खामेनेई के जनाजे का रूट, पोस्टर-बैनर, सबके पीछे है ईरान का एक संदेश

ईरान में अली खामेनेई का यह जनाजा सिर्फ एक सुप्रीम लीडर की विदाई नहीं, बल्कि एक विचार, एक नई सत्ता और एक नए दौर की शुरुआत का ऐलान भी है.

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Ali Khamenei funeral: अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में लाखों की भीड़ (फोटो- एएफपी)
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  • ईरान अपने पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में दुनिया को धार्मिक-राजनीतिक संदेश दे रहा है
  • यह मौका सिर्फ अयातुल्लाह को आखिरी सलाम देने का नहीं, उनकी नींव पर नए अयातुल्लाह की कुर्सी को मजबूत करने का भी
  • ईरान से इराक तक, खामेनेई का जनाजा गुजरेगा- शियाओं को युनाइट करेगा, ईरान की नई राजनीतिक ताकत को और वैधता देगा

यहां की हवा में मातम पसरा हुआ है. हर ओर लाल- काले झंडे लहरा रहे हैं, जिसमें शोक, शहादत और बदले की भावना सनी हुई है. लाखों लोगों का हुजूम सड़कों पर है. जनाजा गुजर रहा है और पूरा देश अपने अयातुल्लाह को आखिरी विदाई दे रहा है. यह मंजर ईरान का है जहां पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई का अंतिम संस्कार चल रहा है. अंतिम संस्कार से जुड़े यह कार्यक्रम हफ्ते भर चलेंगे. यह मौका सिर्फ 37 साल तक शासन करने वाले अयातुल्लाह को आखिरी सलाम देने का नहीं, उन्हीं की नींव पर नए अयातुल्लाह की कुर्सी को मजबूत करने का भी है. इस पूरी कवायद में धार्मिक और राजनीतिक संदेशों को बढ़ावा देने के लिए गहरे प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह मैसेंजिग सिर्फ ईरानी लोगों के लिए नहीं, उन विदेशी हुकूमतों के लिए भी है, जिन्होंने हमला करके देश के सबसे ताकतवर चेहरे को मौत के घाट उतार दिया था.

पोस्टर, बैनर और मैसेंजिग

1979 की क्रांति के बाद से ईरान में इस्लामिक सरकार है और अभी यह अपने सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रही है. 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमले से पहले ईरान में विद्रोह मचा हुआ था. आर्थिक परेशानी से जूझती जनता सड़क पर थी. हमले में पहले ही दिन ईरान ने अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को खो दिया. रिवोल्यूशनरी गार्ड से लेकर कैबिनेट तक, कोई ऐसा महकमा नहीं था, जिसके बड़े लीडर ने जान न गंवाई हो. जंग के बाद 'अमेरिका से न हारने' का तमगा लेकर दुनिया के सामने ईरान ने अपना सैन्य कद बढ़ा लिया है. अब बारी है ईरानी जनता के बीच एकता का नैरेटिव बनाने की. अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार ने वह मौका दिया. 

सोच-समझकर तैयार किए गए सरकारी नारों से लेकर ईरान की सड़कों पर लगे बैनर-पोस्टर तक, कई तरह के संदेशों का इस्तेमाल किया जा रहा है. ईरान से लेकर इराक तक, खामेनेई का जनाजा गुजरेगा- शिया मुस्लमानों को युनाइट करेगा, ईरान की नई राजनीतिक ताकत को और वैधता देगा.

ईरान के अधिकारियों ने बार-बार अपने बयानों में खामेनेई की शहादत पर जोर दिया है. इस बात को अपनी जनता के सामने मजबूती से रखा कि खामेनेई की मौत पर शोक मनाना एक राष्ट्रीय कर्तव्य है. मैसेज सिर्फ ईरानी जनता नहीं पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए था. अंतिम संस्कार के समारोहों में नारा लगाया जा रहा कि "हमें उठना होगा". इस नारे को ईरान में शोक मनाने वाले लोगों के हाथों में मौजूद बैनरों और तस्वीरों पर देखा जा सकता है. बात अरब देशों को भी समझ में आए, इस मकसद से "अल्लाह के लिए खड़े हो जाओ" नारे का अरबी ट्रांसलेशन चुना गया है. ये दोनों ही नारे कुरान की एक आयत पर आधारित हैं, जो मुसलमानों को अल्लाह के मकसद के लिए एक साथ खड़े होने का आह्वान करती है.

ईरान के लोग अपने सुप्रीम लीडर को आखिरी विदाई दे रहे (फोटो- एएफपी)

नॉर्वे में भारत के राजदूत पद से रिटायर और अभी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (IICA) में प्रोफेसर, डॉ बी बाला भास्कर ने खामनेई के अंतिम संस्कार के जरिए दिए जा रहे मैसेज का जिक्र करते हुए शियाइज्म का कॉन्सेप्ट समझाया. उनका कहना है कि शियाइज्म के विचार में धार्मिक और राजनीतिक ड्यूटी को मिलाकर देखा जाता है. शिया समुदाय के बुनियादी सिद्धांत में अन्याय के खिलाफ लड़ाई और शहादत का विचार है. सुप्रीम लीडर का पद धार्मिक और राजनीतिक दोनों है. यही वजह है जब उनका अंतिम संस्कार होता है तो भी धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक संदेश दिखता है. उनका यह भी कहना है कि जिस तरह ईरान ने अमेरिका और इजरायल के सामने लड़ाई लड़ी है, पूरी दुनिया के सामने उसकी इज्जत बढ़ गई है.

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खामेनेई के जनाजे में उनके पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए जो रूट चुना गया है, उसका भी एक संदेश है. यह रूट ईरान की राजधानी तेहरान के दक्षिण में स्थित शियाओं के पवित्र शहर कोम से शुरू होकर इराक के नजफ और कर्बला तक जाता है. आखिर में यह यात्रा ईरान के मशहद में इमाम रजा की दरगाह पर उनके दफन के साथ खत्म होगी. ईरान के पहले सुप्रीम लीडर रुहोल्लाह खोमैनी के सम्मान में बनी 'ग्रैंड मोसाल्ला' से ही अंतिम संस्कार के कार्यक्रमों की शुरुआत हुई थी. इस फैसले को भी क्रांति के बाद के ईरान की दो सबसे अहम हस्तियों को आपस में जोड़ने के तरीके के तौर पर देखा जा रहा है. यानी कुल मिलाकर शियाओं के एकजुट करने के साथ-साथ सुप्रीम लीडर की कुर्सी अभी भी पवित्र और ताकतवर है, इस मैसेज को दुनिया के सामने रखा जाएगा. जैसे-जैसे करोड़ों लोगों का हुजूम इस जनाजे में शामिल होगा, मौजूदा सुप्रीम लीडर के तौर पर अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई की ताकत मजबूत होती जाएगी.

ध्यान रहे कि सुरक्षा को देखते हुए नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रमों में नहीं दिखेंगे. इस पद पर बैठने के बाद से वह सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं. वह अपना लिखित बयान जारी करते हैं.

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दुश्मन के खिलाफ लामबंद ईरान

ईरान के लोगों में इस समय बदले की भावना भी तेज है. बाहरी दुश्मन उन्हें इस समय एकजूट कर रहा है. जैसे-जैसे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आगे बढ़ी है, शोक मनाने वाले लोगों के बीच खामेनेई की मौत का बदला लेने की हुंकार बढ़ती गई है. उनके हाथों में मौजूद 'किल ट्रंप' जैसे पोस्टरों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, दोनों को मारने की मांग दिख रही है. जुलूस के रास्ते में ऐसे पोस्टर देख रहे हैं, लोग ट्रंप का पुतला भी फंदे पर लटका रहे हैं. इतना ही नहीं मोहम्मद रसौली नाम के एक शायर ने एक नज्म पढ़ी जिसका मतलब था कि “अब से कफन ही हमारा लिबास है. तुम्हारे खून की कसम; ट्रंप का कत्ल हमारी जिम्मेदारी है... दुनिया अब ट्रंप के लिए अच्छी जगह नहीं रही. जिसने हमारे इमाम को मारा, हम उस आदमी को क्यों न मारें? अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो यह शर्म की बात होगी.”

अमेरिका के खिलाफ लामबंद ईरान के लोग (फोटो- एएफपी)

यह तो हुई लोगों की दिल की बात. ईरानी सरकार ने जिस तरह तथाकथित 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' के हथियारबंद गुटों और आंदोलन का तेहरान में स्वागत किया, वह भी बड़ी मैसेंजिंग थी. तेहरान में हिजबुल्लाह, हमास, फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद और हूती प्रतिनिधियों का गर्मजोशी से स्वागत किया गया. उन्हें भाई जैसा देश बताया है. इन गुटों के लिए कुरान की जिन आयतों को पढ़ा गया, उसमें अल्लाह के साथ किए गए समझौते के लेकर वफादारी का संदेश था.

कुल मिलाकर यह जनाजा सिर्फ एक इंसान की विदाई नहीं, बल्कि एक विचार, एक नई सत्ता और एक नए दौर की शुरुआत का ऐलान भी है. आने वाले दिनों में दुनिया की नजर सिर्फ इस बात पर नहीं होगी कि अयातुल्लाह को कैसे विदा किया गया, बल्कि इस पर भी होगी कि उनके बाद ईरान किस रास्ते पर चलता है. क्या यह शोक देश को और मजबूत करेगा या फिर मध्य पूर्व में एक नए टकराव की चिंगारी बनेगा? इसका जवाब आने वाला वक्त देगा.

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