PM मोदी ने मलेशिया में देखी 'रामलीला', जानें क्या है 'हिकायत सेरी राम' और इसका इतिहास

मलेशिया में इस्‍लाम का प्रभाव बढ़ने के बावजूद भी रामकथा की निरंतरता बनी हुई है और यह दर्शाता है कि मलेशिया के जन जीवन पर रामायण का कितना असर है. पीएम मोदी मलेशिया दौरे पर हैं और इस दौरान उन्‍होंने ‘हिकायत सेरी राम’ पर आधारित पारंपरिक मलय कठपुतली प्रदर्शन देखा. 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अकादमी अर्जुनसुकमा के कलाकारों द्वारा 'तिता सेरी राम' का कठपुतली प्रदर्शन देखा.
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  • मलेशिया में रामायण आधारित ‘हिकायत सेरी राम’ का स्थानीय संस्कृति और धार्मिक विश्वासों के साथ गहरा जुड़ाव है.
  • PM नरेंद्र मोदी ने अपने मलेशिया के दौरे के दौरान मलय कठपुतली प्रदर्शन ‘तिता सेरी राम’ को देखा.
  • ‘हिकायत सेरी राम’ की रचना 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच की है, जिसमें इस्लाम का काफी प्रभाव है.
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नई दिल्ली:

रामकथा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण‑पूर्व एशिया में भी उसने गहरी सांस्कृतिक छाप छोड़ी है. मलेशिया में रामायण पर आधारित प्रसिद्ध रचना ‘हिकायत सेरी राम' इसका अहम उदाहरण है. मलेशिया में इस्‍लाम का प्रभाव बढ़ने के बावजूद भी रामकथा की निरंतरता बनी हुई है और यह दर्शाता है कि मलेशिया के जन जीवन पर रामायण का कितना असर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दो दिवसीय दौरे पर मलेशिया में हैं. इस दौरान पीएम मोदी ने ‘हिकायत सेरी राम' पर आधारित पारंपरिक मलय कठपुतली प्रदर्शन 'तिता सेरी राम' देखा. 

पीएम मोदी ने एक्‍स पर पोस्‍ट में कहा कि कुआलालंपुर में भारतीय समुदाय द्वारा स्वागत समारोह के दौरान अकादमी अर्जुनसुकमा के कलाकारों द्वारा 'तिता सेरी राम' का कठपुतली प्रदर्शन देखा. साथ ही इस प्रदर्शन की तारीफ करते हुए कहा कि इस प्रदर्शन ने खूबसूरती से उन साझा सांस्कृतिक धागों को प्रतिबिंबित किया है, जो हमें आपस में जोड़ते हैं और साथ ही रामायण की प्रासंगिकता को भी विभिन्न देशों में उजागर किया है. 

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‘हिकायत सेरी राम' की 13वीं से 17वीं शताब्‍दी में रचना 

मलेशिया में 13वीं शताब्‍दी के आसपास इस्‍लाम पहुंचा. बावजूद इसके रामायण परंपरा जीवित रही. मलय रामायण की सबसे प्राचीन पांडुलिपि वर्ष 1633 ईस्वी में ऑक्सफोर्ड के बोडलियन लाइब्रेरी में जमा कराई गई थी. यह बताता है कि इस्लाम के आगमन के बाद भी मलय समाज रामकथा से जुड़ा रहा. 

मलेशिया में रामकथा का सबसे विस्तृत रूप ‘हिकायत सेरी राम' में मिलता है. हालांकि इसके लेखक अज्ञात हैं. माना जाता है कि इसकी रचना तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच हुई. इसके अलावा ‘पातानी रामकथा' और ‘हिकायत महाराज रावण' जैसी लोककथाएं भी मलय राम परंपरा को समृद्ध करती हैं.

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‘हिकायत सेरी राम' पर इस्‍लाम का भी है प्रभाव 

‘हिकायत सेरी राम' की कथा कई विचित्र और अनोखे प्रसंगों से भरी है. इसका आरंभ रावण की जन्मकथा से होता है, जिसमें उसे दस सिर और बीस भुजाओं वाले शासक के रूप में दिखाया गया है. रावण को पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल का राजा बनाए जाने की कथा में ऐसे कई उल्लेख मिलते हैं, जो इस रचना पर इस्लामी प्रभाव को दर्शाते हैं. 

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इस कथा में रावण के तीन विवाह, उसके पुत्रों—इंद्रजित, महिरावण और गंगमहासुर की उत्पत्ति और मंदोदरी से जुड़ी कथा पारंपरिक वाल्मीकि रामायण से काफी अलग है. दशरथ, राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की कहानियां भी यहां नए रूप और प्रतीकों के साथ सामने आती हैं. 

सीता स्‍वयंवर की कथा का दिखा अलग अंदाज

सीता के जन्‍म और स्वयंवर की कथा भी ‘हिकायत सेरी राम' में अलग अंदाज में मिलती है. सीता को लोहे के बक्से में समुद्र में फेंके जाने और बाद में ऋषि कलि द्वारा पाए जाने की कथा मलय लोकविश्वासों से जुड़ती हैं. विवाह की शर्त के रूप में 40 ताड़ के वृक्षों को एक बाण से भेदने की शर्त रखी जाती है. 

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पूरी रचना में राम को ‘सेरी राम' के नाम से जाना गया है और कथा के आखिर में सीता‑राम के पुनर्मिलन के बाद अयोध्या के निर्माण का उल्लेख है. यह रचना दिखाती है कि कैसे रामकथा ने स्थानीय संस्कृति, धर्म और लोकविश्वासों के साथ खुद को ढाल लिया. 

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