MP March Loan Hattrick: मध्यप्रदेश की आर्थिक सेहत को लेकर इन दिनों दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं. एक तरफ नीति आयोग ने अपनी 'Fiscal Health Index 2026' रिपोर्ट में राज्य को 'परफॉर्मर स्टेट' का दर्जा देकर थपथपाया है, तो दूसरी तरफ राज्य पर बढ़ता कर्ज का बोझ कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. मार्च के महीने में ही सरकार ने तीन किस्तों में कुल 16,200 करोड़ रुपये का नया कर्ज ले लिया है.
मार्च में उधारी की हैट्रिक
मार्च के महीने में सरकार ने उधारी की रफ्तार तेज कर दी है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, सरकार ने 4,100 करोड़ रुपये के दो अलग-अलग कर्ज लिए हैं.इससे पहले 3 मार्च को 6,300 करोड़ और 10 मार्च को 5,800 करोड़ रुपये का कर्ज लिया गया था. इस तरह सिर्फ एक महीने में ही 16,200 करोड़ की उधारी हो चुकी है. इस वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार का कुल कर्ज करीब 89,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जबकि प्रदेश पर कुल बकाया कर्ज अब 5.08 लाख करोड़ रुपये के पार निकल गया है.
राजस्व में उछाल फिर भी कर्ज
हैरानी की बात यह है कि उधारी तब बढ़ रही है जब राज्य के खजाने में टैक्स की आवक बेहतर हुई है. रिपोर्ट बताती है कि 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्य के कुल राजस्व में 58.5% और टैक्स कलेक्शन में 62.5% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. मध्यप्रदेश पिछले कुछ सालों से लगातार 'राजस्व अधिशेष' (Revenue Surplus) की स्थिति में है. इसके बावजूद हर दिन औसतन 125 करोड़ रुपये का कर्ज लेना वित्तीय प्रबंधन पर सवाल उठाता है.
कल्याणकारी योजनाओं का दबाव
राज्य के कुल राजस्व खर्च का करीब 43% हिस्सा पेंशन और ब्याज जैसे तय खर्चों में चला जाता है. इसके अलावा 'लाड़ली बहना' जैसी बड़ी योजनाओं का वित्तीय बोझ भी बढ़ रहा है. इस योजना पर सरकार हर महीने 1,890 करोड़ और सालाना लगभग 22,680 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. सरकार ने इस राशि को भविष्य में बढ़ाकर 3,000 रुपये प्रतिमाह करने का वादा किया है, जिससे आने वाले समय में खजाने पर दबाव और बढ़ना तय माना जा रहा है.
विकास बनाम फिजूलखर्ची पर रार
सरकार इस कर्ज को विकास की रणनीति का हिस्सा बता रही है. उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा का तर्क है कि यह उधारी बुनियादी ढांचे जैसे सड़क,सिंचाई,अस्पताल और स्कूलों के निर्माण के लिए ली जा रही है. सरकार का अनुमान है कि 2026-27 में पूंजीगत व्यय 1 लाख करोड़ के पार चला जाएगा. दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसे 'वित्तीय अनुशासनहीनता' करार दिया है. उनका आरोप है कि सरकार बजट का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रही है और इवेंटबाजी व भ्रष्टाचार के लिए कर्ज का बोझ बढ़ाया जा रहा है.
निवेश या आने वाला संकट
आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2025 में जो कर्ज 4.21 लाख करोड़ था, वह एक साल में बढ़कर 5 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है. केंद्र सरकार की 50 साल की ब्याज मुक्त ऋण योजना ने भी राज्यों को उधारी के लिए प्रोत्साहित किया है.अब सवाल यही है कि क्या मध्यप्रदेश वाकई एक मजबूत आर्थिक आधार तैयार कर रहा है या फिर विकास की यह ऊंची इमारत केवल उधारी की नींव पर टिकी है. यह आने वाला वक्त ही बताएगा कि यह कर्ज राज्य के लिए निवेश साबित होगा या बोझ?
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