14 महीनों में 149 तेंदुओं की मौत; RTI में बड़ा खुलासा, टाइगर स्टेट क्यों बन रहा तेंदुए का 'कब्रिस्तान' जानिए

Leopard Death MP: देश के सबसे बड़े ‘टाइगर स्टेट’ मध्यप्रदेश में तेंदुओं की सुरक्षा पर बड़ा सवाल. 14 महीनों में 149 मौतें, क्या विकास वन्यजीवों पर भारी पड़ रहा है?

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मध्यप्रदेश में 14 महीनों में 149 तेंदुओं की मौत (AI फोटो)

Leopard Deaths in MP: मध्यप्रदेश में वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, जनवरी 2025 से शुरू हुए 14 महीनों की अवधि में राज्य में कुल 149 तेंदुओं की मौत दर्ज की गई है. यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब मध्यप्रदेश देश में तेंदुओं की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है. मौतों के प्रमुख कारणों में सड़क दुर्घटनाएं, प्राकृतिक कारण, आपसी संघर्ष और अवैध शिकार शामिल हैं. जहां वन विभाग इन मौतों को स्वीकार्य सीमा के भीतर बता रहा है, वहीं वन्यजीव कार्यकर्ता इसे गंभीर संकट का संकेत मान रहे हैं.

आरटीआई से सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

आरटीआई आवेदन के जवाब में वन विभाग ने बताया कि जनवरी 2025 से 14 महीनों में 149 तेंदुओं की मौत हुई है. आरटीआई दायर करने वाले कार्यकर्ता अजय दुबे ने कहा कि यह आंकड़े राज्य में तेंदुओं के लिए बढ़ते खतरों की ओर इशारा करते हैं. उनका कहना है कि इतने कम समय में इतनी बड़ी संख्या में मौतें होना नीति और निगरानी दोनों पर सवाल खड़े करता है.

Leopard Death MP: मध्यप्रदेश में तेंदुओं की मौत

सड़क हादसे बने सबसे बड़ा कारण

वन विभाग की ओर से दिए गए विवरण के अनुसार, कुल मौतों में से 31 प्रतिशत मौतें सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुईं. इनमें से भी 19 प्रतिशत तेंदुओं की मौतें राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर दर्ज की गईं. विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों के बीच से गुजरने वाली सड़कों और तेज़ रफ्तार यातायात ने वन्यजीवों के लिए खतरा कई गुना बढ़ा दिया है.

प्राकृतिक कारण और आपसी संघर्ष

आरटीआई के अनुसार, 24 प्रतिशत तेंदुओं की मौत उम्र, बीमारी और अन्य प्राकृतिक कारणों से हुई. वहीं 21 प्रतिशत मौतें वन्यजीवों के आपसी संघर्ष के चलते दर्ज की गईं. वन अधिकारी मानते हैं कि तेंदुए बड़े क्षेत्रों में विचरण करते हैं और कई बार क्षेत्र विवाद के चलते संघर्ष की स्थिति बनती है.

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अवैध शिकार और बिजली करंट का खतरा

वन विभाग ने स्वीकार किया है कि करीब 14 प्रतिशत मौतों के लिए अवैध शिकार और प्रतिशोधी हत्याएं जिम्मेदार रहीं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि आठ तेंदुओं की मौत बिजली के करंट से हुई, जो जानबूझकर या लापरवाही के कारण लग सकता है. इसके अलावा दो तेंदुओं की मौत जाल में फंसने के कारण हुई.

कई मामलों में कारण अब भी अज्ञात

विभाग के अनुसार, करीब नौ प्रतिशत मामलों में तेंदुओं की मौत के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल सका है. यह स्थिति वन्यजीव निगरानी और पोस्टमार्टम व्यवस्था की कमजोरियों की ओर इशारा करती है.

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वन विभाग का पक्ष: सीमा के भीतर मृत्यु दर

अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एल. कृष्णमूर्ति ने कहा कि राज्य में तेंदुओं की मृत्यु दर को कम करने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि तेंदुए छोटे और फुर्तीले होते हैं और मानव बस्तियों के पास भी पाए जाते हैं, इसलिए जोखिम बना रहता है. वन विभाग का तर्क है कि लगभग 4,000 तेंदुओं की आबादी में 149 मौतें करीब चार प्रतिशत होती हैं, जो ‘बड़ी बिल्लियों' के लिए स्वीकार्य सीमा के भीतर है.

मृत्यु दर को कम करने की योजनाएं

कृष्णमूर्ति के अनुसार, नई सड़कों पर अंडरपास, वाइल्डलाइफ कॉरिडोर, चेतावनी संकेत और नियमित गश्त जैसे उपाय लागू किए जा रहे हैं. साथ ही सड़कों के किनारे जल स्रोत बनाने से बचने की सलाह दी जा रही है, ताकि जानवर सड़क की ओर आकर्षित न हों.

कार्यकर्ताओं का आरोप: ‘टाइगर स्टेट कब्रिस्तान बन रहा'

वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने वन विभाग और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि एनटीसीए प्रोटोकॉल को लागू करने में व्यवस्थित विफलता और सुरक्षित गलियारों की कमी के कारण तेंदुओं की मौतें बढ़ रही हैं. दुबे का कहना है कि सड़क, बिजली लाइन और अन्य रैखिक बुनियादी ढांचे से होने वाली मौतों पर किसी तरह की जवाबदेही तय नहीं की जा रही है, जिससे लापरवाही बढ़ रही है.

संख्या में वृद्धि, जोखिम भी ज्यादा

फरवरी 2024 में जारी ‘भारत में तेंदुओं की स्थिति 2022' रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश में तेंदुओं की संख्या 3,907 है, जो 2018 में 3,421 थी. संख्या में वृद्धि के साथ मानव‑वन्यजीव संघर्ष और दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ा है. जहां वन विभाग तेंदुओं की मौतों को स्वीकार्य सीमा में बताकर संतोष जता रहा है, वहीं आंकड़े यह स्पष्ट कर रहे हैं कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साधना अब सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. सवाल यही है कि क्या मौजूदा उपाय पर्याप्त हैं, या फिर ‘टाइगर स्टेट' को सच में अपनी वन्यजीव संरक्षण रणनीति पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है.

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