MP में 'पेट्रोल का विकल्प' बनने चला था किसान ! अब मंडियों में MSP से आधी कीमत पर बिक रहा है मक्का

Corn Farmers Crisis: देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए मक्का उगाने वाले किसानों के साथ बड़ा छल. एथेनॉल नीति के भरोसे फसल बोने वाले अन्नदाता को मंडियों में MSP से 55% कम दाम मिल रहे हैं. लागत भी न निकलने से मध्यप्रदेश का किसान बेहाल है, जबकि जिम्मेदार जमीनी हकीकत से मुंह मोड़ रहे हैं.खेतों में मक्का, मंडियों में सन्नाटा: पेट्रोल का विकल्प बनने वाली फसल ने किसानों की कमर तोड़ी.

विज्ञापन
Read Time: 6 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • ईरान और इज़राइल के तनाव के कारण भारत में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की योजना बनाई गई थी
  • मध्यप्रदेश के किसानों को मक्का की फसल की लागत से भी कम कीमत मिल रही है, जिससे उन्हें भारी नुकसान हो रहा है
  • सरकार ने मक्का की एमएसपी 2400 रुपये तय की थी, लेकिन मंडी में औसत कीमत मात्र 1170 रुपये रह गई है
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

Corn MSP vs Market Price: ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया के तेल बाजार में हलचल पैदा कर दी है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से मंगवाता है, इसलिए जब भी सप्लाई रुकने या दाम बढ़ने का डर सताता है, तो विकल्प की तलाश तेज हो जाती है. सरकार ने इसी चुनौती से निपटने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाएगा. इस एथेनॉल को तैयार करने के लिए मक्के की खेती को जादुई समाधान के तौर पर पेश किया गया. किसानों से बड़े-बड़े वादे किए गए कि मक्का उगाइए, इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा भी पुख्ता होगी और आपकी जेबें भी भरेंगी. लेकिन जब आज यही मक्का मंडियों में पहुंचा है, तो हकीकत कुछ और ही सामने आ रही है. मध्यप्रदेश जैसे बड़े मक्का उत्पादक राज्यों में आज किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उनकी फसल के दाम लागत से भी नीचे गिर चुके हैं. इसी पूरी  स्थिति को साफ करने के लिए पढ़िए हमारे स्थानीय संपादक अनुराग द्वारी की ये ग्राउंड रिपोर्ट. 

मंडी के फर्श पर बिखरी उम्मीदें और पसीने की शून्य कीमत

भोपाल की करोंद मंडी के एक कोने में खड़ा किसान अपनी फसल नहीं, बल्कि अपनी उम्मीदों का जनाजा लेकर आया है. सरकार ने वादा किया था कि मक्का उगाने से जेब भरेगी, लेकिन आज वही मक्का औने-पौने दामों पर बिक रहा है. 3 एकड़ में मक्का बोने वाले किसान शुभम मालवीय की आंखों में गुस्सा और लाचारी दोनों है. वे बताते हैं, "करीब 60 हजार की लागत आई और मंडी में भाव मिल रहा है 1400-1500 रुपये. जबकि एमएसपी (MSP) 2400 रुपये है. इस भाव में हम क्या खाएंगे और क्या बचाएंगे? यह तो सीधे-सीधे घाटे का सौदा है." यह सिर्फ शुभम की कहानी नहीं है, बल्कि हर उस किसान की है जिसने सरकार के शब्दों पर भरोसा किया था.

लागत का बोझ और सरकारी वादों की हवा निकली

मक्के की खेती पसीने के साथ-साथ भारी निवेश भी मांगती है. डीजल, खाद, बीज और मजदूरी—सब कुछ महंगा हो चुका है. 10 एकड़ के काश्तकार अभिषेक मारण का दर्द भी यही है कि पेट्रोल-डीजल के दाम तो आसमान छू रहे हैं, लेकिन उनकी मेहनत की कीमत पाताल में है. 1300-1400 रुपये में मक्का बेचकर किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहा है. सीहोर के हर्ष नागर और मिथिलेश कुमार जाटव का आरोप और भी गंभीर है. उनका कहना है कि सरकार ने मक्का उगाने के लिए तो उकसा दिया, लेकिन जब बेचने की बारी आई तो न तो कहीं पंजीयन (Registration) है और न ही सरकारी खरीद. व्यापारी किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर फसल को लूट रहे हैं. 2400 रुपये की एमएसपी के मुकाबले किसान को हर क्विंटल पर 800 रुपये से ज्यादा का चूना लग रहा है.

आंकड़ों की बाजीगरी और हकीकत का कड़वा गणित

मध्यप्रदेश देश के कुल मक्का उत्पादन में 15 प्रतिशत से ज्यादा की हिस्सेदारी रखता है. 15 लाख किसान इस उम्मीद में मक्का उगाने लगे कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की नीति उन्हें मालामाल कर देगी. तेल कंपनियों ने बोनस का लालच दिया, सरकार ने समर्थन मूल्य बढ़ाया और नतीजा यह हुआ कि राज्य में मक्के का रकबा बढ़कर 7 लाख हेक्टेयर हो गया. लेकिन अब खेल देखिए—जहां एमएसपी 2400 रुपये है, वहां मंडी का औसत भाव महज 1170 रुपये रह गया है. यानी किसान को तय कीमत का मात्र 49 प्रतिशत ही मिल रहा है. CACP के मुताबिक उत्पादन लागत 1508 रुपये है, यानी किसान अपनी जेब से 338 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान सहकर देश को 'ऊर्जा सुरक्षा' दे रहा है. समर्थन मूल्य के बावजूद किसान को हर क्विंटल पर 1230 रुपये का घाटा हो रहा है.

Advertisement

सियासी चुप्पी और जिम्मेदारी से भागते जिम्मेदार

जब बाजार टूटता है, तो वजहें गिनाई जाती हैं—बंपर पैदावार, एक्सपोर्ट में गिरावट और एथेनॉल में टूटे चावल का इस्तेमाल. लेकिन जब समाधान की बात आती है, तो सत्ता के गलियारे खामोश हो जाते हैं. व्यापारी राघव गुप्ता कहते हैं कि पिछले साल मक्का 2500 तक बिका था, लेकिन इस साल एक्सपोर्ट बंद होने से भाव गिर गए हैं और सरकार एमएसपी पर खरीद नहीं कर रही है. हद तो तब हो जाती है जब देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से इस पर सवाल होता है और वे 'बाद में बात करने' की बात कहकर निकल जाते हैं. वहीं प्रदेश के कृषि मंत्री ऐंदल सिंह कंसाना तो जमीनी हकीकत से ही इनकार कर देते हैं. उनका कहना है कि 'अन्नदाता खुश है और कोई दिक्कत नहीं है'. उनके इस बयान पर कांग्रेस नेता केदार सिरोही तंज कसते हैं कि मंत्री जी को एक बार मंडी आकर किसानों का हाल देखना चाहिए, तब पता चलेगा कि किसान 1200 रुपये में फसल बेचने को मजबूर है.

क्या मक्का उगाना किसानों की सबसे बड़ी गलती थी?

मक्का ऐसी फसल है जिसमें नमी ज्यादा होती है, अगर इसे तुरंत न बेचा जाए तो यह खराब होने लगती है. इसी मजबूरी का फायदा बाजार उठा रहा है. किसान आज मौसम से भी लड़ रहा है, खाद-बीज की महंगाई से भी और अब अपनी ही सरकार की नीतियों से भी. जिस किसान ने देश को एथेनॉल देने का भरोसा किया, आज वह मंडी के किसी कोने में बैठकर हिसाब लगा रहा है कि अगली बार वह क्या बोएगा. क्या सरकार सिर्फ मक्का उगाने का लक्ष्य देगी या उसकी खरीद की जिम्मेदारी भी उठाएगी? आज मध्यप्रदेश का हर मक्का उत्पादक किसान इसी सवाल के साथ खड़ा है कि क्या सरकार का भरोसा करना ही उसकी सबसे बड़ी भूल थी. जानकार भी यही कहते हैं कि अगर सरकार मक्का उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है तो उसे उसकी खरीद की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए ... क्योंकि जब फसल का दाम मेहनत से भी कम हो जाए तो खेत में उगाया गया हर दाना किसान को अपनी मेहनत नहीं बल्कि अपना नुकसान याद दिलाता है. 
ये भी पढ़ें: Nsap Pension: नहीं बढ़ेगी बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों की पेंशन, एमपी के 22.5 लाख पेंशनर्स को लगा झटका

Advertisement
Featured Video Of The Day
Cuttack Hospital Fire | Odisha के हॉस्पिटल में लगी भीषण आग, 10 मरीजों की मौत | BREAKING NEWS