आगे कुआं, पीछे खाई.
पाकिस्तान इस वक्त कुछ ऐसी ही असहज स्थिति में फंस चुका है. यह मुश्किल तब शुरू हुई जब डोनाल्ड ट्रंप ने 'अब्राहम अकॉर्ड्स' की फाइल को एक बार फिर ओवल ऑफिस की मेज पर ला पटका है. ट्रंप इसे ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता और पूरे क्षेत्र के 'नए नक्शे' के तौर पर पेश कर रहे हैं.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से दुनिया जिस ऊर्जा संकट से जूझ रही है, उसे देखते हुए जंग का खत्म होना एक अच्छी खबर होगी. पाकिस्तान के लिए भी यह राहत की बात होगी, जो खुद को शांति प्रक्रिया में एक 'अहम खिलाड़ी' मानता है और जंग रुकने का कुछ क्रेडिट खुद भी लेना चाहेगा.
लेकिन इसके बदले मिलने वाला फायदा उतना सीधा नहीं है, काफी उलझा हुआ है. ये पाकिस्तानी फील्ड मार्शल असीम मुनीर की ही देन है कि पाकिस्तान खुद के घरेलू मोर्चे पर स्थिति सुधारने की इस वैश्चिक चक्रव्यूह में फंस गया है.
ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में तैयार हुए 'अब्राहम अकॉर्ड्स' को ही इस क्षेत्रीय शांति की बुनियाद बनाने का फैसला किया है. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर पाकिस्तान इस शांति प्रक्रिया की मेज पर बैठना चाहता है, तो उसे फिलिस्तीन के मसले का 'उचित समाधान' किए बिना ही इजरायल को मान्यता देनी होगी. दूसरा रास्ता यह है कि वह अपनी राजनीतिक और वैचारिक सोच को बचाने के लिए इस समझौते से होने वाले आर्थिक और रणनीतिक फायदों को छोड़ दे.
पाकिस्तान का वही पुराना राग
अब्राहम अकॉर्ड्स पर पाकिस्तान का स्टैंड हमेशा एक जैसा रहा है. वह तब तक इस समझौते पर दस्तखत नहीं करेगा जब तक कि पूर्वी यरुशलम की राजधानी वाले एक स्वतंत्र फिलिस्तीन देश के निर्माण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसी बात पर जोर देते हुए कहा, "मुझे नहीं लगता कि हमें किसी ऐसे समझौते में शामिल होना चाहिए जो हमारी बुनियादी विचारधारा के खिलाफ हो. हमारा रुख बिल्कुल साफ है कि (1967 से पहले की सीमाओं वाले फिलिस्तीनी राज्य के बिना) कोई भी समझौता मंजूर नहीं है."
यह रुख पाकिस्तान की उस छवि को दिखाता है जिसमें वह खुद को 'इस्लामी दुनिया का अगुआ' मानता है. इसके पीछे पाकिस्तान का घरेलू माहौल भी है, जिसमें धार्मिक दल और सेना का एक बड़ा धड़ा शामिल है. इन दोनों का वहां की सियासत पर गहरा असर है और सालों से उनकी राजनीति इजरायल-विरोधी बयानों पर टिकी है.
ऐसे में प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ की मौजूदा सरकार के पास इजरायल और अब्राहम अकॉर्ड्स के सवाल पर पीछे हटने या कोई बीच का रास्ता निकालने की गुंजाइश लगभग न के बराबर है.
अगर थोड़ी-बहुत गुंजाइश थी भी, तो वह भी अब खत्म हो रही है. वजह यह है कि मिडिल ईस्ट और उसके बाहर के सुन्नी अरब देश इजरायल को लेकर अपना रुख बदल रहे हैं. वे संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, सूडान और मोरक्को की राह पर चलते हुए इजरायल को मान्यता देने और उससे मिलने वाले फायदों को समेटने की तैयारी में हैं.
इन फायदों में बड़े आर्थिक मौके (द्विपक्षीय व्यापार को अरबों डॉलर तक ले जाना) और अमेरिका के साथ मजबूत सैन्य और सुरक्षा संबंध शामिल हैं. और इस क्लब में शामिल होने की फीस (यानी इजरायल को मान्यता देना) लाज़मी है.
सऊदी अरब: खेल पलटने वाला 'किंगमेकर'
सऊदी अरब इस समय ताकत के दो बड़े मोर्चों पर खड़ा है. पहला, इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों का कस्टोडियन होने के नाते अरब जगत की साख, और दूसरा, खाड़ी (Gulf) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का रणनीतिक दबदबा.
इस्लामाबाद की तरह रियाद ने भी कहा है कि इजरायल के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की शुरुआत तभी हो सकती है जब 'फिलिस्तीन राज्य का साफ रास्ता' तय हो जाए. इसलिए, ट्रंप की इस मांग पर सऊदी अरब क्या फैसला लेता है, इससे न सिर्फ मिडिल ईस्ट की पूरी सियासत बदल जाएगी, बल्कि पाकिस्तान भी ऐसे रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाएगा जिस पर वह नहीं जाना चाहता.
अगर सऊदी अरब इजरायल को मान्यता दे देता है, तो पाकिस्तान के लिए अपनी तमाम वैचारिक आपत्तियों के बावजूद इस फैसले को नजरअंदाज करना नामुमकिन हो जाएगा. ऐसा न करने पर उस पर कूटनीतिक और आर्थिक तौर पर अलग-थलग पड़ने का खतरा मंडराने लगेगा. यही वजह है कि ट्रंप के लिए सऊदी अरब उनके हुकुम का इक्का है.
इसके बावजूद, सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ आपसी रक्षा समझौता इस पूरे खेल को प्रभावित कर सकता है. यह डील ट्रंप के 'साथ आओ या बाहर रहो' के अल्टीमेटम को कमजोर करती है.
अमेरिका ने इस अकॉर्ड्स में शामिल होने की शर्त को ईरान के साथ होने वाले (संभावित) शांति समझौते और अमेरिकी-इजरायली सुरक्षा कवच का हिस्सा बनने की 'पहली सीढ़ी' बताया है.
लेकिन सऊदी-पाक समझौते से रियाद को एक वैकल्पिक रास्ता मिल जाता है. इसमें आगे चलकर चीन भी शामिल हो सकता है. यह विकल्प सऊदी को अमेरिका-इजरायल की सुरक्षा गारंटी पर निर्भर रहने से बचा सकता है. बेशक, जानकार मानते हैं कि पाक-चीन का सैन्य कवर अमेरिकी-इजरायली विकल्प के सामने टिक नहीं पाएगा, लेकिन एक विकल्प का मौजूद होना ही सऊदी अरब को अमेरिकी दबाव का सामना करने की ताकत देता है. सऊदी अरब जितनी देर तक इस दबाव को झेलेगा, पाकिस्तान के लिए राहत उतनी ही बढ़ेगी, क्योंकि इससे एकमुश्त सुन्नी अरब ब्लॉक बनने की बात कमजोर पड़ जाएगी.
भारत की मजबूत स्थिति
दूसरी तरफ, भारत के लिए यह स्थिति पूरी तरह अनुकूल है. दिल्ली पहले से ही इस घेरे के अंदर है. भारत के इजरायल और खाड़ी के प्रमुख देशों जैसे यूएई, कतर, बहरीन और जॉर्डन के साथ पहले से ही करीबी रिश्ते हैं, इसलिए उसे किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है.
लेकिन दिल्ली ने सऊदी अरब के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने में भारी निवेश किया है और वह चाहेगा कि यह रिश्ता और बढ़े. इसका मतलब यह है कि सऊदी-अमेरिका-इजरायल का एक मंच पर आना उस क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बदल देगा जो भारत की तेल, गैस और फर्टिलाइजर (खाद) की जरूरतों के लिए बेहद जरूरी है, भले ही भारत अब अन्य देशों से भी ये चीजें ले रहा है. यह खतरा तुरंत तो नहीं है, लेकिन यह उस साख और बाजार को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकता है जिसे भारत सरकार ने अपनी ऊर्जा और व्यापारिक जरूरतों के लिए बहुत मेहनत से तैयार किया है.
आखिर में बात यह है कि अगर सऊदी अरब इस समझौते में शामिल होने से इनकार करता है, तो मिडिल ईस्ट के लिए अमेरिका का वह प्लान पटरी से उतर जाएगा जिसके तहत वह इजरायल को केंद्र में रखकर एक नई सुरक्षा और व्यापार व्यवस्था बनाना चाहता है.
लेकिन अगर सऊदी अरब हां कह देता है, तो पाकिस्तान बड़ी मुसीबत में फंस जाएगा. या तो वह इजरायल को स्वीकार करे और अपने ही देश में जनता के गुस्से का सामना करे या फिर इनकार करके पूरी दुनिया में अकेला पड़ जाए.














