- ईरान विद्रोह के बीच अमेरिका के संभावित सैन्य हमले को खाड़ी सहयोगी देशों ने लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त की हैं
- मिडिल ईस्ट के कई खाड़ी देशों को ईरान पर अमेरिकी हमले से क्षेत्र में अराजकता और बदले की कार्रवाई का डर है
- कई खाड़ी देश ईरान के कमजोर होने के बजाय इजरायल के क्षेत्रीय प्रभुत्व बढ़ने की आशंका से भी चिंतित हैं
ईरान पर अमेरिका हमला करेगा या नहीं? यह सवाल पूरी दुनिया के सामने यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा हुआ है. ईरान में जनता का विद्रोह जारी है और वहां कम से कम 2500 लोगों की मौत हो चुकी है. ईरान की सरकार इस विद्रोह को दबाने के लिए हर हथकंडा अपना रही है तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी वक्त ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करने का धमकी दे रहे हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका के इस संभावित हमले ने खाड़ी में मौजूद अमेरिका के सहयोगी देशों को डरा दिया है. उनमें से कुछ ने सार्वजनिक और कुछ ने निजी तौर पर ट्रंप सरकार से हमले की जगह कूटनीति चुनने की पैरवी की है. सवाल है कि आखिर उन्हें किस बात का डर है?
1- मिडिल ईस्ट में अराजकता फैलने और ईरान के बदले का डर
मिडिल ईस्ट में मौजूद सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को खाड़ी राजतंत्र (गल्फ मोनार्कीज) के रूप में जाने जाते हैं और ये अमेरिका के सहयोगी देश माने जाते हैं. इन देशों को डर होगा कि अमेरिका-ईरान के बीच तनाव बढ़ने या ईरान में खामेनेई सरकार के पतन का प्रभाव पूरे मिडिल ईस्ट में फैल सकता है. इससे सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और व्यापार और पर्यटन के लिए सुरक्षित केंद्र के रूप में छवि को खतरा हो सकता है. जब पिछले साल जून में अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला किया था तो ईरान ने जवाबी कार्रवाई की थी, कतर में अमेरिकी बेस पर हमला किया था. इस हमले ने इन देशों की चिंताओं को मजबूत किया है. इस बार भी ईरानी हमले की संभावना को देखते हुए अमेरिका और ब्रिटेन, दोनों ने कतर मिलिट्री बेस से अपने कुछ सेना को हटा लिया है.
2- इजरायल ज्यादा खतरनाक या ईरान?
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में विवियन नेरेइम लिखती हैं कि कई खाड़ी देश अब चिंतित हैं कि ईरान के खामेनेई शासन को हटाने या कमजोर करने से मिडिल ईस्ट में इजरायल का प्रभुत्व अनियंत्रित हो सकता है. विश्लेषकों का तर्क है कि खाड़ी देशों को डर है कि इजरायल किसी भी तरह के शक्ति शून्यता का फायदा उठा सकता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता बेहतर होने के बजाय और खराब हो जाएगी.
3- हमले की जगह कूटनीति पर जोर
ओमान अमेरिका में बैठे अंकल सैन और ईरान के इस्लामिक शासन के बीच लंबे समय से मध्यस्थ रहा है. उसने ट्रंप प्रशासन को ईरान पर हमला न करने की सलाह दी है. कतर ने भी बातचीत की मांग दोहराते हुए इस बात पर जोर दिया है कि आंतरिक संघर्षों और क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने के लिए ताकत की बजाय बातचीत की आवश्यकता है. कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने मंगलवार को संवाददाताओं से कहा कि शांतिपूर्वक स्थिति को शांत करने का प्रयास करने वाले देशों में कतर भी शामिल है. उन्होंने कहा, "क्षेत्र में बड़ी चुनौतियों को देखते हुए हम सभी को बातचीत की मेज पर लौटने की आवश्यकता है."
4- खाड़ी ईरान के खिलाफ एकजुट नहीं
खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) में छह अरब देश शामिल हैं: सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर, ओमान, और संयुक्त अरब अमीरात (UAE). यह फारस की खाड़ी से सटे देशों का एक क्षेत्रीय राजनीतिक और आर्थिक संघ है, जिसका मुख्यालय रियाद, सऊदी अरब में है. सच्चाई यह है कि खाड़ी सहयोग परिषद भी ईरान के मुद्दे पर एकजुट नहीं है. कुवैत, ओमान और कतर ईरान के साथ अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखते हैं. जबकि सऊदी अरब और बहरीन ने प्रतिकूल संबंध के बावजूद तनाव कम करना चाहते हैं, खासकर रियाद द्वारा 2023 में तेहरान के साथ संबंध बहाल करने के बाद. संयुक्त अरब अमीरात को खासतौर से जटिल दुविधा का सामना करना पड़ रहा है- उसे ईरान के सुरक्षा खतरा भी है लेकिन वह ईरान का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भी है.
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