- सीकर जिले के रींगस कस्बे में धुलंडी के दिन मुर्दे की शव यात्रा और दूल्हे की बारात एक साथ निकाली जाती है
- यह परंपरा सांप्रदायिक सौहार्द और बुराई पर अच्छाई की जीत का ऐतिहासिक प्रतीक मानी जाती है
- गोपीनाथ राजा मंदिर के सामने समाज सेवा समिति द्वारा भजन और निशुल्क चाय-पकौड़ी सेवा आयोजित की जाती है
भारत में होली के सैकड़ों रंग देखने को मिलते हैं. कहीं लट्ठमार होली होती है, तो कहीं फूलों की. लेकिन राजस्थान के सीकर जिले के रींगस कस्बे में होली मनाने का एक ऐसा तरीका है जो पूरे देश में शायद ही कहीं और देखने को मिले. यहां धुलंडी के दिन एक तरफ मुर्दे की शव यात्रा निकलती है, तो ठीक उसके पीछे दूल्हे की बारात. यह परंपरा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द और बुराई पर अच्छाई की जीत का एक ऐतिहासिक प्रतीक है.
गोपीनाथ राजा मंदिर से शुरू होता है उल्लास
होली के अगले दिन यानी धुलंडी की सुबह 8 बजते ही पूरा कस्बा रींगस नरेश गोपीनाथ राजा मंदिर के सामने इकट्ठा हो जाता है. यहां का नजारा देखने लायक होता है. श्री सूर्य मंडल समाज सेवा समिति पिछले 50 वर्षों से लगातार भजनों का कार्यक्रम आयोजित कर रही है. पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष कैलाश पारीक द्वारा शुरू की गई चाय-पकौड़ी की 'मनवार' (सेवा) आज भी जारी है, जहाँ आने वाले सभी लोगों को निशुल्क नाश्ता कराया जाता है. दोपहर 1 बजे तक युवा भजनों की धुन पर थिरकते हुए एक-दूसरे को रंग और गुलाल से सराबोर कर देते हैं.
जब 'मातम' और 'जश्न' मिलते हैं एक साथ
दोपहर 1:30 बजे अचानक रंगों का खेल रुक जाता है और शुरू होती है एक विशेष यात्रा की तैयारी. कस्बे के ही एक युवा को दूल्हा बनाया जाता है, जिसे ऊंट या घोड़े पर बैठाया जाता है. वहीं दूसरी ओर, हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार एक अर्थी (मुर्दे का प्रतीक) तैयार की जाती है.
इसे समाज में व्याप्त बुराइयों के अंत का प्रतीक माना जाता है. इसके पीछे चलने वाले लोग मातम मनाते हुए चलते हैं. यह आने वाले पूरे वर्ष की खुशियों और मांगलिक कार्यों का प्रतीक है. बारात में लोग नाचते-गाते चलते हैं. यह यात्रा श्मशान घाट तक जाती है, जहां प्रतीकात्मक मुर्दे का दाह संस्कार किया जाता है. इसके बाद भक्त प्रहलाद की आरती होती है और सभी लोग वापस मंदिर आकर एक-दूसरे को गले लगाकर होली की विदाई देते हैं.














