MP का अनोखा सरस्वती मंदिर, प्रसाद में चढ़ते हैं पेन और कॉपी, भक्तों का लगता है तांता, जानें क्या है मान्यता?

Basant Panchmi 2026: अनोखे सरस्वती मंदिर की विशेषता यहां का चढ़ावा है, जहां लड्डू, पेड़ा या मिठाई नहीं, बल्कि पेन, कॉपी और अध्ययन सामग्री प्रसाद के रूप में मां सरस्वती को अर्पित किया जाता है. मान्यता है कि जो विद्यार्थी श्रद्धा के साथ यहां यह उपाय करता है, वह परीक्षा में कभी असफल नहीं होता.

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UNIQUE SARASWATI TEMPLE WHERE DEVOTEES OFFERS PENS AND NOTEBOOKS

Sagar Unique Saraswati Temple: मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित एक अनोखा सरस्वती मंदिर इन दिनो चर्चा में है. अपनी विशेष परंपराओं व मान्यताओं के चलते पूरे बुंदेलखंड में आकर्षण के केंद्र बने इस अनोखे मंदिर में चढ़ावा पेन और कॉपी का चढ़ता है, जहां परीक्षा में सफलता की आशा लेकर हजारों छात्र-छात्राएं बसंत पंचमी पर पहुंचते हैं. 

अनोखे सरस्वती मंदिर की विशेषता यहां का चढ़ावा है, जहां लड्डू, पेड़ा या मिठाई नहीं, बल्कि पेन, कॉपी और अध्ययन सामग्री प्रसाद के रूप में मां सरस्वती को अर्पित किया जाता है. मान्यता है कि जो विद्यार्थी श्रद्धा के साथ यहां यह उपाय करता है, वह परीक्षा में कभी असफल नहीं होता.

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बुंदेलखंड की एकमात्र उत्तरमुखी सरस्वती मंदिर

शहर के इतवारा बाजार क्षेत्र में स्थित अनोखे सरस्वती मंदिर बुंदेलखंड का एकमात्र उत्तरमुखी सरस्वती मंदिर है. यहां मां सरस्वती की उत्तरमुखी आदमकद संगमरमर की प्रतिमा स्थापित है, जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा वर्ष 1971 में हुई थी. मां सरस्वती की प्रतिमा की प्रतिमा जयपुर से मंगवाई गई थी. 

ज्ञान की देवी मा सरस्वती उत्तर दिशा की देवी हैं

गौरतलब है उत्तर दिशा को ज्ञान की दिशा माना जाता है, चूंकि मां सरस्वती उत्तर दिशा की देवी हैं. यही कारण है कि मंदिर में प्रतिमा को उत्तरमुखी स्वरूप में स्थापित किया गया, जो इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करता है. एकल उत्तरमुखी सरस्वती प्रतिमा का यह मंदिर बुंदेलखंड क्षेत्र में अपनी तरह का इकलौता माना जाता है.

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मंदिर के पुजारी यशोवर्धन चौबे बताते हैं कि मंदिर का निर्माण कार्य वर्ष 1962 में उनके पिता प्रभाकर चौबे द्वारा शुरू कराया गया था. पुजारी बताते हैं कि, पहले यहां बरगद का एक पौधा लगाया, फिर मंदिर निर्माण की नींव रखी. इसके बाद मंदिर का निर्माण कार्य आगे बढ़ा.

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वर्ष 1971 में भव्य रूप में बनकर तैयार हुआ मंदिर

रिपोर्ट के मुताबिक मां सरस्वती का अनोखा मंदिर वर्ष 1971 में भव्य रूप में बनक तैयार हुआ. पुजारी यशोवर्धन बताते हैं कि तत्कालीन सांसद मनिभाई पटेल के सहयोग से मां सरस्वती की प्रतिमा की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई और 
बसंत पंचमी के अवसर पर हर वर्ष  इस मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं.

बडी़ संख्या में छात्र और अभिभावक पहुंचते हैं मंदिर

बसंत पंचमी के दिन अनोखे मंदिर में सुबह से देर रात तक पूजा-अर्चना, हवन और संस्कारों का आयोजन किया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में विद्यार्थी, अभिभावक और श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं. खास तौर पर छात्र मां सरस्वती के चरणों में पेन, कॉपी, किताबें और रजिस्टर चढ़ाकर ज्ञान, एकाग्रता और परीक्षा में सफलता की कामना करते हैं.

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अनोखे मंदिर में 14 संस्कार कराए जाते हैं, जिनमें अक्षर आरंभ संस्कार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. बसंत पंचमी पर छोटे बच्चों के लिए यह संस्कार कराया जाता है. बच्चों की जीभ के अग्रभाग पर अनार की लकड़ी से शहद के माध्यम से ‘ॐ' की आकृति उकेरी जाती है.

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मान्यता है आरंभ संस्कार से बच्चे ज्ञानवान बनते हैं

अनोखे मंदिर में विशेष मनोकामनाओं के लिए भी अनूठी परंपराएं प्रचलित हैं. इनमें आरंभ संस्कार प्रमुख है, जो छोट बच्चों का कराया जाता है. मान्यता है कि 108 बादाम की माला अर्पित करने से युवाओ की शादी में आ रही अड़चन दूर होती है. वहीं, विद्यार्थी ज्ञानवृद्धि और पढ़ाई में सफलता के लिए 108 मखानों की माला चढ़ाते हैं.

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मां सरस्वती की कृपा से पूरी होती हैं मनोकामनाएं

उल्लेखनीय है आस्था, शिक्षा और संस्कारों का यह अनोखा सरस्वती मंदिर को न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक विशिष्ट पहचान देता है. यही कारण है कि यह मंदिर विद्यार्थियों और श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां सरस्वती की कृपा से उनकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं.

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