Glass Bottle On IND-PAK Border: जब हम भारत की सीमाओं के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में अक्सर कंटीली तारों वाली बाड़ की तस्वीर आती है. जैसा कि फिल्मों और टीवी में दिखाया जाता है, लेकिन अगर आप ध्यान से देखें, तो आपको बाड़ के बीच-बीच में लटकी हुई कांच की बोतलें भी दिखाई देंगी. पहली नजर में ये बोतलें बेकार या फेंकी हुई चीज लग सकती हैं, लेकिन इनका बहुत महत्वपूर्ण काम है. ये बोतलें सीमा पर तैनात जवानों के लिए एक तरह की स्थानीय चेतावनी (local alarm) का काम करती हैं. कोई भी हल्की हलचल होने पर ये बोतलें टकराकर आवाज करती हैं, जिससे जवानों को तुरंत सतर्क होने में मदद मिलती है. कई बार यही आवाज उनकी जान भी बचा देती है.
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इन बोतलों का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?
भारत की सीमाएं घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और बर्फ से ढके इलाकों से गुजरती हैं. ऐसे स्थानों पर हर जगह हाई-टेक सेंसर या सीसीटीवी कैमरे लगाना आसान भी नहीं होता और न ही वे हर समय ठीक से काम करते हैं. कई बार भारी बारिश, बर्फबारी या बिजली की कमी से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण काम करना बंद कर देते हैं, पर कांच की बोतलें किसी बिजली, बैटरी या नेटवर्क पर निर्भर नहीं होतीं. ये हर मौसम में, 24 घंटे, लगातार काम करती रहती हैं. इसलिए इन्हें एक सस्ता, भरोसेमंद और सरल सुरक्षा उपाय माना जाता है.
ये प्रणाली कैसे काम करती है?- सीमा पर तैनात सैनिक खाली कांच की बोतलों को एक-दूसरे के पास बांधकर कंटीली तारों पर टांग देते हैं.
- जब कोई घुसपैठिया, आतंकी या जंगली जानवर बाड़ को छूता या पार करने की कोशिश करता है, तो हलचल के कारण बोतलें आपस में टकराती हैं.
- खासतौर पर रात के सन्नाटे में, इन बोतलों की टकराने की तेज आवाज दूर तक सुनाई देती है.
- गश्त पर मौजूद सैनिक इस आवाज को पहचानने के लिए प्रशिक्षित होते हैं. आवाज सुनते ही वे तुरंत सतर्क होकर कार्रवाई करते हैं.
- यही साधारण-सी व्यवस्था कई बार जवानों को खतरे से पहले ही सावधान कर देती है.














