- इलाहाबाद HC ने UP में बढ़ती बंदूक संस्कृति पर चिंता जताते हुए शस्त्र लाइसेंस का आंकड़ा प्रस्तुत करने को कहा है
- जज ने राजनीतिक और संदिग्ध पृष्ठभूमि के लोगों द्वारा हथियारों के गलत उपयोग को समाज में भय का कारण बताया
- अदालत ने सोशल मीडिया पर हथियारों के प्रदर्शन को गंभीर खतरा मानते हुए इसे सामाजिक स्वीकृति पाने की कोशिश बताया
"राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले या संदिग्ध पृष्ठभूमि के लोग लाइसेंसी हथियारों का इस्तेमाल ताकत दिखाने, प्रभाव जमाने और परोक्ष रूप से दूसरों को डराने के लिए कर रहे हैं, जिससे समाज में भय का माहौल बन रहा है." ये सख्त टिप्पणी है इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की. अदालत ने उत्तर प्रदेश में बढ़ती “बंदूक संस्कृति” पर गंभीर चिंता जताते हुए राज्य सरकार को जारी सभी शस्त्र लाइसेंसों का समग्र आंकड़ा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है.
अदालत ने सोशल मीडिया, विशेषकर इंस्टाग्राम रील्स पर हथियारों के प्रदर्शन को भी गंभीरता से लिया. अपने 23 मार्च के आदेश में अदालत ने कहा कि इस तरह का व्यवहार ध्यान आकर्षित करने सामाजिक स्वीकृति पाने और पहचान बनाने का माध्यम बनता जा रहा है, जो खतरनाक प्रवृत्ति है.
समाज में हिंसा सामान्य हो रही
अदालत ने टिप्पणी की, “ऐसे दुरुपयोग से भय की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है, कानूनी संस्थाओं में जनता का विश्वास कमजोर होता है और समाज में हिंसा सामान्य होती जाती है.” अदालत ने प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को यह बताने का निर्देश दिया कि क्या प्रदेश सरकार द्वारा शस्त्र लाइसेंस के डेटा तैयार किए गए हैं और क्या लाइसेंस देने, मना करने या नवीकरण में जिला मजिस्ट्रेट को तार्किक निर्णय करने में मार्गदर्शन के लिए कोई औपचारिक शस्त्र नीति तैयार की गई है.
कोर्ट ने मांगा शस्त्र धारकों का विस्तृत ब्योरा
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई परिवारों में पति, पत्नी, बेटा, बेटी और बहू तक के पास अलग-अलग शस्त्र लाइसेंस हैं, और कभी-कभी एक से अधिक हथियार भी होते हैं. हाई कोर्ट ने इसे “गंभीर न्यायिक परीक्षण” की आवश्यकता वाला मुद्दा बताया. इसके तहत अदालत ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जिला और थाना स्तर पर शस्त्र धारकों का विस्तृत ब्योरा उपलब्ध कराएं, साथ ही ऐसे मामलों की जानकारी भी दें जहां एक ही परिवार के कई सदस्यों के पास अलग-अलग लाइसेंस हैं.
लाइसेंस धारकों के आपराधिक मामलों का मांगा ब्यौरा
अदालत ने यह भी कहा कि जिन लाइसेंस धारकों का दो या उससे अधिक आपराधिक मामलों का इतिहास है, उनकी अलग श्रेणी बनाई जाए. यह निर्देश भदोही के ज्वैलर जयशंकर उर्फ बैरिस्टर की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया. याचिकाकर्ता का शस्त्र लाइसेंस आवेदन जिलाधिकारी द्वारा करीब चार साल बाद बिना स्पष्ट कारण बताए खारिज कर दिया गया था.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्यों की सख्त टिप्पणी?
सितंबर 2018 में अनुकूल पुलिस रिपोर्ट मिलने के बावजूद नवंबर 2022 में आवेदन निरस्त कर दिया गया. इसके बाद की अपील भी 20 नवंबर 2025 को विंध्याचल मंडल, मिर्जापुर के अपर आयुक्त द्वारा बिना कारण बताए खारिज कर दी गई. अदालत ने भदोही के जिलाधिकारी को इस देरी और शस्त्र नियम 13 के अनुपालन में बाधा के कारणों पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. इस मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को होगी.
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इनपुट- भाषा













