सूरज जैसी आग और 40000KM/H की रफ्तार, कुछ यूं लौटे आर्टेमिस-2 के जांबाज? जानकर हैरान रह जाएंगे आप

आर्टेमिस-2 मिशन की रोंगटे खड़े कर देने वाली वापसी की कहानी, जब ओरियन कैप्सूल आवाज से 36 गुना तेज रफ्तार और सूरज जैसी तपिश को चीरते हुए धरती पर लौटा.

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  • नासा का आर्टेमिस-2 मिशन सफलतापूर्वक पूरा हो गया और चार अंतरिक्ष यात्री चांद के करीब से लौटे हैं
  • ओरियन कैप्सूल ने पृथ्वी की ऑर्बिट में 40 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की अत्यधिक रफ्तार से एंट्री की
  • कैप्सूल के बाहर का तापमान वायुमंडल में प्रवेश के दौरान लगभग 2800 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था
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नासा का आर्टेमस-2 मिशन पूरा हो गया है. इस मिशन के तहत नासा ने चार एस्ट्रोनॉट को चांद के करीब भेजा था. आज सुबह करीब साढ़े 5 बजे (भारतीय समयानुसार) यह अंतरिक्ष यान धरती पर वापस लौटा. अंतरिक्ष यात्री एक छोटे से कैप्सूल में बैठकर चांद से पृथ्वी पर लौटे थे. यह मिशन जितना रोमांचक था उतना ही खतरनाक इसका आखिरी चरण था, जिसमें कैप्सूल की धरती पर वापसी हुई. यह मजबूत धातु का बना कैप्सूल 40 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से स्पेस की गहराइयों से धरती की ओर आया. इतनी रफ्तार और इसका शोर इंसानों के लिए जानलेवा है. रफ्तार के साथ असली चुनौती थी कैप्सूल का तापमान. धरती की ओर आता कैप्सूल एक आग का गोला बन गया. आज हम आर्टेमिस-2 के धरती पर वापस लौटने की पूरी कहानी बता रहे हैं.

ध्वनि से 36 गुना तेज रफ्तार से आया वापस

आर्टेमिस-2 मिशन में एस्ट्रोनॉट जिस कैप्सूल में बैठकर पृथ्वी पर लौटे उसका नाम ओरियन कैप्सूल था. जब कैप्सूल ने पृथ्वी की ऑर्बिट में एंट्री की तो ग्रेविटी की वजह से इसकी रफ्तार करीब 40 हजार किलोमीटर प्रति घंटा थी. यह ध्वनि की गति से भी करीब 36 गुना ज्यादा है. जब हम सुपर फास्ट ट्रेन में सफर करते वक्त खिड़की से हाथ बाहर निकालते हैं तो वो ट्रेन की उलटी दिशा में बल लगाता है. तो कल्पना कीजिए, 40 हजार किलोमीटर की रफ्तार पर हवा कितनी खतरनाक होगी. इतनी रफ्तार पर हवा एक ठोस दीवार और ब्लेड की तरह बर्ताव करती है. भारी दबाव और भयंकर घर्षण के कारण कैप्सूल के चारों ओर की हवा प्लाज्मा के एक दहकते हुए गोले में बदल गई थी. इतनी रफ्तार में किसी भी इंसान का जिंदा बचना लगभग ना मुमकिन होता है. लेकिन वैज्ञानिकों ने ऐसा कैप्सूल बनाया, जिसने यह मुमकिन कर दिखाया.

सूरज जैसा गर्म हो गया कैप्सूल

पृथ्वी के वायुमंडल में एंट्री के दौरान कैप्सूल के बाहर का तापमान 2,800 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. यह तापमान सूरज की बाहरी सतह के आधे तापमान के करीब है. यह ज्वालामुखी के उबलते लावे से भी दोगुना ज्यादा गर्म था. इतनी गर्मी में ये कैप्सूल बिल्कुल आग के गोले जैसा बन जाता है. तापमान कंट्रोल करने के लिए वैज्ञानिकों ने कैप्सूल की बाहरी सतह पर हीट शील्ड लगाई.

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पुराने मिशन आर्टेमिस-1 से ली सीख

आपको बता दें कि नासा ने इस मिशन से पहले आर्टेमिस-1 भेजा था. जब आर्टेमिस-1 का कैप्सूल पृथ्वी पर लौटा, तो उसकी बाहरी सतह जल गई थी. इससे नासा ने सीख ली. इस बार वैज्ञानिकों ने इस कैप्सूल को और ज्यादा मजबूत बनाया. इसकी हीट शील्ड को अपडेट किया. इस शील्ड को एक 'एब्लेटिव' तकनीक से बनाया गया है, जो खुद जलकर अंदर के हिस्से को ठंडा रखती है. इसके साथ ही, मिशन ने एक 'स्किप री-एंट्री'तकनीक का इस्तेमाल किया. जैसे हम पानी की सतह पर पत्थर उछालते हैं।, ठीक वैसे ही कैप्सूल वायुमंडल में थोड़ा अंदर गया, फिर हल्का सा बाहर की तरफ उछला, और ऐसे अपनी स्पीड और गर्मी को कम करते हुए सुरक्षित रूप से नीचे आया.

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सारी चुनौतियों को पार कर चांद से लौटा आर्टेमिस-2

नासा ने इस मिशन में रीड वाइजमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैन्सन को भेजा था. इन चारों अंतरिक्ष यात्रियों को पहले बेहद खास ट्रेनिंग दी गई थी.  आज सुबह यह कैप्सूल सैन डिएगो के तट के पास प्रशांत महासागर में सुरक्षित रूप से उतर गया. आर्टेमिस-2 से 52 साल बाद चांद के इतने करीब कोई इंसान पहुंचा. अंतरिक्ष यात्रियों ने पृथ्वी से सबसे दूर लगभग 4,06,771 किलोमीटर जाने का नया रिकॉर्ड बनाया है. इस सफलता ने अगले मिशन आर्टेमिस-3 का रास्ता साफ कर दिया है, जो दशकों बाद इंसानों को सीधे चंद्रमा की सतह पर उतारेगा. नासा चांद पर इंसानी बेस बनाने की तैयारी कर रहा है. ताकि भविष्य में मंगल ग्रह पर जाने का रास्ता साफ हो सके.

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