MP में हर 8वां शख्स मानसिक रोगी! 90% को नहीं मिलता इलाज, हर घंटे दो लोग कर रहे आत्महत्या

मध्य प्रदेश में मानसिक बीमारी एक गंभीर संकट बन चुकी है. हर आठवां व्यक्ति किसी न किसी मानसिक रोग से पीड़ित है, लेकिन 90 फीसदी लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा. 2022 की एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार राज्य में हर घंटे लगभग दो लोग आत्महत्या कर रहे हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. (AI)
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  • MP में तेरह दशमलव नौ प्रतिशत आबादी मानसिक बीमारी से पीड़ित है, जो करीब एक करोड़ बारह लाख लोगों की संख्या है.
  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार राज्य में साल दो हजार बाईस में 15386 आत्महत्याएं दर्ज हुईं.
  • भोपाल में 1 लाख से अधिक लोग गंभीर मानसिक रोगों से जूझ रहे हैं, 250000 सामान्य मानसिक विकारों से प्रभावित हैं.
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MP Mental Health Crisis Data: मध्य प्रदेश में मानसिक बीमारी अब एक खामोश महामारी का रूप लेती जा रही है. सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि हालात बहुत गंभीर हैं. राज्य में हर आठवां व्यक्ति किसी न किसी मानसिक रोग से जूझ रहा है, लेकिन इलाज तक पहुंच बनाने में ज्यादातर लोग असफल हैं. नतीजा यह है कि डिप्रेशन, तनाव और अन्य मानसिक समस्याएं नशे, अपराध और आत्महत्या जैसी स्थितियों तक पहुंचा रही हैं. यह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि लाखों परिवारों का मौन दर्द है.

हर आठवां नागरिक मानसिक बीमारी का शिकार

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश की 13.9 फीसदी आबादी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है. यह संख्या करीब 1 करोड़ 12 लाख लोगों की है. इनमें से 12 लाख लोग सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, जबकि करीब 1 करोड़ लोग डिप्रेशन, तनाव और नींद न आने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं.

आत्महत्या के आंकड़े भी डरा रहे हैं

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश आत्महत्या के मामलों में देश में तीसरे स्थान पर है. राज्य में हर दिन औसतन 42 लोग, यानी हर घंटे लगभग दो लोग आत्महत्या कर रहे हैं. साल 2022 में कुल 15,386 आत्महत्याएं दर्ज की गईं.

राजधानी भोपाल में भी हालात चिंताजनक

सिर्फ भोपाल की बात करें तो यहां 1 लाख से ज्यादा गंभीर मानसिक रोगी हैं. इसके अलावा ढाई लाख लोग सामान्य मेंटल डिसऑर्डर से परेशान हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि तेजी से बदलती जीवनशैली, काम का दबाव और सामाजिक तनाव इसकी बड़ी वजहें हैं.

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इलाज तक नहीं पहुंच पा रहे 90% मरीज

स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि 90.7 फीसदी मानसिक रोगियों को इलाज ही नहीं मिल पाता. हमीदिया अस्पताल, भोपाल के मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. जे.पी. अग्रवाल बताते हैं कि जागरूकता की कमी और समाज में बदनामी के डर के कारण लोग बीमारी को छिपा लेते हैं. समय पर इलाज न मिलने से हालत और बिगड़ जाती है.

इलाज न मिलने से बढ़ रही परेशानी

इलाज से दूर रहना सिर्फ बीमारी को नहीं बढ़ाता, बल्कि इसके सामाजिक परिणाम भी सामने आते हैं. कई लोग तनाव से बचने के लिए नशे की ओर मुड़ जाते हैं, परिवारिक रिश्ते टूटते हैं और कुछ मामलों में मानसिक असंतुलन गंभीर अपराधों की वजह बन जाता है.

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काउंसलिंग और परिवार का साथ ही सहारा

विशेषज्ञों का मानना है कि काउंसलिंग, समय पर इलाज और परिवार का सहयोग इन तीन बातों से करीब 80 फीसदी मामलों में सुधार संभव है. लेकिन जब तक समाज मानसिक बीमारी को ‘पागलपन' की बजाय एक बीमारी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, तब तक हालात नहीं बदलेंगे.

मानसिक तनाव से शुरू होती है खतरनाक सोच

डॉ. जे.पी. अग्रवाल बताते हैं कि हल्का‑सा मानसिक तनाव भी अगर लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए, तो वह गंभीर मानसिक बीमारी में बदल सकता है. वहीं से शुरू होती है जिंदगी खत्म करने की सोच, जिसे समय रहते रोका जा सकता है बस जरूरत है सही माहौल और मदद की.

अब भी नहीं चेते तो बढ़ेगा खतरा

आंकड़े साफ चेतावनी दे रहे हैं कि मध्यप्रदेश में मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. हर आठवां व्यक्ति प्रभावित है, लेकिन इलाज 10 में से सिर्फ 1 तक ही पहुंच पा रहा है. अगर अब भी गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो यह खामोश महामारी न जाने कितने और घर उजाड़ देगी. 

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