Chhindwara News: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के छिंदवाड़ा जिले से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है. दरअसल यहां एक शादी समारोह की खुशी उस वक्त चिंता में बदल गई, जब मेहमानों को पता चला कि उन्होंने अनजाने में 'रेबीज' संक्रमित गाय के दूध से बने उत्पादों का सेवन कर लिया है. छिंदवाड़ा जिले के भैंसादंड गांव में हुई इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया. लिहाजा, आनन-फानन में सामूहिक टीकाकरण अभियान शुरू करना पड़ा.
भैंसादंड गांव में आयोजित एक विवाह समारोह में बारातियों और स्थानीय मेहमानों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई थी. परंपरा के अनुसार, खाने के साथ दही और मट्ठा भी परोसा गया. समारोह के कुछ समय बाद यह जानकारी सामने आई कि जिस गाय के दूध का उपयोग इन डेयरी उत्पादों को बनाने के लिए किया गया था, वह गंभीर रूप से बीमार है. जांच करने पर पता चला कि गाय में रेबीज के स्पष्ट लक्षण दिखाई दे रहे हैं.
कुत्ते के काटने से संक्रमित हुई थी गाय
स्थानीय सूत्रों और जांच रिपोर्ट के अनुसार, उक्त गाय को कुछ दिनों पहले एक पागल कुत्ते ने काट लिया था. इसके बाद धीरे-धीरे गाय की स्थिति बिगड़ने लगी और उसमें रेबीज के लक्षण उभरने लगे. जैसे ही यह खबर गांव में फैली कि कुत्ते के काटने से बीमार हुई संक्रमित गाय का दूध शादी की दावत में इस्तेमाल हुआ था, इस खबर के फैलते ही मेहमानों, बारातियों और ग्रामीणों के बीच अफरा-तफरी का माहौल बन गया. दरअसल, रेबीज एक जानलेवा बीमारी है, जिसके कारण लोगों में डर समा गया.
स्वास्थ्य विभाग ने 200 से ज्यादा लोगों को लगाए टीके
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला स्वास्थ्य प्रशासन तुरंत सक्रिय हो गया. इसके बाद उप स्वास्थ्य केंद्र भैसादंड में आपातकालीन चिकित्सा कैंप लगाया गया. इस दौरान डॉक्टरों की टीम ने उन सभी लोगों की पहचान शुरू की, जिन्होंने दावत में मट्ठा या दही का सेवन किया था. अब तक कैंप के माध्यम से 200 से अधिक लोगों को रेबीज रोधी (Anti Rabies) इंजेक्शन लगाए जा चुके हैं. इसके साथ ही स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर बाकी संभावित लोगों की तलाश कर रहे हैं, ताकि संक्रमण के किसी भी खतरे को टाला जा सके.
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विशेषज्ञों का कहना है कि रेबीज संक्रमित पशु के कच्चे दूध या उससे बने उत्पादों का सेवन जोखिम भरा हो सकता है. हालांकि, स्वास्थ्य विभाग ने ग्रामीणों को धैर्य रखने की सलाह दी है और स्पष्ट किया है कि समय पर टीकाकरण ही इस स्थिति से बचने का एकमात्र सुरक्षित उपाय है. वर्तमान में गाय की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है और पशु चिकित्सा विभाग उसकी निगरानी कर रहा है.
इस पूरे मामले पर अमृतसर में तैनात वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी, डॉ. अमरप्रीत सिंह पन्नू ने बताया कि रेबीज का वायरस (जिसे लायसा वायरस बोलते हैं) बहुत ही कमज़ोर होता है. इसका मतलब यह है कि अगर पशु का सलाइवा (लार) धूप में डेढ़-दो घंटे पड़ा रहे, तो वायरस मर जाता है. यह वायरस दूध या यूरिन में भी आ सकता है, लेकिन इसकी सबसे ज़्यादा मात्रा सलाइवा में होती है. अगर किसी ने ऐसे पशु का दूध पी लिया है, तो मुख्य बात यह है कि दूध उबाला गया था या कच्चा था. अगर उबला हुआ था, तो वायरस लगभग 50 सेल्सियस तापमान पर ही मर जाता है. चूंकि हम दूध को पूरी तरह उबालकर पीते हैं, इसलिए उबले हुए या पाश्चराइज्ड दूध से संक्रमण का खतरा न के बराबर होता है. अगर दूध कच्चा पिया गया है और व्यक्ति के मुंह में छाले या कोई ज़ख़्म हैं, तो वायरस शरीर में प्रवेश कर सकता है. वहीं, उन्होंने लोगों को सलाह देते हुए कहा कि ऐसे में अगर आपने बाहर से दूध, दही या पनीर लिया है और आप सुनिश्चित नहीं हैं कि उसे ठीक से उबाला गया था या नहीं और बाद में पता चले कि वह पशु रैबिज (Rabies) था, तो वैक्सीनेशन ज़रूर करवा लें. रेबीज़ का एक बार लक्षण दिखने के बाद कोई इलाज नहीं है, इसलिए रिस्क न लें और समय पर इंजेक्शन लगवाएं, ताकि शरीर में एंटीबॉडी बन सकें.
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