Hockey Player Nausheen Naz Struggle Story: यह कहानी एक हॉकी मैच की तरह शुरू होती है धीमी, अनिश्चित, जैसे सिवनी की धूल भरी जमीन पर सीटी बजती हो. न कोई स्टेडियम की रोशनी, न कोई शोर मचाती भीड़. बस 15 साल की एक लड़की, टूटी हुई स्टिक, जिसे कपड़े और उम्मीद से बांधकर उसने भूख, संदेह और अविश्वास को ड्रिबल करते हुए पार किया. साइडलाइन पर जिंदगी तालियां नहीं बजा रही थी, बल्कि हर कदम पर उसे रोकने के लिए डिफेंस खड़ा कर रही थी, लेकिन यह मैच मैदान पर नहीं, एक घर के भीतर शुरू हुआ जहां हर कदम पर सवाल उठाए गए. “तुम अपनी बेटियों को गलत रास्ते पर ले जा रहे हो… हमारे मजहब में ये सब मंजूर नहीं… देखो, ये हाफ पैंट पहनकर खेलती हैं,” रिश्तेदार ताने देते थे.
एक साल से ज्यादा वक्त तक, जब तक कोई सहारा नहीं मिला, ये आवाजें किसी स्टेडियम की गूंज से भी ज्यादा तेज थीं. लेकिन उनके पिता एहफाज खान ने इन्हें नजरअंदाज किया. एक दिहाड़ी मजदूर, जिसने डर नहीं, भरोसा चुना जो थोड़ा-बहुत बचता, उससे बेटियों के मैच देखने जाता रहा, जबकि एक बेटी 10वीं में, दूसरी 11वीं में और तीसरी 7वीं में पढ़ रही थी. यही थी नौशीन नाज़ के मैच की पहली सीटी समाज के खिलाफ खेला गया पहला मुकाबला.
एनडीटीवी से बातचीत में उनके पिता अपनी जिंदगी की सच्चाई खुलकर बताते हैं. “मैं रोज ₹200 से ₹400 कमाता हूं… मैं कबाड़ का गत्ता खरीदता हूं और ₹10–₹11 किलो के हिसाब से बेचता हूं. यही मेरा काम है.” सात बच्चों का परिवार पांच बेटियां और दो बेटे और तीन बेटियां उस रास्ते पर, जिसे वह खुद कभी खरीद भी नहीं सकता था.
“सिवनी में बस स्टैंड के पास एक टर्फ ग्राउंड है… लेकिन मैं उन्हें हॉकी स्टिक नहीं दिला सकता था.” इसके बाद जो हुआ, वह खेल से ज्यादा एक खामोश बगावत थी. “मोहल्ले में एक लड़का था, जिसने हॉकी छोड़ दी थी. उसके घर में एक टूटी हुई स्टिक पड़ी थी. नौशीन उसे ‘मामा' कहती थी, उसने कहा जाकर देख लो, कोने में पड़ी होगी.” वह स्टिक मिली टूटी हुई, बेकार. लेकिन उसके लिए वही सब कुछ थी. “वह उसे लोहार के पास ले गई… हैंडल के पास दो कील ठुकवाई… नीचे कपड़ा बांधा, फेवीक्विक लगाया… और उसी हालत में खेलती रही.”
न कोई किट, न कोई सहारा. बस एक बच्ची, जो टूटी हुई स्टिक को जोड़ते-जोड़ते अपनी किस्मत भी जोड़ रही थी. जहां बाकी खिलाड़ी चमकदार उपकरणों के साथ मैदान में उतरते थे, वहीं नौशीन भूख, जिम्मेदारियों और एक शांत लेकिन अडिग जिद के साथ खेलती रही.
दूसरा क्वार्टर, और मुकाबला और कठिन हो जाता है. सात भाई-बहन, एक ही छत, एक ही रोटी, एक ही सपना. पिता दिन-रात काम करता है, कभी नींद तक छोड़ देता है, सिर्फ इसलिए कि घर चल सके. लेकिन खेल रुकता नहीं. नौशीन आगे बढ़ती रहती है और अब पिता भी साइडलाइन पर पहले से ज्यादा मजबूती से खड़ा है, बिना किसी हिचक के, बिना किसी आवाज को सुने सिर्फ अपनी बेटियों के कदमों की आहट सुनते हुए.
फिर आता है पलटवार टर्निंग पॉइंट. 2023 में मध्यप्रदेश हॉकी अकादमी की नजर उस पर पड़ती है. मैदान अचानक बड़ा हो जाता है. ट्रेनिंग, डाइट, उपकरण जो कभी दूर की चीजें थीं. अब संभव होने लगती हैं. “अकादमी उसकी लाइफलाइन बन गई,” पिता कहते हैं. लेकिन आज भी भोपाल के नेशनल कैंप में नौशीन दूसरों से किट उधार लेकर अभ्यास करती है.
तीसरा क्वार्टर, और वह रुकने वाली नहीं. बिहार के राजगीर में सब-जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में उसने डिफेंस तोड़ दिया नौ गोल, टॉप स्कोरर, फाइनल की प्लेयर. जिस लड़की को कभी उसके कपड़ों के लिए रोका जाता था, आज उसे उसके गोल के लिए देखा जा रहा है. स्टैंड में बैठा पिता रो पड़ते हैं “उसे खेलते देख मेरी आंखों से आंसू निकल आए.” जो कभी ताने देते थे, आज वही फोटो खिंचवाने के लिए साथ खड़े हैं.
आखिरी क्वार्टर. गोलपोस्ट सामने है. जापान में होने वाले अंडर-18 एशिया कप के लिए चयन की दहलीज पर वह खड़ी है. “अब अगर कोई मेरी बेटी को रोकेगा, तो पहले मुझसे टकराना होगा,” एहफाज खान कहते हैं अब वह डिफेंड नहीं कर रहे, बल्कि खुद आक्रमण की अगुवाई कर रहे हैं. फाइनल सीटी अभी नहीं बजी है. लेकिन नौशीन नाज़ अपनी जिंदगी का सबसे मुश्किल मैच जीत चुकी है गरीबी, समाज और दबाव के खिलाफ. सिवनी की एक टूटी स्टिक से लेकर भारत की जर्सी के करीब तक का यह सफर सिर्फ हॉकी की कहानी नहीं है. यह उस परिवार की कहानी है जिसने हार मानने से इनकार कर दिया चाहे मुकाबला कितना भी कठिन क्यों न हो.













