- अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हुई, जो 86 वर्ष के थे
- खामेनेई चार दशकों से ईरान की सत्ता संभाल रहे थे और अमेरिका-इजरायल उन्हें आतंकवादी शासन मानते थे
- हमले की योजना सऊदी अरब की मदद से बनी और CIA ने खामेनेई की लोकेशन और मीटिंग की जानकारी इजरायल को दी
अमेरिका और इजरायल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई है. वह 86 साल के थे और लगभग 4 दशकों से ईरान की सत्ता संभाल रहे थे. ईरान पर अमेरिका ने पिछले साल जून में भी हमला किया था लेकिन इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया था कि उनका मकसद खामेनेई को सत्ता से हटाना है. अमेरिका और इजरायल खामेनेई की सत्ता को आतंकी शासन मानते थे. दोनों ही खामेनेई को अपने अस्तित्व के लिए भी खतरा मानते थे.
पिछले साल जब जून में 12 दिन तक इजरायल और ईरान में जंग चली थी तो कुछ समय के लिए खामेनेई की जान खतरे में आ गई थी. ईरान के साथ 12 दिन की लड़ाई में इजरायली अधिकारियों को खामेनेई की हत्या करने का एक मौका मिला था लेकिन ट्रंप ने उन्हें रोक दिया. इसके बाद ईरान और इजरायल के बीच एक समझौता हो गया.
आठ महीने बाद जब ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम पर बातचीत रुक गई तो ट्रंप का सब्र जवाब दे गया और उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर हमला कर दिया. इजरायल ने राजधानी तेहरान में खामेनेई के कंपाउंड में दर्जनों बम गिराए गए. उस समय कहा गया कि खामेनेई सुरक्षित हैं और उन्हें पहले ही सुरक्षित जगह पहुंचा दिया गया था. लेकिन देर रात तक ईरानी मीडिया ने खामेनेई की मौत की पुष्टि कर दी.
सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि बिल्डिंग का ज्यादातर हिस्सा मलबे में तब्दील हो गया था, जहां से खामेनेई के शव को निकाला गया. बताया जा रहा है कि इजरायली पीएम नेतन्याहू और ट्रंप दोनों को ही खामेनेई के शव की तस्वीरें दिखाई गईं.
अकेले रहने लगे थे खामेनेई
पिछले साल मौत के मुंह से बचने के बाद खामेनेई ज्यादातर अकेले ही रहने लगे थे. यहां कि सोशल मीडिया पर भी उनके पोस्ट कभी-कभार ही आते थे.
बताया जाता है कि खामेनेई के कंपाउंड में बंकर इतनी गहराई में हैं कि लिफ्ट को वहां तक उतरने में 5 मिनट से ज्यादा का वक्त लगता है. लेकिन इजरायल को बस एक मौके की जरूरत थी. जब इजरायल और अमेरिका को खामेनेई के शासन को खत्म करने का मौका दिखा तो वो अपनी प्लानिंग को जल्द से जल्द अमल में लाने के लिए मजबूर हो गए.
रिपोर्ट्स बताती हैं कि खामेनेई और उनके सिपहसालारों को इस समय हमला होने की उम्मीद नहीं थी. शनिवार को शबात का दिन था. यह यहूदियों के लिए आराम का दिन होता है. इसलिए इजरायलियों की तरफ से हमले की उम्मीद कम थी. लेकिन इसी का फायदा उठाया गया.
कैसे पता लगा खामेनेई के बारे में?
खबरें है कि इजरायल को इस काम में सऊदी अरब से मदद मिली. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले महीने ट्रंप को कई बार कॉल किया था और हमले के दबाव डाला था. बिन सलमान ने कथित तौर पर कहा था कि अगर हमला तुरंत नहीं किया तो ईरान और मजबूर और खतरनाक हो जाएगा.
वहीं, अमेरिका भी जल्द हमला करना चाहता था, क्योंकि तैयारी ईरान की तरफ से भी हो रही थी. ऑपरेशन से जुड़े कुछ लोगों ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि CIA कई महीनों से खामेनेई पर नजर रख रही थी. उनकी लोकेशन और पैटर्न जान रही थी. CIA को पता चला कि शनिवार को मीटिंग होने वाली है, जिसमें खामेनेई भी मौजूद रहेंगे. CIA ने ये इंटेलिजेंस इजरायल को दी.
इस आधार पर अमेरिका और इजरायल ने अपने हमले की टाइमिंग बदली और शनिवार सुबह दिन के उजाले में हमला कर दिया. ट्रंप ने खामेनेई की मौत की पुष्टि की उन्हें 'इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक' बताया. ट्रंप ने कहा, 'वह हमारे इंटेलिजेंस और बहुत एडवांस्ड ट्रैकिंग सिस्टम से बच नहीं पाए. वह या उनके साथ मारे गए दूसरे नेता कुछ भी नहीं कर सके.'
करीबियों से मिला धोखा!
ट्रंप किस ट्रैकिंग सिस्टम की बात कर रहे थे, यह अभी साफ नहीं है. कुछ लोगों ने अंदाजा लगाया है कि खामेनेई के करीबी लोगों में कोई जासूस था. फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीसज के डिप्टी डायरेक्टर रयान ब्रॉब्स्ट ने कहा कि अमेरिका के पास कई तरह की इंटेलिजेंस और सर्विलांस क्षमताएं हैं, जिनका इस्तेमाल खामेनेई को ट्रैक करने के लिए किया जा सकता था.
उन्होंने द टेलीग्राफ से कहा, 'इनमें एरियल और स्पेस बेस्ड सर्विलांस क्षमताएं, सिग्नल और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस, कम्युनिकेशन इंटरसेप्ट के साथ-साथ ह्यूमन इंटेलिजेंस शामिल हैं.'
ट्रंप के बयान से पता चलता है कि खामेनेई पर अमेरिका ने नजरें जमाई रखी थीं लेकिन उनको मारने के लिए ट्रिगर इजरायल ने ही खींचा. अमेरिका ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत मिलिट्री टारगेट पर अपनी टॉमहॉक मिसाइलों, HIMARS रॉकेट और ड्रोन से हमला किया, जबकि इजरायल ने मिसाइल डिपो और अधिकारियों को निशाना बनाया.
इजरायल ने हवाई हमलों के साथ-साथ ईरानी शासन पर हमला करने के लिए कई तरह की टेक्नोलॉजिकल तरकीबें भी इस्तेमाल कीं.














