- महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार का बारामती में एक प्लेन दुर्घटना में निधन हो गया, जिससे सब गमगीन हैं
- अजित पवार ने 2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ लेकर राजनीतिक रूप से बड़ा विद्रोह किया था
- 2023 में उन्होंने शरद पवार से अलग होकर शिंदे-फडणवीस सरकार में डिप्टी सीएम का पद संभाला और पार्टी में फूट डाली
महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार का बारामती में बुधवार को एक प्लेन क्रैश में निधन हो गया. इस अनहोनी के बारे में किसी ने भी सपने में भी नही सोचा था. जो हुआ उससे सिर्फ पवार परिवार ही नहीं एनसीपी नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी बड़ा झटका लगा है. हर तरफ गअजित दादा तो चले गए लेकिन पीछे छोड़ गए अनगिनत यादें और राजनीति से जुड़े अपने वे बयान और फैसले , जो एक बार फिर लोगों के जहन में जिंदा हो उठे हैं. अजित पवार की राजनीतिक यात्रा में कुछ ऐसे मोड़ आए जो इतिहास बन गए. जानें सबकुछ.
2019 का सुबह -सुबह शपथ ग्रहण! नवंबर 2019 की वो सुबह कोई नहीं भूल सकता, जब अचानक देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने राजभवन में शपथ लेकर सबको सन्न कर दिया. यह विद्रोह की पहली बड़ी धमक थी.
2023 का सत्ता परिवर्तन! अपने राजनीतिक गुरु और चाचा शरद पवार से अलग होकर शिंदे-फडणवीस सरकार में शामिल होना और सीधे डिप्टी सीएम की कुर्सी संभालना, उनके जीवनकाल की बड़ी सुर्खियों में शामिल रहा. उन्होंने न सिर्फ पार्टी तोड़ी, बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नाम और निशान पर भी अपना दावा मजबूत किया.
इस्तीफों का दौर! कई बार सार्वजनिक रूप से भावुक होकर या नाराजगी में विधायक पद से इस्तीफा देना. उनका हर इस्तीफा एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता दिखा.
अजित पवार के वायरल बयान! जब 'दादा' की जुबान ने बनाई सुर्खियां! अजित पवार अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कभी-कभी यही बेबाकी उनके लिए मुसीबत भी बनी
सूखे और बांध वाला बयान 2013- मामला 7 अप्रैल 2013 का है, इंदापुर तालुका में अजित पवार एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे. उस समय महाराष्ट्र भीषण सूखे की चपेट में था और सोलापुर के किसान बांधों से पानी छोड़ने की मांग को लेकर मुंबई के आजाद मैदान में भूख हड़ताल पर बैठे थे. किसानों के प्रदर्शन और सूखे के मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए अजित पवार ने बेहद आपत्तिजनक लहजे में कहा था: "जब बांध में पानी ही नहीं है, तो क्या हम वहां जाकर पेशाब करें? जब पानी ही नहीं है तो उसे छोड़ा कैसे जाए?"
बयान पर विवाद इतना बढ़ा कि अजित पवार को सतारा जिले के कराड में यशवंतराव चव्हाण की समाधि पर जाकर एक दिन का उपवास रखना पड़ा और सार्वजनिक रूप से माफी मांगी.
"मैं सुप्रिया से बेहतर प्रशासक हूं": अजित पवार ने खुद को सुप्रिया सुले से बेहतर प्रशासक बताने वाला यह बयान 14 जनवरी 2024 को पुणे के बारामती में एक जनसभा के दौरान दिया था. एनसीपी में फूट के बाद अपनी ताकत दिखाने और बारामती की जनता को अपने पक्ष में करने के लिए उन्होंने सीधे तौर पर चुनौती देते हुए कहा था कि सुप्रिया सुले सांसद के रूप में अपनी जगह हो सकती हैं, लेकिन जहां बात मंत्रालय चलाने, फाइलों का निपटारा करने और विकास कार्यों में गति लाने की आती है, वहां वे उनसे कहीं अधिक सक्षम और अनुभवी प्रशासक हैं.
- अधिकारियों को फटकार: हाल का बड़ा मामला सितंबर 2025 का है, जो सोलापुर जिले के करमाला तालुका के कुर्डू गांव से जुड़ा है. यहां अवैध मिट्टी उत्खनन के खिलाफ कार्रवाई करने पहुंचीं युवा महिला आईपीएस अधिकारी अंजना कृष्णा जो मूल रूप से केरल, दक्षिण भारत की रहने वाली हैं, उनको अजित पवार ने फोन पर जमकर फटकार लगाई थी घटना के दौरान जब एक एनसीपी कार्यकर्ता ने फोन कर अधिकारी को अजित पवार से बात करने को कहा, तो अधिकारी ने उनकी आवाज नहीं पहचानी और नियमों के तहत अपने निजी फोन पर कॉल करने को कहा.
- इससे नाराज होकर अजित पवार ने फोन पर ही धमकाते हुए कहा, "मैं तेरे ऊपर एक्शन लूंगा, इतना तुझमें डेरिंग आ गया है क्या? तुझे मेरा चेहरा देखना है? अपना नंबर दो मैं वीडियो कॉल करता हूं." इसके बाद उन्होंने वीडियो कॉल कर कथित तौर पर उन्हें माइनिंग के खिलाफ कार्रवाई रोकने का आदेश दिया. हालांकि विवाद बढ़ने पर अजित पवार ने सफाई दी कि उनका मकसद कानून में दखल देना नहीं, बल्कि वहां मौजूद कार्यकर्ताओं के गुस्से को शांत करना था.
- वोट नहीं तो फंड नहीं : अजित पवार ने हाल ही में नवंबर 2025 में एक चुनावी रैली के दौरान 'फंड बनाम वोट' को लेकर एक विवादित बयान दिया था, बारामती में स्थानीय निकाय चुनावों के प्रचार के दौरान उन्होंने मतदाताओं को पर संबोधित करते हुए कहा था: "आपके पास वोट है, तो मेरे पास फंड है. अगर आप मुझे मेरे उम्मीदवारों को वोट नहीं देंगे, तो मैं भी फंड देने में अपना हाथ पीछे खींच लूंगा."
- हाल ही में अपने सहयोगी दल पर भी साधा था निशाना: अपनी मृत्यु से मात्र दो हफ्ते पहले भी वे एक और वजह से चर्चा में रहे थे. उन्होंने दावा किया था कि उनके पास 1999 की भाजपा-शिवसेना सरकार के 110 करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार की फाइल आज भी मौजूद है. इस बयान ने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी.
बोलने की शैली, बेबाक, कड़क टू द पॉइंट!
अजित पवार की बोलने की शैली का सबसे अनूठा पहलू था कि उनका कड़क और आक्रामक टोन उनकी कमजोरी नहीं बल्कि उनकी पहचान बन गया, जिसके चलते उनके विरोधी भी अक्सर उनका बचाव करते नजर आए. कई बार विवादित बयानों के बाद भी उनके विपक्षी नेता यह कहते हुए मामला शांत कर देते हैं कि "दादा का बोलने का लहजा ही ऐसा है, वे दिल के बुरे नहीं हैं."
उनकी बोली में जो खुरदरापन और स्पष्टवादिता थी, उसे महाराष्ट्र के लोग "अस्सल मराठमोळा ठसका" यानी असली मराठी अंदाज मानते हैं. यही कारण है कि उनके गुस्से को अक्सर अनुशासन की तरह देखा जाता था, जहां डांट के पीछे काम करवाने की नीयत छिपी होती थी, और यही शैली उन्हें भीड़ में सबसे अलग और विश्वसनीय नेता बनाती थी. जहां शरद पवार अपनी सियासी-रहस्यमयी-चालों के लिए जाने जाते हैं, वहीं अजित पवार अपनी पारदर्शिता और गति के लिए. उनकी राजनीति रिजल्ट ओरिएंटेड रही, यही वजह है कि तमाम विवादों के बावजूद वे महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र में बने रहे.













