ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड और कतर के रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी पर हमला, जानें- दुनिया को कितना नुकसान

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड और कतर के रास लफान LNG हब पर हमलों से वैश्विक ऊर्जा बाजार हिल गया है. दुनिया की लगभग 20% LNG और 30% गैस भंडार प्रभावित होने से सप्लाई में बड़ा जोखिम, कीमतों में उछाल और यूरोप‑एशिया में ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ गई है.

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  • ईरान और कतर के साझा साउथ पार्स गैस फील्ड में विश्व के लगभग 30% प्राकृतिक गैस भंडार मौजूद हैं.
  • कतर की रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी से विश्व की लगभग 20 प्रतिशत LNG सप्लाई होती है.
  • हालिया हमलों के कारण खाड़ी क्षेत्र के गैस उत्पादन और सप्लाई चेन पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है.
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नई दिल्ली:

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड (South Pars Gas Field) और कतर के रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी (Ras Laffan Industrial City) पर हमलों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है. अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और रिसर्च रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन दोनों ठिकानों पर असर का मतलब है कि दुनिया की गैस सप्लाई का बड़ा हिस्सा खतरे में आना.

दुनिया को कितना गैस देते हैं ये दोनों ठिकाने?

1. South Pars Gas Field (ईरान-कतर)

साउथ पार्स गैस फील्ड (South Pars Gas Field) फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में स्थित दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है, जिसे ईरान और कतर आपस में साझा करते हैं. यह 9,700 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है, जिसमें से 3,700 वर्ग किमी ईरान में (साउथ पार्स) और 6,000 वर्ग किमी कतर (नॉर्थ फील्ड/नॉर्थ डोम) में है.

Middle East Forum के मुताबिक इसमें करीब 30% वैश्विक गैस भंडार मौजूद है. ईरान के कुल गैस उत्पादन का 70-75% हिस्सा इसी फील्ड से आता है. यानी, यह फील्ड वैश्विक गैस सिस्टम की 'रीढ़' मानी जाती है.

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2. Ras Laffan Industrial City (कतर)

रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी कतर की राजधानी दोहा से लगभग 80 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है. यह 295 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली है. यह दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी (LNG- लिक्विफाइड नेचुरल गैस) निर्यात केंद्र और औद्योगिक केंद्र है. यह कतर की अर्थव्यवस्था की 'रीढ़' माना जाता है, जहां से वैश्विक एलएनजी आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा आता है.

यहां से हर साल लगभग 77 मिलियन टन LNG उत्पादन होता है. कतर अकेले दुनिया के करीब 20% LNG की सप्लाई करता है. यानी, दुनिया में हर 5 में से 1 LNG सप्लाई कतर से आती है.

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हमलों का असर: क्या कहती हैं एजेंसियां?

Reuters के मुताबिक, हमलों के बाद खाड़ी के ऊर्जा ठिकानों पर खतरा बढ़ गया है और सप्लाई बाधित होने की आशंका है. Associated Press की रिपोर्ट कहती है कि मिडिल ईस्ट के प्रमुख गैस और ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर पर खतरा पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है. Al Jazeera के अनुसार, कतर में LNG प्रोडक्शन रुकने जैसी स्थिति बनने पर ग्लोबल गैस मार्केट में भारी उथल-पुथल हो सकती है. अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमले के बाद कतर को कुछ यूनिट्स अस्थायी रूप से बंद करनी पड़ीं, जिससे सप्लाई पर असर पड़ा.

कुल असर कितना बड़ा?

फैक्टरअसर
साउथ पार्स    दुनिया का सबसे बड़ा गैस भंडार, क्षेत्रीय सप्लाई का आधार
रास लफान20% ग्लोबल LNG सप्लाई
कुल खतरावैश्विक गैस सप्लाई का बड़ा हिस्सा प्रभावित

साउथ पार्स और रास लफान के क्या मायने

अगर दुनिया की गैस सप्लाई एक सिस्टम है तो South Pars उसका सबसे बड़ा स्टोरेज टैंक है. और Ras Laffan उसका सबसे बड़ा डिस्ट्रिब्यूशन सेंटर है.  इन दोनों पर हमला गैस की कमी पैदा करेगा और कीमतों में उछाल आएगी. इससे पूरी दुनिया पर ऊर्जा संकट पैदा होगा. 

कितना होगा नुकसान? 

1. तुरंत उत्पादन नुकसान  

एनर्जी इंपैक्ट डेटा के मुताबिक साउथ पार्स पर हमले से ईरान के कुल गैस उत्पादन का 12% प्रभावित हुआ है. वहीं Ras Laffan (कतर) बंद/प्रभावित होने से दुनिया की 20% LNG सप्लाई खतरे में है.  इसका सीधा मतलब है कि ग्लोबल गैस सप्लाई का 15–20% तक हिस्सा जोखिम में है.

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2. कीमतों में उछाल  

Reuters के मुताबिक ब्रेंट ऑयल $110–111 प्रति बैरल तक पहुंच गया है. यूरोप में गैस कीमतें 50% तक बढ़ सकती हैं.  कुछ मार्केट्स में LNG स्पॉट प्राइस डबल तक पहुंचा है. 

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हमारी जेब पर क्या असर?

ग्लोबल महंगाई में 0.5% से 1% तक इजाफा संभव है. अगर संकट लंबा चला तो यूरोप में गैस बिल 50% बढ़ सकते हैं. UK जैसे देशों में सालाना बिल £2500 तक जा सकता है. इसके अलावा एशिया (भारत, चीन, जापान) सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. क्योंकि LNG का 80% हिस्सा यहीं जाता है.

ईरान और कतर के इन गैस ठिकानों पर हमले सिर्फ क्षेत्रीय संघर्ष नहीं हैं, बल्कि यह ग्लोबल एनर्जी सिक्योरिटी पर सीधा असर डालते हैं. अगर हालात बिगड़ते हैं, तो इसका असर यूरोप, एशिया और भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों तक साफ दिख सकता है.

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