संसद का मानसून सत्र खत्म हो गया, लेकिन इसके साथ कई सवाल भी छोड़ गया. सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस सत्र के बर्बाद होने का जिम्मेदार कौन है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि 20 दिनों तक चले मानसून सत्र में हंगामे का ही बोलबाला रहा. लोकसभा में निर्धारित कामकाज का महज 19 प्रतिशत और राज्यसभा में 39 प्रतिशत कामकाज ही हो सका. जिस संसद में देश की नीतियां और दिशा तय होती हैं, वहां पूरे सत्र के दौरान चर्चा और बहस की जगह हंगामा, नारेबाजी, वॉकआउट और विरोध प्रदर्शन ज्यादा देखने को मिले. संसद के भीतर से लेकर संसद परिसर तक विपक्षी दलों का प्रदर्शन जारी रहा. कई अहम मुद्दों पर सार्थक चर्चा की उम्मीद थी, लेकिन सत्र का बड़ा हिस्सा गतिरोध की भेंट चढ़ गया. अब सवाल उठ रहा है कि इसकी जिम्मेदारी किसकी है?