एक प्लेन क्रैश और खुल गई CIA की पोल... अमेरिका-ईरान-इजरायल के खतरनाक 'आर्म्स स्कैंडल' की कहानी

Iran-Israel Attack: 1980 के दशक में अमेरिका ने ईरान को हथियारों की सप्लाई की थी. इन हथियारों से मिले पैसे को निकारागुआ के विद्रोही गुट कॉन्ट्राज को ट्रांसफर किया गया.

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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन.
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  • 1986 में निकारागुआ में एक विमान को मार गिराया गया, जिसमें CIA के एजेंट यूजीन हैसेनफस जिंदा पकड़े गए थे
  • यूजीन हैसेनफस-अमेरिका ने कॉन्ट्रा विद्रोहियों को हथियार सप्लाई करने के लिए इजरायल-ईरान के साथ गुप्त डील की थी
  • अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के शासनकाल में ईरान को हथियार बेचे गए और उस पैसे को कॉन्ट्राज को भेजा गया
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नई दिल्ली:

साल 1986 की 5 अक्टूबर को सेंट्रल अमेरिका के एक छोटे से देश निकारागुआ में एक प्लेन क्रैश हुआ. इस प्लेन में तीन लोग सवार थे. दो की मौत हो गई. लेकिन इसका एक पायलट- यूजीन हैसेनफस जिंदा बच गया. असल में ये विमान क्रैश नहीं हुआ था, बल्कि इसे मारा गया था. जिंदा पकड़े गए यूजीन हैसेनफस ने खुलासा किया कि वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के लिए काम करता है. इस प्लेन में भारी मात्रा में हथियार थे. यूजीन ने खुलासा किया कि उसका काम इन हथियारों को निकारागुआ के विद्रोही गुट कॉन्ट्रा तक पहुंचाने का था. 

इस खुलासे ने अमेरिका के 'सीक्रेट वॉर' की पोल खोल दी. साथ ही ये पोल भी खोल दी कि कैसे उस समय की अमेरिकी सरकार सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर हथियारों की डीलिंग का गंदा खेल खेला था. इस खेल में अमेरिका अकेला नहीं था. उसके साथ इजरायल और ईरान भी था. इसे अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े 'स्कैंडल' में गिना जाता है. दुनिया इसे 'ईरान-कॉन्ट्रा अफेयर' कहती है.

लगभग 4 दशक पुराने इस स्कैंडल को आज इसलिए याद किया जा रहा है, क्योंकि अब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया है. आज ईरान इन दोनों का सबसे बड़ा दुश्मन है लेकिन कभी तीनों साथ मिलकर काम करते थे.

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दुश्मन का दुश्मन, अपना दोस्त

1980 के दशक में अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन थे. ये वो दौर था जब अमेरिका और सोवियत यूनियन (अब रूस) के बीच कोल्ड वॉर पीक पर था. इसी दौर में निकारागुआ में सैंडिनिस्टा की कम्युनिस्ट सरकार थी, जिसका क्यूबा और सोवियत यूनियन समर्थन करते थे. 

सैंडिनिस्टा की सरकार को रीगन 'खतरा' मानते थे. उसी समय निकारागुआ में एक विद्रोही गुट 'कॉन्ट्रा' था. अब बात वही आती है कि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त. कॉन्ट्रा को फंड चाहिए था और इसमें रीगन मदद करते थे.

इसी बीच 1984 में अमेरिकी संसद ने एक कानून पास किया, जिसे 'बोलैंड अमेंडमेंट' कहा जाता है. इसने अमेरिका की ओर से कॉन्ट्रा को मिलने वाली सभी तरह की मदद पर रोक लगा दी. इससे राष्ट्रपति रीगन नाखुश थे. 

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दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट में ईरान और इराक के बीच युद्ध चल रहा था. ईरान को इराक में लड़ने के लिए अमेरिकी हथियारों की जरूरत थी. लेकिन 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद जब ईरान में रुहोल्ला अली खुमैनी सत्ता में आए तो अमेरिका ने कई प्रतिबंध लगा दिए थे. 

और फिर शुरू हुआ हथियारों का खेल

रोनाल्ड रीगन सैंडिनिस्टा की सरकार को कमजोर करना चाहते थे और इसके लिए उन्हें कॉन्ट्रा की मदद की जरूरत थी. दूसरी तरफ ईरान को इराक में लड़ने के लिए अमेरिकी हथियार चाहिए थे. इसी तनातनी के बीच जून 1985 में लेबनान में हिज्बुल्लाह ने 7 अमेरिकियों को बंधक बना लिया. बंधकों में तत्कालीन CIA चीफ विलियम बकली भी थे.

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अब खेल यहीं से शुरू हुआ. रीगन सरकार पर बंधकों की रिहाई का दबाव बढ़ रहा था. ऐसे में अमेरिका के तत्कालीन नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर रॉबर्ट मैकफर्लेन ने रोनाल्ड रीगन को आइडिया दिया कि ईरान को हथियार बेचो, वो हिज्बुल्ला पर दबाव डालकर बंधकों को छुड़वाएगा. 

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रीगन को आइडिया पसंद आया लेकिन जिस अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगाया था, वह उसे हथियार कैसे बेच सकता था. इस में मिडिल मैन की भूमिका निभाई इजरायल ने. 20 अगस्त 1985 को ईरान को इजरायल के जरिए हथियारों की पहली खेप भेजी गई. इसमें सैकड़ों मिसाइलें थीं. टैंक भी थे. ईरान ने इसके बदले में 4-5 करोड़ डॉलर दिए. 

इस बीच नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के लेफ्टिनेंट कर्नल ओलिवर नॉर्थ ने सुझाव दिया कि ईरान से जो एक्स्ट्रा कमाई हो रही है, उसे डायवर्ट किया जाए और कॉन्ट्राज को भेजा जाए. ये गैरकानूनी था लेकिन सरकार ने इसे मान लिया. इसकी जानकारी किसी को नहीं थी. इसके लिए शेल कंपनियां बनाई गईं. ईरान को हथियार भेजे और बदले में मिले पैसे को कॉन्ट्राज को भेजा गया. 

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एक प्लेन क्रैश और खुल गई पोल

ईरान से मिलने वाले पैसे को कॉन्ट्राज को भेजने का पूरा ऑपरेशन ओलिवर नॉर्थ की देखरेख में ही हुआ. यह पूरा ऑपरेशन बहुत सीक्रेट था लेकिन इसकी पोल तब खुल गई जब 5 अक्टूबर 1986 को निकोरागुआ में एक प्लेन को मार गिराया गया. 

प्लेन में सवार क्रू के दो सदस्य मारे गए लेकिन यूजीन हैसेनफस पैराशूट से जंगल में कूद गए. 24 घंटे तक वह बचते रहे लेकिन आखिरकार उन्हें पकड़ लिया गया. पकड़े जाने के बाद हैसेनफस ने सारी पोल खोल दी. उसने बताया कि कॉन्ट्राज के लिए सप्लाई फ्लाइट्स की निगरानी CIA कर रही थी.

नवंबर 1987 में लेबनान के अखबार अल-शिरा ने अमेरिका और ईरान के बीच हथियारों की डील की खबर ब्रेक की. इससे दुनियाभर में तहलका मच गया. पहले हैसेनफस का पकड़ा जाना और फिर अल-शिरा की रिपोर्ट. शुरुआत में रोनाल्ड रीगन ने इस बात से इनकार कर दिया कि उनकी सरकार ने ईरान और आतंकियों से बात की थी. लेकिन एक हफ्ते बाद उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया.

इसी बीच अटॉर्नी जनरल एडविन मीस ने जांच शुरू की और पाया कि ईरान ने हथियारों के लिए जो 3 करोड़ डॉलर दिए थे, उसमें से 1.8 करोड़ डॉलर का कोई हिसाब नहीं है. तभी ओलिवर नॉर्थ ने कबूल किया कि इस फंड को उन्होंने कॉन्ट्राज को ट्रांसफर किया ताकि वो हथियार खरीद सके.

आरोप, जांच और टॉवर कमीशन की रिपोर्ट

ईरान को हथियार और कॉन्ट्राज को फंड की सप्लाई ने रीगन सरकार को बहुत परेशान किया. आखिरकार रोनाल्ड रीगन ने टेक्सास के गवर्नर जॉन टॉवर की अगुवाई में एक जांच आयोग बनाया. इसे टॉवर कमीशन कहा जाता है. 60 दिनों के अंदर इसे अपनी रिपोर्ट देनी थी. 

जांच के बाद टॉवर कमीशन ने ये नतीजा निकाला कि राष्ट्रपति रीगन को इस बात का नहीं पता था कि उनके अंडर काम करने वाले लोग फंड को कॉन्ट्राज की तरफ डायवर्ट कर रहे हैं.

बाद में इंडिपेंडेंट काउंसल लॉरेंस वॉल्श ने 8 साल तक जांच की और इसे 'ईरान-कॉन्ट्रा अफेयर' नाम दिया. उन्होंने कुल 14 लोगों पर आरोप लगाया. इसमें CIA के अधिकारियों से लेकर लेफ्टिनेंट कर्नल भी शामिल थे. हालांकि, सभी को कुछ ही सालों में बरी कर दिया गया.

सालों बाद एक इंटरव्यू में लॉरेंस वॉल्श ने कहा था कि रोनाल्ड रीगन ने जो किया, वो देश की भलाई के लिए था. वहीं, रोनाल्ड रीगन ने संसद के सामने गवाही के दौरान माना था कि ईरान को हथियार बेचना उनकी सबसे बड़ी 'गलती' थी. 

'ईरान-कॉन्ट्रा अफेयर' अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े स्कैंडल में से एक में गिना जाता है. इसमें नियम-कायदों को ताक पर रखा गया. सत्ता के लिए हथियारों का सौदा किया गया. 

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