- महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले एक किसान ने अपने बैल की मौत पर उसका अंतिम संस्कार किया.
- बैल की मौत से आहत पचोद गांव के किसान मोहन बापूराव झिन ने अपना मुंडन भी करवाया.
- बैल की मौत के दसवें दिन दशक्रिया विधि वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुई और तेरहवें दिन भोज दिया गया.
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले से इंसान और पशु के बीच गहरे भावनात्मक रिश्ते की एक अनोखी और संवेदनशील कहानी सामने आई है. पैठन तालुका के पचोद गांव में एक किसान ने अपने बैल की मौत के बाद वो सारे धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान किए, जो आमतौर पर किसी परिजन के निधन पर किए जाते हैं. अब इस घटना की पूरे इलाके में चर्चा है और लोग इस पर बात करते नही थक रहे हैं.
पचोद के कल्याण इलाके में रहने वाले किसान मोहन बापूराव झिन के परिवार का बैल ‘खंड्या' पिछले 28 वर्षों से उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था.खंड्या परिवार के लिए केवल एक पशु नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह था. उसकी अचानक मौत से पूरा परिवार सदमे में डूब गया.
वैदिक मंचोच्चार के साथ धार्मिक रस्में
बैल के निधन के बाद मोहन झिन ने पारंपरिक सूतक (शोक की पारंपरिक अवधि) का पालन किया. उन्होंने अपने सिर का मुंडन भी कराया, जो आमतौर पर करीबी रिश्तेदार की मृत्यु पर किया जाता है.
बैल की मौत के दसवें दिन उसकी आत्मा की शांति के लिए दशक्रिया विधि संपन्न कराई गई. इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सभी धार्मिक रस्में निभाई गईं. परिवार ने माना कि इतने सालों तक सेवा करने वाले खंड्या को वही सम्मान मिलना चाहिए, जो एक इंसान को दिया जाता है.
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तेरहवें के दिन ग्रामीणों को कराया भोज
तेरहवें दिन तेरहवीं के कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें गांव के लोगों को भोज भी कराया गया. बड़ी संख्या में ग्रामीण इस कार्यक्रम में शामिल हुए और किसान परिवार के इस निर्णय की सराहना की. कई ग्रामीणों ने इसे पशुओं के प्रति संवेदनशीलता और भारतीय ग्रामीण संस्कृति की गहरी जड़ों से जुड़ा उदाहरण बताया.
यह घटना न केवल इंसान और पशु के रिश्ते की मजबूती को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि ग्रामीण भारत में आज भी परंपरा, करुणा और कृतज्ञता कितनी अहम भूमिका निभाती है.














