'समुद्र की लहरें पीछे जाती दिखें तो किनारे पर घर मत बना लेना, मैं लौटकर आऊंगा.' 2023 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने यह बात शायराना अंदाज में कही थी. यह हार स्वीकार करने वाला बयान नहीं था, बल्कि राजनीतिक वापसी का ऐलान था. करीब चार महीने से उनकी तैयारियां भी इसी ओर इशारा कर रही थीं. वे लगातार दतिया में सक्रिय थे, कार्यकर्ताओं से मिल रहे थे, सभाएं कर रहे थे, पुरानी गलतियों के लिए माफी मांग रहे थे और यहां तक कि नामांकन पत्र भी खरीद चुके थे. लेकिन भाजपा ने आखिरी समय में उनकी वापसी का रास्ता रोक दिया.
दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के बजाय संघ पृष्ठभूमि वाले पूर्व संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया. इस एक फैसले ने दतिया के चुनाव को भाजपा बनाम कांग्रेस की सामान्य लड़ाई से बदलकर भाजपा बनाम भाजपा का राजनीतिक संघर्ष बना दिया है.
नरोत्तम समर्थकों का गुस्सा सड़कों पर आया
टिकट की घोषणा होते ही नरोत्तम समर्थकों का गुस्सा सड़कों पर आ गया. संगठन के कई पदाधिकारियों और पार्षदों ने इस्तीफे दे दिए. महिलाओं, व्यापारियों और कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया. ग्वालियर-झांसी मार्ग पर यातायात बाधित हुआ और देर रात तक हालात तनावपूर्ण बने रहे. अब पार्टी के सामने असली चुनौती कांग्रेस नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को दोबारा एक मंच पर लाना है.
नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों को पूरा भरोसा था कि टिकट उन्हीं को मिलेगा. 2023 की हार के बाद भी उन्होंने दतिया से दूरी नहीं बनाई. उपचुनाव की संभावना बनते ही उनकी सक्रियता और तेज हो गई. सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से चर्चा के बाद प्रदेश भाजपा की ओर से नरोत्तम मिश्रा का नाम केंद्रीय नेतृत्व को भेजा था. लेकिन दिल्ली में मिले फीडबैक, स्थानीय समीकरण और चुनावी सर्वे के आधार पर अंतिम फैसला बदल गया.
आखिर क्यों कट गया टिकट?
पार्टी ने इस बदलाव का आधिकारिक कारण नहीं बताया है, लेकिन भाजपा के भीतर इसे केवल चुनावी सर्वे का परिणाम नहीं माना जा रहा. यह फैसला सत्ता और संगठन के संतुलन से भी जोड़कर देखा जा रहा है. नरोत्तम मिश्रा शिवराज सरकार में केवल मंत्री नहीं थे. वे सरकार के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते थे और लंबे समय तक उन्हें सत्ता का नंबर दो माना गया.
यदि वे दतिया से जीतकर विधानसभा में लौटते, तो उनके मंत्री बनने की चर्चा स्वाभाविक रूप से शुरू होती. किसी बड़े विभाग की मांग और सरकार में उनकी भूमिका को लेकर नए समीकरण बनते. इससे मोहन यादव सरकार में एक और मजबूत शक्ति केंद्र उभर सकता था.
प्रदेश भाजपा की राजनीति में पहले से कई प्रभावशाली नेता मौजूद हैं. कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका में हैं. नरेंद्र सिंह तोमर विधानसभा अध्यक्ष हैं. शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया और वीडी शर्मा का भी प्रदेश की राजनीति पर प्रभाव बना हुआ है.
ऐसे में राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व एक और स्वतंत्र शक्ति केंद्र खड़ा करने से बचना चाहता था. हालांकि भाजपा ने इसे फैसले का कारण नहीं बताया है, लेकिन नरोत्तम की राजनीतिक हैसियत को देखते हुए इस संभावना को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता.
1.26 लाख लोग भाजपा में शामिल कराए
नरोत्तम मिश्रा की टिकट कटने का सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास उनके पिछले संगठनात्मक काम से जुड़ा है. विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा ने कांग्रेस और दूसरे दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल कराने के लिए “न्यू जॉइनिंग टीम” बनाई थी. इसकी जिम्मेदारी नरोत्तम मिश्रा को दी गई थी. उन्होंने दावा किया था कि इस अभियान के तहत करीब 1.26 लाख लोग भाजपा में शामिल हुए, जिनमें बड़ी संख्या कांग्रेस से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की थी.
यानी जिस नेता को भाजपा ने हजारों लोगों के लिए पार्टी के दरवाजे खोलने का जिम्मा दिया, वही नेता अब अपने पुराने गढ़ से चुनाव लड़ने का टिकट हासिल नहीं कर सका.
अपमानजनक मान रहे समर्थक
नरोत्तम समर्थक इसी विरोधाभास को सबसे अधिक अपमानजनक मान रहे हैं. उनका सवाल है कि यदि पार्टी को संगठन विस्तार, रणनीति और दल-बदल कराने के लिए उन पर भरोसा था, तो दतिया में चुनाव लड़ने के लिए उन पर भरोसा क्यों नहीं किया गया?
भाजपा ने ब्राह्मण समीकरण रखा बरकरार
भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को टिकट देकर ब्राह्मण समीकरण को बरकरार रखा है. दतिया में ब्राह्मण, जाटव और कुशवाहा मतदाता चुनावी परिणाम पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं. पार्टी ने एक ब्राह्मण नेता की जगह दूसरे ब्राह्मण नेता को उतारकर सामाजिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है.
आशुतोष तिवारी की ताकत और कमजोरी
आशुतोष तिवारी की पहचान चुनावी नेता से अधिक संगठन के व्यक्ति के रूप में रही है. संघ पृष्ठभूमि और लंबे संगठनात्मक अनुभव के कारण उन्हें अनुशासित और नेतृत्व के प्रति भरोसेमंद चेहरा माना जाता है. यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती भी है. वे पार्टी के उम्मीदवार तो हैं, पर दतिया में नरोत्तम मिश्रा जैसा निजी राजनीतिक नेटवर्क उनके पास नहीं है.
नरोत्तम मिश्रा ने वर्षों में दतिया में जिला स्तर से लेकर बूथ स्तर तक अपना मजबूत संगठन खड़ा किया है. इसमें पदाधिकारी, पार्षद, व्यापारी, स्थानीय नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हैं. यही कारण है कि टिकट कटने की प्रतिक्रिया केवल कुछ नेताओं तक सीमित नहीं रही. नाराजगी सीधे सड़क पर दिखाई दी. कई पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए. कार्यकर्ताओं ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ नारे लगाए. समर्थकों ने टिकट बदलने की मांग की. यह सब उस समय हुआ, जब चुनाव की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है.
खुली बगावत से बड़ा खतरा मौन असहयोग
भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा खुली बगावत से अधिक मौन असहयोग है. चुनाव में कार्यकर्ता यदि घर बैठ जाएं, बूथ प्रबंधन कमजोर कर दें या मतदाताओं को बाहर निकालने में रुचि न लें, तो इसका असर किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन से अधिक हो सकता है.
टिकट मिलने के बाद आशुतोष तिवारी ने टकराव के बजाय नरमी का रास्ता चुना. उन्होंने नरोत्तम मिश्रा को अपना अभिभावक और मार्गदर्शक बताया. उन्होंने कहा कि उन्हें नरोत्तम मिश्रा का आशीर्वाद प्राप्त है और उनका फोन भी आया था. पार्टी कार्यालय से निकलते समय उन्होंने नेताओं से कहा कि वे बड़ा दिल दिखाएं और उन्हें आशीर्वाद दें. अब सबकी नजर इस बात पर है कि नरोत्तम मिश्रा केवल औपचारिक समर्थन देते हैं या आशुतोष के लिए सक्रिय रूप से प्रचार भी करते हैं.
मुख्यमंत्री यादव ने दी बधाई
नाराजगी के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आशुतोष तिवारी को सार्वजनिक रूप से बधाई दी और अग्रिम जीत की शुभकामनाएं भी दीं. इस संदेश का राजनीतिक अर्थ स्पष्ट था. पार्टी नेतृत्व टिकट बदलने के दबाव में नहीं है और आशुतोष तिवारी ही भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार रहेंगे. अब रणनीति टिकट बदलने की नहीं, नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने की होगी. लेकिन यह काम आसान नहीं है. पार्टी को उन कार्यकर्ताओं से आशुतोष के लिए वोट और मेहनत मांगनी है, जो टिकट के फैसले को अपने नेता का अपमान मान रहे हैं.
दतिया उपचुनाव प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के कार्यकाल की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए भी यह प्रतिष्ठा का चुनाव बन गया है. नरोत्तम मिश्रा उम्मीदवार होते, तो चुनाव प्रबंधन का बड़ा हिस्सा उनके व्यक्तिगत प्रभाव और संगठन पर टिका होता. अब पूरी जिम्मेदारी प्रदेश नेतृत्व और भाजपा संगठन पर आ गई है. यदि आशुतोष जीतते हैं, तो पार्टी यह संदेश दे सकेगी कि भाजपा का संगठन किसी एक नेता से बड़ा है. लेकिन यदि पार्टी हारती है, तो यह सवाल उठेगा कि क्या भाजपा ने आंतरिक शक्ति संतुलन के लिए अपने सबसे मजबूत स्थानीय चेहरे को किनारे कर दिया.
NDTV से क्या बोले थे हेमंत खंडेलवाल
उम्मीदवार की घोषणा से दो दिन पहले NDTV ने हेमंत खंडेलवाल से पूछा था कि दतिया उपचुनाव भाजपा के लिए बड़ी परीक्षा है, लेकिन इस परीक्षा में पार्टी का परीक्षार्थी कौन होगा? इस पर हेमंत खंडेलवाल ने कहा था, “दतिया का उपचुनाव सामने है. प्रदेश के सभी प्रमुख नेताओं के साथ हमने इस विषय पर चर्चा की है कि वहां से प्रत्याशी कौन होगा. सभी के सुझाव केंद्रीय नेतृत्व को भेज दिए गए हैं. केंद्रीय नेतृत्व पार्टी के प्रमुख नेताओं के साथ विचार-विमर्श करके अंतिम निर्णय करेगा. जहां तक चुनौती का सवाल है, हम पूरी तरह तैयार हैं और भाजपा को चुनाव जिताने के लिए कमर कस चुके हैं.”
जब NDTV ने सीधे पूछा कि क्या डॉ. नरोत्तम मिश्रा उम्मीदवार होंगे, तो खंडेलवाल ने कहा, “यह कांग्रेस की सीट थी, जो अदालत के आदेश के बाद खाली हुई है. भाजपा निश्चित रूप से यह चुनाव जीतेगी. जनता ने पिछले दो वर्षों में हमारी सरकार का काम देखा है. मुझे पूरा विश्वास है कि प्रदेश और केंद्र सरकार ने जो काम किए हैं, जनता उन पर अपनी मुहर लगाएगी.”
खंडेलवाल के बयान से उस समय इतना जरूर साफ था कि प्रदेश नेतृत्व ने अपनी राय दिल्ली भेज दी थी, लेकिन उम्मीदवार पर अंतिम मुहर केंद्रीय नेतृत्व को लगानी थी. अब आशुतोष तिवारी के नाम की घोषणा के बाद यह चुनाव खंडेलवाल के संगठनात्मक नियंत्रण की भी परीक्षा बन गया है.
उन्हें केवल कांग्रेस को हराने की रणनीति नहीं बनानी है, बल्कि नाराज पदाधिकारियों को वापस लाना, नरोत्तम समर्थकों को सक्रिय करना और बूथ स्तर तक पार्टी को एकजुट रखना भी होगा. दतिया सीट पर मतदान 30 जुलाई को होगा. नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 13 जुलाई है. इसके बाद चुनाव प्रचार के लिए बहुत कम समय बचेगा.