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प्राइम टाइम : भर्ती बोर्ड की जिम्मेदारी कौन तय करेगा ?

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हम नौकरी सीरीज़ के 23वें अंक पर आ गए हैं. यात्रा आगे भी जारी रहेगी. अगर सारे राज्यों से डेटा मंगाएं तो पता चलेगा कि लाख से ज़्यादा नौकरियां कोर्ट केस में फंसी हैं. ज़रूरी नहीं कि कोर्ट के कारण ही लंबित हों, कई बार जांच पूरी न होने के कारण भी ये नौकरियां फंसी हुई हैं. दलाली, धांधली, पेपर लीक, ग़लत सवाल जैसे आरोपों के बग़ैर शायद ही कोई परीक्षा पूरी होती है. ये सब न हो तो भी बहुत सी परीक्षाएं फार्म भरने के बाद नहीं होती हैं. कई मामलों में एक परीक्षा को संपन्न होने में एक साल से लेकर 4 साल तक लग जाते हैं. इन चयन आयोगों की परीक्षाओं का डेटा जोड़ लेंगे तो पता चलेगा कि इन्होंने मिलकर करोड़ों छात्रों का भविष्य बर्बाद कर दिया है. हमने नौकरी सीरीज़ में कई राज्यों के चयन आयोगों की परीक्षाओं के हाल बताए, किसी ने जवाब नहीं दिया. केंद्र सरकार के तहत आने वाले कर्मचारी चयन आयोग ने भी जवाब नहीं दिया मगर जब छात्र वहां पहुंच गए, धरना देने लगे, तो चेयरमैन ने कहा कि एनडीटीवी भड़का रहा है.



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