरिका पर निर्भरता अब संदेह के घेरे में है, जिससे बहुपक्षीय साझेदारियां और क्षेत्रीय स्वायत्तता की ओर रुझान बढ़ा है.

यह संकट में चीन के लिए कैसा अवसर लेकर आया है

इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक शक्ति संतुलन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है. रूस ने ऊर्जा कीमतों में वृद्धि से उत्पन्न परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है, जबकि चीन एक अपेक्षाकृत स्थिर और संतुलित शक्ति के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है. यह संकट बीजिंग के लिए एक रणनीतिक अवसर भी लेकर आया है, जिसके माध्यम से वह अमेरिकी सैन्य क्षमता, उसकी प्रतिक्रिया की सीमाओं और वैश्विक प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता का सूक्ष्म आकलन कर सकता है. भविष्य में यदि चीन कोई आक्रामक कदम उठाता है, तो वह इस अनुभव के आधार पर अधिक सटीक रूप से समझ सकेगा कि अमेरिका किन परिस्थितियों में और किस सीमा तक हस्तक्षेप करने को तैयार होगा. यह परिदृश्य स्पष्ट संकेत देता है कि वैश्विक शक्ति संरचना क्रमिक रूप से परिवर्तन की ओर अग्रसर है और अमेरिका की स्थिति अब पहले जैसी निर्विवाद नहीं रह गई है.

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दूसरी ओर चीन, जो मध्य-पूर्वी ऊर्जा संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर है, क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करने में गहरी रुचि रखता है.इसी कारण वह ईरान को वार्ता के लिए प्रेरित कर रहा है और भविष्य में कूटनीतिक प्रयासों में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकता है. इसके साथ ही, रूस और चीन दोनों ही विभिन्न स्तरों पर ईरान के साथ सहयोग बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे हैं चाहे वह ऊर्जा, रक्षा या कूटनीतिक समर्थन के रूप में हो, जिससे पश्चिमी दबावों के बीच तेहरान की रणनीतिक स्थिति को मजबूती मिलती है.

समग्र रूप से, ये घटनाएं वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे क्रमिक लेकिन गहरे बदलावों की ओर संकेत करती हैं, जिनके प्रभाव केवल मध्य-पूर्व तक सीमित न रहकर व्यापक वैश्विक राजनीति पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होंगे. ऐसे परिदृश्य में अब जरूरत इस बात की है कि कूटनीति के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता दिखाई जाए, जिसे अंतरराष्ट्रीय नियमों विशेषकर बल प्रयोग की सीमाओं और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की स्वतंत्र आवाजाही को सुनिश्चित करने वाले विश्वसनीय तंत्रों का समर्थन प्राप्त हो.

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(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

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