सड़कों और खेतों में बढ़ते आवारा मवेशियों के संकट से निपटने के लिए मध्य प्रदेश सरकार की एक बड़ी योजना को केंद्र सरकार से सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है. राज्य सरकार ने करीब 40 लाख आवारा मवेशियों को अलग पहचान देने के लिए उनके कानों में 12 अंकों वाले केसरिया पहचान टैग लगाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे केंद्र ने सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया है. इस योजना के तहत मवेशियों के लिए अलग-अलग रंग के टैग लागू किए जाएंगे, जिनमें केसरिया और लाल जैसे रंग शामिल हो सकते हैं. इसका उद्देश्य पालतू और आवारा मवेशियों के बीच स्पष्ट अंतर करना है, ताकि प्रशासनिक टीमें उन्हें जल्दी पहचान सकें और बेहतर तरीके से प्रबंधन कर सकें.
अभी लगाए जाते हैं पीले टैग
पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव उमाकांत उमराव ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में सभी मवेशियों को पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं, जिससे यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पशु किसी किसान का है और कौन सा आवारा है. उमराव ने कहा, "अभी सभी मवेशियों पर पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन सा पशु पालतू है और कौन आवारा. इसलिए राज्य सरकार ने आवारा मवेशियों के लिए केसरिया या लाल जैसे अलग रंग के टैग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था."
इस योजना के तहत गोशालाओं में रहने वाले या सड़कों पर घूमने वाले हर आवारा या परित्यक्त पशु को भारत पशुधन परियोजना के तहत 12 अंकों का एक विशिष्ट पहचान टैग दिया जाएगा. यह परियोजना राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश के पशुधन का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना है.
स्कैन से तुरंत पता चलेगा पशु के बारे में
अधिकारियों के अनुसार, रंग-कोड वाले टैग से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाली टीमों को बिना स्कैन किए ही तुरंत यह पता चल सकेगा कि पशु आवारा है या पालतू. इससे मवेशियों के प्रबंधन की प्रक्रिया और तेज और प्रभावी होने की उम्मीद है.
यह कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है जब प्रदेश में आवारा मवेशियों की समस्या सड़क सुरक्षा और खेती दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है. विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार पिछले दो वर्षों में मवेशियों से जुड़े 237 सड़क हादसे दर्ज हुए, जिनमें 94 लोगों की मौत हुई और 133 लोग घायल हुए. यानी औसतन हर तीसरे दिन प्रदेश में मवेशियों से जुड़े सड़क हादसे में एक व्यक्ति की जान जा रही है.
किसान लगातार कर रहे हैं शिकायत
दूसरी ओर कई जिलों के किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं कि आवारा मवेशी उनकी खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर खरीफ के मौसम में. कई किसानों को रात-रात भर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है.
फसलों को हो रहे नुकसान के बावजूद सरकार ने यह स्वीकार किया है कि फिलहाल किसानों को ऐसी क्षति के लिए कोई मुआवजा देने की व्यवस्था नहीं है. शीतकालीन सत्र के दौरान पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने विधानसभा में बताया था कि विभाग आवारा मवेशियों से होने वाले फसल नुकसान का अलग से कोई आंकड़ा नहीं रखता और इसके लिए वित्तीय सहायता देने का कोई प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है.
पिछले साल पकड़े गए इतने आवारा पशु
समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025 में ही प्रदेश में 78,153 आवारा मवेशियों को पकड़ा गया. अपने पशु वापस लेने वाले मालिकों से कुल 25.58 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया.
मवेशियों को छोड़ देना गोहत्या प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत दंडनीय अपराध है. वहीं, नगर निगम अधिनियम 1956 में संशोधन के बाद ऐसे मामलों में पहली बार 200 रुपये, दूसरी बार 500 रुपये और तीसरी बार 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. साथ ही पशु को हिरासत में रखने के दौरान मालिक को प्रतिदिन 150 रुपये चारे के खर्च के रूप में भी देना होता है.
राज्य की गोशाला में बढ़ रहा दवाब
इधर, राज्य की गोशाला व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है. मुख्यमंत्री गौसेवा योजना के तहत एनजीओ और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर प्रदेश की पंजीकृत गोशालाओं में फिलहाल करीब 4.5 लाख मवेशी रखे गए हैं. इनके रखरखाव के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 296.20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है.
क्या ह रहे अधिकारी
अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या की जड़ मवेशियों की कम उत्पादकता भी है. पशुधन गणना के अनुसार प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत गायें कम दूध देने वाली नॉन-डिस्क्रिप्ट नस्ल की हैं, जिनमें से कई आधा लीटर से भी कम दूध देती हैं. जब ऐसे पशु दूध देना बंद कर देते हैं तो कई बार उन्हें छोड़ दिया जाता है और वे सड़कों या खेतों में भटकते हुए दिखाई देते हैं.
इसी समस्या को कम करने के लिए राज्य सरकार क्षीरधारा ग्राम योजना के तहत नस्ल सुधार कार्यक्रम चला रही है. इसके तहत पहले चरण में करीब 5,000 गांवों में मवेशियों की उत्पादकता बढ़ाने और परित्याग की समस्या कम करने पर काम किया जा रहा है.
इसके साथ ही पशुधन से जुड़े डाटा को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की दिशा में भी काम चल रहा है. पशुधन मोबाइल ऐप के माध्यम से मवेशियों की नस्ल, मालिक और आधारकार्ड जैसे पहचान से जुड़ी जानकारी को डिजिटल डाटाबेस से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है. अगर यह योजना पूरी तरह लागू होती है तो आने वाले समय में मध्य प्रदेश की सड़कों और गांवों में एक नई पहचान दिखाई दे सकती है किसी आवारा गाय के कान में लगा केसरिया टैग, जो उसकी पहचान के साथ-साथ राज्य में बढ़ते मवेशी संकट से निपटने की कोशिश का प्रतीक भी होगा.














