शादी कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट नहीं, पत्नी नौकरानी नहीं: घरेलू काम न करने पर तलाक देने से कोर्ट का इनकार

बॉम्बे हाई कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी- शादी कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट नहीं और पत्नी नौकरानी नहीं है. घरेलू काम न करने को मानसिक क्रूरता मानकर तलाक देने से कोर्ट का इनकार.

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Bombay High Court

बॉम्बे हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और तलाक के मामलों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी की है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पत्नी द्वारा खाना बनाने या सफाई करने जैसे घरेलू काम न कर पाना अपने आप में 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता. कोर्ट के मुताबिक, शादी बराबरी की साझेदारी है, यह कोई नौकरी का अनुबंध (सर्विस कॉन्ट्रैक्ट) नहीं है और पत्नियों को 'बंधुआ नौकरानी' नहीं समझा जा सकता. अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए क्रूरता के आधार पर तलाक मांगने वाली एक पति की याचिका को खारिज कर दिया.

फैमिली कोर्ट का फैसला पलटा

जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पत्नी का दैनिक कामकाज करने से इनकार करना “मानसिक क्रूरता” के दायरे में नहीं आता. शादी बराबरी की साझेदारी है, कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट नहीं और पत्नियां घर की नौकरानी नहीं होतीं. इसी के साथ हाई कोर्ट ने साल 2010 में बांद्रा फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश और पत्नी को गुजारा भत्ता न देने के फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया.

गुजारा भत्ता और रहने का खर्च देने का आदेश

हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी को गुजारा भत्ता देने से सिर्फ इसलिए इनकार कर दिया था, क्योंकि उसने 'आर्ट एंड क्राफ्ट' क्लास का एक विज्ञापन जारी किया था. हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया, "ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि इस काम से पत्नी को नियमित या पर्याप्त स्वतंत्र आमदनी हो रही थी."

अदालत ने तर्क दिया कि पति एक चार्टर्ड अकाउंटेंट है, उसके पास पेशेवर योग्यता है और वह पत्नी का खर्च उठाने में पूरी तरह सक्षम है. इसलिए, कोर्ट ने आदेश दिया कि पति अपनी पत्नी को हर महीने 10,000 रुपये गुजारा भत्ता और रहने के लिए अलग से 10,000 रुपये प्रति माह (कुल 20,000 रुपये) का भुगतान करे.

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क्या था पूरा मामला?

इस मामले में दोनों की शादी साल 2002 में हुई थी. पति का आरोप था कि शादी के कुछ दिनों बाद ही विवाद शुरू हो गया और कुछ महीनों में पत्नी अपने मायके लौट गई. इसके बाद पति ने 2004 में क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की. पति का दावा था कि पत्नी घर का काम नहीं करती थी, माता-पिता की बात नहीं मानती थी, खाना बनाना नहीं जानती थी, उसका व्यवहार रूखा था और वह उसे मानसिक तनाव देती थी.

दूसरी ओर, पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उससे घर के सारे काम जैसे बर्तन-कपड़े धोना, खाना बनाना और सफाई जबरन कराए जाते थे और उसे बचा हुआ खाना खाने के लिए मजबूर किया जाता था. पत्नी के वकील ने दलील दी कि वह अपने पति के स्टेटस के अनुसार सम्मानजनक गुजारा भत्ता और रहने की जगह पाने की हकदार है, क्योंकि वह पति और ससुराल वालों के उत्पीड़न के कारण ही घर छोड़ने पर मजबूर हुई थी.

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हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां

शुरुआती दिनों का सामान्य मनमुटाव: कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा पत्नी पर लगाए गए आरोप बेहद 'सामान्य' प्रकृति के हैं. शादी के शुरुआती दिनों में सामंजस्य बिठाते समय ऐसे मतभेद आम बात हैं. इस 'सामान्य नोकझोंक' को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देकर 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता.

क्रूरता की परिभाषा क्या है?: पीठ ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत 'क्रूरता' साबित करने के लिए कृत्य इतने गंभीर होने चाहिए कि दूसरे जीवनसाथी के लिए साथ रहना असंभव हो जाए. इसमें लगातार अपमान, गंभीर व्यवहार संबंधी समस्याएं और झूठे आरोप शामिल होने चाहिए, जिससे समाज में छवि खराब हो.

बिना सबूत के तलाक गलत: कोर्ट ने कहा कि इस मामले में क्रूरता का कोई ठोस प्रमाण नहीं था, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा दिया गया तलाक का आदेश कानूनी रूप से सही नहीं था. कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि मामले में पति की मां और मौसी 'इंटरेस्टेड विटनेस' (हितबद्ध गवाह) थीं, अतः केवल उनकी गवाही के आधार पर पत्नी को क्रूर साबित नहीं किया जा सकता.

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