ट्रंप को अपनी ताकत दिखाएंगे पुतिन! क्या रुकवा पाएंगे ईरान-अमेरिका की जंग?

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  • प्रकाशित: अप्रैल 02, 2026

डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में वापसी के दौरान युद्ध रोकने और अमेरिका को शांति का अगुवा बनाने का दावा किया था, लेकिन मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका खुद एक जटिल और लंबी जंग में उलझ चुका है. युद्ध का मोर्चा हो या कूटनीति की टेबल दोनों ही जगह ट्रंप प्रशासन को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

दिलचस्प मोड़ यह है कि जिस शख्स को डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय तक अमेरिका का सबसे बड़ा विरोधी बताते रहे, वही अब संभावित रूप से शांति की चाबी अपने हाथ में रखता दिख रहा है. बात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हो रही है.

ईरान युद्ध और रूस की एंट्री

यूएस–ईरान संघर्ष के बीच रूस ने एक अहम बयान दिया है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पस्कोव ने साफ कहा है कि रूस शांति स्थापित करने में भूमिका निभाने के लिए तैयार है. पस्कोव के मुताबिक राष्ट्रपति पुतिन इस मुद्दे पर अलग‑अलग देशों के नेताओं से बातचीत भी कर रहे हैं.

यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका लगातार मिसाइल और हवाई हमलों के बावजूद ईरान के साथ टकराव को निर्णायक मोड़ तक नहीं ले जा सका है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की ज़रूरत और ज्यादा बढ़ गई है.

ईरान का भी रूस पर भरोसा

रूस की संभावित मध्यस्थता को लेकर ईरान का रुख भी सकारात्मक दिखाई दे रहा है. रूस में ईरान के राजदूत काज़िम जलाली ने कहा है कि अगर रूस मध्यस्थ की भूमिका निभाता है तो ईरान उसका स्वागत करेगा.

ईरानी राजदूत के अनुसार, रूस की नीयत पर ईरान को भरोसा है और मॉस्को ईरान के हितों को समझता है। हालांकि ईरान ने यह भी साफ किया है कि किसी भी बातचीत से पहले एजेंडा तय होना चाहिए और स्थायी शांति की गारंटी जरूरी है खासतौर पर यह भरोसा कि बातचीत के दौरान या उसके बाद हमला नहीं किया जाएगा. ईरान का संकेत साफ है: “बातचीत और फिर हमला यह मॉडल अब स्वीकार्य नहीं होगा.” 

बदलती वैश्विक भूमिका: अमेरिका से रूस तक

एक समय था जब अंतरराष्ट्रीय युद्धों में अमेरिका मध्यस्थ की भूमिका निभाता था. 2020 में ट्रंप और पुतिन की कई अहम मुलाकातें हुई थीं, जिनमें रूस‑यूक्रेन संकट पर भी चर्चा हुई थी. तब अमेरिका खुद को वैश्विक पंचायती की भूमिका में देखता था. लेकिन आज तस्वीर बदलती हुई नजर आ रही है. यूक्रेन युद्ध में रूस के खिलाफ खड़े होने वाला अमेरिका अब ईरान मसले पर उसी रूस की मध्यस्थता पर निर्भर होता दिख सकता है. इसे वैश्विक कूटनीति का एक बड़ा शिफ्ट माना जा रहा है.

नाटो से भी ट्रंप की दूरी?

ईरान युद्ध ने अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगी नाटो के बीच भी तनाव बढ़ा दिया है. ट्रंप ने खुले तौर पर नाराज़गी जताई है कि नाटो के कई सदस्य देशों ने युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं दिया. स्पेन ने अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल से इनकार किया, जर्मनी ने इसे “अपनी लड़ाई नहीं” बताया, और इटली ने अमेरिकी विमानों को ठहरने की अनुमति तक नहीं दी.

ट्रंप इसे विश्वासघात मान रहे हैं. उनके हालिया बयानों से संकेत मिलते हैं कि वे नाटो से अमेरिका की भूमिका पर पुनर्विचार कर सकते हैं.

नाटो का भविष्य और बड़ा सवाल

नाटो का सैन्य ढांचा बड़े स्तर पर अमेरिका पर निर्भर है- चाहे सैनिकों की तैनाती हो, लड़ाकू विमानों की संख्या, या फिर रक्षा खर्च का हिस्सा. अगर अमेरिका सचमुच नाटो से दूरी बनाता है, तो इससे न सिर्फ संगठन का अस्तित्व कमजोर होगा बल्कि पूरे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी बड़ा असर पड़ सकता है.

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