- अमेरिका की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिक मिडिल ईस्ट में तैनाती के लिए पहुंच चुके हैं.
- अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि तैनाती के स्थान की जानकारी साझा नहीं की गई है, लेकिन यह कदम अपेक्षित था.
- इनका इस्तेमाल खार्ग द्वीप पर कब्जा करने या परमाणु ठिकानों से यूरेनियम निकालने के लिए किया जा सकता है.
मिडिल-ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने बड़ा सैन्य कदम उठाया है. रायटर्स के मुताबिक, अमेरिका की एलीट 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिक मिडिल ईस्ट पहुंच चुके हैं, जबकि हाल ही में करीब 2500 अमेरिकी मरीन भी इस क्षेत्र में तैनात किए गए हैं. फिलहाल ईरान पर जमीनी हमले या सीधे युद्ध को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन इन सैनिकों की मौजूदगी से अमेरिकी राष्ट्रपति के पास सैन्य कार्रवाई के विकल्प बढ़ गए हैं. इन बलों का इस्तेमाल खार्ग द्वीप, ईरान के परमाणु ठिकानों या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा जैसे अभियानों में किया जा सकता है.
रायटर्स के मुताबिक, दो अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि एलीट 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिक मिडिल ईस्ट पहुंच गए हैं. उत्तरी कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग में तैनात पैराट्रूपर्स को इस क्षेत्र में भेजा गया है, जो हजारों अतिरिक्त नौसैनिकों, मरीन सैनिकों और विशेष अभियान बलों में शामिल हो गए हैं. साथ ही करीब 2,500 मरीन सैनिक भी मिडिल ईस्ट पहुंच चुके हैं.
सैनिकों की तैनाती कहां? अभी तक साफ नहीं
रॉयटर्स ने सबसे पहले 18 मार्च को खबर दी थी कि ट्रंप प्रशासन मध्य पूर्व में हजारों अतिरिक्त अमेरिकी सैनिकों की तैनाती पर विचार कर रहा है. इस कदम से ईरान की धरती के अंदर भी सेना तैनात करने के विकल्प खुल जाएंगे. अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि सैनिकों की तैनाती कहां की जा रही है, लेकिन कहा कि इस कदम की उम्मीद थी.
अतिरिक्त सैनिकों में 82वीं एयरबोर्न डिवीजन मुख्यालय के कुछ सैनिक, कुछ रसद और अन्य सहायक बल और एक ब्रिगेड लड़ाकू दल शामिल हैं. एक सूत्र ने बताया कि ईरान में सेना भेजने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन वे क्षेत्र में भविष्य में संभावित अभियानों के लिए अपनी क्षमता बढ़ाएंगे.
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के पास ये हैं विकल्प
ईरान युद्ध में इन सैनिकों का इस्तेमाल कई उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, जिनमें खार्ग द्वीप (जहां से ईरान का 90% तेल निर्यात होता है) पर कब्जे का प्रयास भी शामिल है. इस महीने की शुरुआत में रायटर्स ने बताया था कि ट्रंप प्रशासन ने द्वीप पर कब्जा करने के अभियान को लेकर चर्चा की थी. हालांकि ऐसा कदम बेहद जोखिम भरा होगा, क्योंकि ईरान मिसाइलों और ड्रोन के जरिए द्वीप तक पहुंच सकता है.
साथ ही रायटर्स ने पहले भी बताया है कि प्रशासन ने ईरान के अंदर ग्राउंड फोर्सेज का इस्तेमाल करके अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम निकालने पर चर्चा की है, हालांकि इस विकल्प का मतलब यह हो सकता है कि अमेरिकी सैनिकों को ईरान के अंदरूनी हिस्सों में संभावित रूप से लंबे समय तक रहना पड़े, जिससे वे जमीन के बहुत नीचे दबे पदार्थ निकाल सकें.
ट्रंप प्रशासन की अंदरूनी चर्चाओं में ईरान में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती पर भी विचार किया गया है, जिससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल टैंकरों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया जा सके. हालांकि यह मिशन मुख्य रूप से वायु और नौसेना बलों के माध्यम से पूरा किया जाएगा, लेकिन इसका अर्थ ईरान के तट पर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती भी हो सकता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोमवार को कहा कि अमेरिका ईरान में जंग को खत्म करने के लिए अधिक तर्कसंगत शासन के साथ बातचीत कर रहा है, लेकिन उन्होंने ईरान को होर्मुज स्ट्रेट खोलने या अपने तेल कुओं और बिजली संयंत्रों पर अमेरिकी हमलों का सामना करने की चेतावनी दोहराई.
ट्रंप के लिए उलटा भी पड़ सकता है दांव
अमेरिकी ग्राउंड फोर्सेज का भले ही सीमित उपयोग किया जाए लेकिन यह ट्रंप के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है, क्योंकि ईरान अभियान को लेकर अमेरिकी जनता का समर्थन कम है और ट्रंप ने चुनाव से पहले मिडिल ईस्ट में अमेरिका को नए संघर्षो में उलझाने से बचाने का वादा किया था.
अमेरिका ने ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को अपना अभियान शुरू किया था जिसके बाद से अमेरिका ने 11 हजार से अधिक ठिकानों पर हमले किए हैं. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत 300 से अधिक अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं और 13 सैनिकों की जान चली गई है.














