जम्मू-कश्मीर विधानसभा में फूट-फूटकर क्यों रोने लगे कांग्रेस विधायक, देखें VIDEO

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  • प्रकाशित: अप्रैल 02, 2026

श्रीनगर: जम्मू‑कश्मीर विधानसभा में उस वक्त भावुक माहौल बन गया, जब कांग्रेस विधायक सैयद अहमद का निजी विधेयक खारिज कर दिया गया. विधेयक अस्वीकार होने के बाद सैयद अहमद खुद को संभाल नहीं पाए और सदन में फूट‑फूटकर रोने लगे. उनकी आवाज़ भर्रा गई और वे भावनाओं पर काबू नहीं रख सके.

सदन को संबोधित करते हुए सैयद अहमद ने कहा कि वह इस मुद्दे को लेकर बेहद इमोशनल हैं और उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें शांति से अपनी बात रखने दी जाए. उन्होंने साफ किया कि वह किसी को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि यह दुख और पीड़ा उन बच्चों और युवाओं को लेकर है, जो कश्मीर में उनसे आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं.

कांग्रेस विधायक ने कहा कि वह पिछले कई दिनों से मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं और ठीक से सुन‑समझ भी नहीं पा रहे हैं. उन्होंने चुनाव प्रचार के दिनों को याद करते हुए बताया कि उनके साथ खड़े रहने वाले कई लोग पहली बार राजनीति से जुड़े थे और उन्होंने पूरी निष्ठा से उनके लिए काम किया था. उन लोगों ने उन पर भरोसा किया था कि वे उनकी आवाज़ विधानसभा तक पहुंचाएंगे.

अपने भाषण के दौरान सैयद अहमद ने निजी जिंदगी से जुड़ी कई भावुक बातें भी साझा कीं. उन्होंने कहा कि उनके बच्चों ने उनसे कहा था कि “पापा, हम मर रहे हैं, हमें बचाइए.” उन्होंने सदन को बताया कि उन्होंने अपने परिवार से वादा किया था कि अगर वह चुनाव जीतते हैं तो हर हाल में सच बोलेंगे, भले ही इसके लिए उन्हें सजा ही क्यों न झेलनी पड़े.

उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति में उनका आना अपने नेता के खिलाफ खड़े होने या किसी तरह की टकराव की मंशा से नहीं था, बल्कि शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए था. उन्होंने कहा कि यह विधेयक उन बच्चों के लिए था, जो आज कश्मीर में एक उम्मीद के सहारे जिंदा हैं और चाहते हैं कि उनकी उम्मीदें खत्म न हों.

सैयद अहमद ने यह भी बताया कि यह विधेयक करीब डेढ़ साल तक लंबित रहा. इस दौरान उन्होंने कई तरह की आलोचनाएं, गालियां और दबाव झेले. उन्होंने कहा कि इस पूरे समय में मानसिक रूप से उन्हें और उनके परिवार को गहरा नुकसान पहुंचा.

भावुक होते हुए विधायक ने बताया कि उनका एक बच्चा अब लंदन में रह रहा है और उसने साफ शब्दों में कहा है कि वह वापस नहीं आना चाहता, क्योंकि उसे लगता है कि यहां उनके लिए कोई जगह नहीं है. इस बयान के दौरान सदन में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया.

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने इस्तीफा देने तक के बारे में सोचा. उन्होंने कहा कि वह अपने नेता के सामने खड़े होकर अपमानित नहीं होना चाहते थे. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अब भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा है और इसी भरोसे के तहत उन्होंने विधेयक तैयार कर सदन में पेश किया था.

सैयद अहमद का यह भावुक भाषण न सिर्फ उनके निजी दर्द को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि विधायी प्रक्रियाओं में देरी और अस्वीकृति किस तरह जनप्रतिनिधियों और उनके परिवारों पर गहरा असर डालती है.

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