UP शिक्षक ट्रांसफर मामले में Teacher Transfer Case में सरकार के आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की मुहर, जानिए जज ने क्‍या कहा 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार के 14 नवंबर 2025 के शिक्षकों के ट्रांसफर और समायोजन के आदेश को वैध ठहराया और विरोध वाली याचिकाएं खारिज कर दीं.

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यूपी में शिक्षकों के ट्रांसफर और समायोजन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के 14 नवंबर 2025 के शासनादेश को वैध ठहराया है. कोर्ट ने एकल और शिक्षक-विहीन प्राथमिक विद्यालयों में सरप्लस शिक्षकों की तैनाती से जुड़े इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया. जस्टिस मंजू रानी चौहान की सिंगल बेंच ने 39 पन्नों के विस्तृत आदेश में चित्रकूट के अरुण प्रताप सिंह समेत 157 याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं निस्तारित कीं.

कोर्ट ने कहा कि मामले में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो संस्थागत डेटा की कमी और सत्यापन न होने की ओर इशारा करते हैं. खासकर शिक्षकों की स्वीकृत संख्या और छात्र-शिक्षक अनुपात से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं थी. अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी अनिश्चितता से शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के बड़े हित प्रभावित हो सकते हैं.

अलग-अलग आपत्तियां दाखिल करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने माना कि जब प्रशासनिक कार्रवाई देखने में कानूनी हो लेकिन वास्तविक आंकड़ों की कमी से व्यवस्था में असंतुलन पैदा हो, तो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सीमित न्यायिक जांच जरूरी हो जाती है. कोर्ट ने सभी याचिकाकर्ताओं को एक सप्ताह के भीतर जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में बनी जिला स्तरीय समिति के समक्ष अलग-अलग आपत्तियां दाखिल करने का निर्देश दिया. समिति बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 और संबंधित सरकारी आदेशों के आधार पर एक महीने के भीतर तर्कपूर्ण फैसला करेगी.

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि एक महीने तक या सक्षम प्राधिकारी के अंतिम आदेश तक, जो भी पहले हो, यथास्थिति बनाए रखी जाएगी. साथ ही अधिकारियों को UDISE पोर्टल पर सही डेटा तुरंत सत्यापित और अपडेट करने का निर्देश दिया गया ताकि तय छात्र-शिक्षक अनुपात के अनुसार शिक्षकों की पोस्टिंग हो सके.

सरकार का आदेश बरकरार

यह मामला 14 नवंबर 2025 के शासनादेश और उससे पहले 23 मई 2025 के आदेश को लेकर उठा था. याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे, निपुण सिंह और तरुण अग्रवाल समेत कई वकीलों ने दलील दी कि नए आदेश में स्पष्ट प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों की कमी है, जिससे समायोजन प्रक्रिया मनमानी हो सकती है. हालांकि कोर्ट ने कहा कि सरकार का आदेश शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 के उद्देश्यों को लागू करने और छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने के लिए जारी किया गया था, इसलिए इसे बरकरार रखा जाता है.

कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि ट्रांसफर और रीडिप्लॉयमेंट की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और बिना भेदभाव के लागू की जाए. साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि समायोजन प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी शिक्षक को सजा देने या परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता. किसी भी शिकायत पर सक्षम प्राधिकारी कानून के मुताबिक कार्रवाई करेगा.

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फैसले के अंत में कोर्ट ने रिसर्च एसोसिएट सुश्री वैष्णवी केसरवानी के कानूनी शोध और विश्लेषण की सराहना करते हुए कहा कि उनके योगदान ने निर्णय प्रक्रिया को और मजबूत बनाया.

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