तस्वीर धुंधली पर उम्मीद गहरी... लेबनान बॉर्डर पर बमबारी के बीच चल रहे इकलौते कॉफी शॉप की कहानी

नीचे नजर आ रही यह तस्वीर धुंधली तो है, लेकिन इसका असर बेहद गहरा है. यह तस्वीर लेबनान बॉर्डर पर चल रहे इकलौते कॉफी शॉप की है. जहां गोलीबारी और रॉकेटों की गड़गड़ाट के बीच कॉफी की हर एक घूंट इंसानियत और बेहतर भविष्य की उम्मीद दिलाती है.

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लेबनान बॉर्डर के पास मेटुला में चल रहे बेला कैफे में कॉफी पीते लोग.
मेटुला:

28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई हिस्सों पर भीषण हवाई हमले किए तो पश्चिम एशिया में एक नई जंग की शुरुआत हो गई. हजारों लोगों की जान लेने के 40 दिन बाद यह जंग तो थम गई लेकिन लेबनान-इजरायल के सीमाई इलाकों में अब भी हमलों का दौर जारी है. इन हमलों का असर जानने के लिए ग्राउंड जीरो पर पहुंची NDTV की टीम को कुछ ऐसा दिखा, जिसने बेहतरी की उम्मीद को फिर से जिंदा कर दिया. दरअसल लेबनान सीमा से बस 100 सौ मीटर की दूरी पर, एक छोटा का कैफे जंग के बीच चल रहा है. 

मेटुला में सीमा के पास चल रहा बेला कैफे

हिज्बुल्लाह के रॉकेटों की गड़गड़ाहट के बीच यह मेटुला में एक छोटा सा कैफे बंद होने से इनकार कर रहा है. इस कैफे का नाम है- 'बेला कैफे.' जिसे एक बहादुर महिला, मिरिया मेनाश चलाती हैं. वह कॉफी के हर कप के साथ उम्मीद भी परोसती हैं. मेटुला में बचे-खुचे गिने-चुने नागरिकों और सैनिकों के लिए उनका कॉफी शॉप एक नाजुक सा ठिकाना है. 

गोलीबारी की आवाज के बीच कॉफी की घूंट

यहां कुछ पल के लिए बाहर चल रहा युद्ध मानो थम सा जाता है. कॉफी की एक घूंट बाहर से आ रही गोलीबारी की आवाज को दबा देती है. कुछ पलों के लिए वे भूल जाते हैं कि वे दुनिया के सबसे खतरनाक युद्ध क्षेत्रों में से एक में रह रहे हैं, जहां अनिश्चितता ही एकमात्र निश्चितता है.

इस कॉफी शॉप पर मिले नदाफ ने कहा, "मुझे यहां दिन में एक बार आना बहुत पसंद है. यह कॉफी की दुकान मुझे आराम करने और नॉर्मल महसूस कराने में मदद करती है." नदाफ इस कॉफी शॉप के पास में ही रहते हैं.

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कॉफी के साथ-साथ सुकून भी परोसती हैं मिरिया

काउंटर के पीछे खड़ी कैफे की मालकिन और अकेली कर्मचारी मिरिया मेनाश खड़ी नजर आई. जो चेहरे पर मुस्कान लिए कॉफी परोसती हैं. सबसे मुश्किल समय में भी वह अकेले ही काम करती हैं. वह कॉफी, सैंडविच के साथ-साथ एक और भी दुर्लभ चीज परोसती हैं- सुकून. वह सैनिकों का नाम लेकर उनका स्वागत करती हैं. 

उन्हें याद रहता है कि उनके पड़ोसी अपनी कॉफी कैसे लेना पसंद करते हैं. वह घेराबंदी में घिरे इस शहर को फिर से एक परिवार जैसा महसूस कराती हैं.

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कॉफी मालकिन ने कहा- अगर सब चले गए तो इस जगह की रक्षा कौन करेगा

मिरिया ने बताया, "मैं एक बार यहां से चली गई थी. 2023 में जब हर दिन रॉकेट गिरने लगे, तो मैं अपने परिवार को लेकर, बाकी सब लोगों की तरह, मेटुला छोड़कर भाग गई थी, पूरा शहर खाली हो गया था. लेकिन कुछ महीने पहले वापस आ गई." मिरिया ने आगे कहा, मैंने खुद से पूछा, अगर हम सब चले गए, तो इस जगह की रक्षा कौन करेगा? हमें अपने उन सैनिकों के साथ खड़ा होना होगा, जो देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपनी जान जोखिम में डालते हैं.”

इसलिए उसने बेला कैफे को फिर से खोल दिया, जो सीमा पार हिज्बुल्लाह के लॉन्च स्थलों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर है. यहां खतरा हर पल बना रहता है. सायरन की आवाज से ऑर्डर देने में रुकावट आती है. ग्राहक मेजों के नीचे छिप जाते हैं. लेकिन कैफ़े खुला रहता है.

कंधे पर रायफल टांगे इजरायल के सैनिक भी कॉफी पीने आते हैं

सीमा पर रहने वालों के अलावा, लेबनान सीमा पर तैनात इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) के सैनिक भी यहां नियमित रूप से आते हैं. कंधों पर राइफल टांगे हुए, वे अपनी पसंदीदा कॉफी का मजा लेते हैं और अपनी थकान, तनाव और परेशानी को यहीं पीछे छोड़ जाते हैं.

आपको डर नहीं लगता... सवाल पर मिरिया ने पूछा- आपको नहीं लगता

जब NDTV रिपोर्टर ने मिरिया से पूछा, "क्या आपको युद्ध क्षेत्र में रहने से डर नहीं लगता?" तो उन्होंने तुरंत पलटकर इसी रिपोर्टर से पूछ लिया: "क्या आपको डर लगता है?" उन्होंने तीखा जवाब देते हुए कहा, "जब आप काम के लिए भारत से सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके यहां आ सकते हैं, तो मैं अपने ही शहर में काम क्यों नहीं कर सकती?"

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लेबनान बॉर्डर से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर मेटुआ में यह कॉफी शॉप चल रहा है. जबकि हमलों के कारण पूरा शहर लगभग खाली हो चुका है.

कैफे का माहौल भी बेहद अच्छा

पत्थरों से बनी इस इमारत का माहौल इतना अच्छा है कि लोग पल भर के लिए भूल जाते हैं कि यहां कोई युद्ध भी चल रहा है. जब तक कि आसमान को चीरता हुआ कोई रॉकेट जोरदार धमाके के साथ शांति भंग नहीं कर देता, या लेबनान में हिज्बुल्लाह को निशाना बनाकर की गई तोपखाने की गोलाबारी से जमीन थर्रा नहीं उठती.

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स्थानीय बोले- यह कैफे हमें जिंदगी का अहसास कराती है

मेटुला लौटे निवासियों का कहना है कि 'बेला कैफ़े' ही वह वजह है जिसके चलते वे यहां रुके हुए हैं. एक स्थानीय ने कहा, "यह हमें जिंदगी का अहसास कराती है. और साथ ही, यहां रुकने और अपनी मातृभूमि को थामे रखने का एक मजबूत कारण भी देता है."

कैफे मालकिन बोलीं- 5 मिनट भी कोई यहां बैठकर मुस्कुराता है... 

मिरिया ने आगे कहा, “रॉकेटों का कोई अंत नहीं है, साथ ही जीने की हमारी इच्छा का भी कोई अंत नहीं है.” उन्होंने आगे कहा, “यह कैफे मेरे लिए पलटकर लड़ने का एक तरीका है. अगर कोई सैनिक या पड़ोसी यहां बैठकर 5 मिनट के लिए मुस्कुरा पाता है, तो मुझे लगता है कि हिजबुल्लाह हार चुका है. यह हमारी जमीन है, हमें किसी चीज से डर नहीं लगता.”

बताते चले कि ईरान जंग के बीच हिज्बुल्लाह की ओर से हुए हमलों के कारण सीमावर्ती मेटुला में पूरी की पूरी सड़कें बंद पड़ी हैं. ज्यादातर घर खाली हो चुके हैं. दुकान, बाजार सब बंद है. लेकिन इसके बाद भी ‘बेला कैफे' खुला है. यहां कॉफी परोसी जा रही है. 

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