LPG सप्‍लाई में आई द‍िक्‍कत, पाइपलाइन गैस वाले क्‍यों हैपी?

LPG की सप्लाई जहां कई जगहों पर लड़खड़ा गई, वहीं पाइपलाइन गैस (PNG) की सप्लाई बड़े शहरों में लगभग बिना किसी रुकावट जारी रही. इसका कारण दोनों ऊर्जा प्रणालियों की संरचना में मौजूद बड़ा अंतर है.

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क्या पाइपलाइन गैस पर भी पड़ेगा असर?

अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान के तनाव के बीच भारत में LPG सिलेंडर की कमी की खबरों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. देश के अलग‑अलग शहरों से ऐसी कई तस्वीरें सामने आ रही हैं, जिनमें गैस सिलेंडर की उपलब्धता की असली स्थिति देखने को मिल रही है. इसी के चलते अब लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि जिन घरों में पाइपलाइन (PNG) से गैस मिलती है, क्या उन्हें भी किसी तरह की दिक्कत का सामना करना पड़ेगा. कई लोग यह भी सोच रहे हैं कि कहीं पाइप वाली गैस पर भी कोई लिमिट या कैप तो नहीं लगा दी जाएगी. हालांकि, इसको लेकर अभी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. 

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PNG सप्लाई पर असर क्यों नहीं पड़ा

कई शहरों में LPG एजेंसियों के बाहर लंबी लाइनें लग गईं. यह सिर्फ कुछ दिनों की दिक्कत नहीं थी. इससे यह पता चला कि भारत की गैस सप्लाई व्यवस्था में कुछ बड़ी कमजोरियां हैं. इनमें आयात पर ज्यादा निर्भरता, सीमित भंडारण और लंबी वितरण प्रक्रिया शामिल हैं. दूसरी तरफ जिन घरों में PNG पाइपलाइन है, वहां ज्यादा समस्या नहीं हुई. इसका मतलब यह नहीं है कि PNG ने LPG की जगह ले ली है. लेकिन इस संकट से यह जरूर पता चला कि मुश्किल समय में PNG का सिस्टम ज्यादा मजबूत साबित होता है.

भारत में लगभग 210 LPG बॉटलिंग प्लांट हैं, जिनकी एनुअल कैपेसिटी लगभग 22.6 मिलियन टन है, और देशभर में 25,000 से ज्यादा LPG डिस्ट्रीब्यूटर्स काम करते हैं. इस लंबी सप्लाई चेन के हर चरण में रुकावट आने की संभावना रहती है. किसी भी लेवल पर दिक्कत होने पर सिलेंडर की उपलब्धता तुरंत प्रभावित होती है. 

Photo Credit: Ajay Kumar Patel

घरों तक कैसे पहुंचती है पाइपलाइन गैस?

PNG (पाइपलाइन गैस) पर असर नहीं पड़ने की बड़ी वजह इसका सप्लाई सिस्टम है. LPG के मुकाबले PNG एक लगातार चलने वाले पाइपलाइन नेटवर्क पर आधारित है. नेचुरल गैस सीधे उत्पादन क्षेत्रों या इम्पोर्ट टर्मिनलों से राष्ट्रीय गैस ग्रिड के जरिए सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) नेटवर्क तक पहुंचती है और फिर वहीं से घरों के मीटरों तक सप्लाई होती रहती है. एक बार घर पाइपलाइन से जुड़ जाए, तो उपभोक्ता को सिलेंडर बुक करने या उसकी डिलीवरी की चिंता नहीं करनी पड़ती. गैस सीधे पाइपलाइन के जरिए लगातार मिलती रहती है.

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सरकार ने स्थिति को देखते हुए PNG की सुरक्षा को प्राथमिकता दी. 9 मार्च 2026 को जारी नेचुरल गैस कंट्रोल ऑर्डर (Essential Commodities Act के तहत) में घरेलू PNG और CNG को गैस आवंटन की सबसे ऊंची प्राथमिकता वाली श्रेणी में रखा गया. 

पाइपलाइन गैस क्यों है सुरक्षित?

PNG की सप्लाई ज्यादा सुरक्षित इसलिए भी रही क्योंकि घरों के लिए दी जाने वाली पाइपलाइन गैस मुख्य रूप से देश में ही बनने वाली एडमिनिस्टरड‑प्राइस गैस पर आधारित है, जो ज्यादातर ONGC और Oil India के पुराने नेशनलाइज्ड फील्ड्स (Nomination Fields) से आती है. इस गैस की सप्लाई पहले से ही वैश्विक LNG कीमतों के उतार‑चढ़ाव और इम्पोर्ट में आने वाले व्यवधानों से सुरक्षित मानी जाती है. 

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सरकार ने संकट के समय सबसे पहले पाइपलाइन वाले घरों की गैस खपत को सुरक्षित रखा और अन्य सेक्टरों को सप्लाई शॉक झेलने दिया. इसका असर जमीन पर साफ दिखा. दिल्ली‑NCR, मुंबई, बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसे शहरों में PNG से जुड़े घरों को बिना रुकावट गैस मिलती रही, जबकि LPG सिलेंडर के रीफिल का अंतर बढ़ा दिया गया और कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई में भी कमी देखने को मिली.

LPG और पाइपलाइन गैस की कीमतों में कितना है अंतर?

घर में PNG कनेक्शन लगवाने के लिए आमतौर पर 6,000 से 9,000 रुपये तक का खर्च आता है, खासकर उन इमारतों में जहां पहले से पाइपलाइन व्यवस्था नहीं है और रेट्रोफिटिंग करनी पड़ती है. कम‑आय वाले परिवारों के लिए, जिनमें कई PMUY (प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना) के लाभार्थी भी शामिल हैं, इतना शुरुआती खर्च बिना सब्सिडी के वहन करना मुश्किल होता है.

इसके मुकाबले, LPG पर मिलने वाली सब्सिडी सीधे उपभोग लागत को कम करती है. PMUY लाभार्थियों को अभी प्रति सिलेंडर लगभग 300 रुपये की सब्सिडी मिलती है, जिससे LPG उनकी पहुंच में बना रहता है.

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