Women Waste Collectors Struggle: सुबह की पहली किरण के साथ जब लोग अपने घरों से निकलने की तैयारी करते हैं, उसी समय महासमुंद नगर पालिका की 117 महिला सफाई दीदियां शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी उठाकर सड़कों पर उतर जाती हैं. तेज धूप हो, हड्डियां कंपा देने वाली ठंड या मूसलाधार बारिश, इनका काम कभी नहीं रुकता. ये महिलाएं घर-घर जाकर गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र करती हैं, भारी रिक्शा चलाकर उसे कई किलोमीटर दूर मणिकंचन केंद्र तक पहुंचाती हैं और घंटों कचरे की छंटाई करती हैं. लेकिन विडंबना यह है कि शहर को साफ रखने वाली इन महिलाओं की जिंदगी खुद बदहाली, बीमारी और आर्थिक तंगी से घिरी हुई है. NDTV इसी दर्द को जानने के लिए शहर की सफाई दीदियों के पास गया और उनकी कहानी सुनी. इसके साथ ही जिम्मेदारों से सवाल भी पूछे, पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट.
Chhattisgarh Sanitation Workers: सफाई दीदी
सुबह से शाम तक संघर्ष भरी ड्यूटी
NDTV की टीम ने एक पूरा दिन सफाई कर्मियों को दिया. हमने अपनी रिपोर्ट में पाया कि महासमुंद नगर पालिका क्षेत्र की करीब 117 सफाई दीदियां रोजाना सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक काम करती हैं. उनकी जिम्मेदारी करीब 80 हजार आबादी वाले शहर के लगभग 10 हजार घरों से कचरा एकत्र करना है.
सफाई दीदियां अपने पैडल रिक्शा और ई-रिक्शा लेकर गलियों और मोहल्लों में पहुंचती हैं, जहां वे घर-घर से सूखा और गीला कचरा अलग-अलग उठाकर रिक्शे में भरती हैं. इसके बाद कचरे को शहर से 2 से 3 किलोमीटर दूर स्थित मणिकंचन केंद्र तक ले जाया जाता है.
तपती सड़कें और बदबू के बीच काम
NDTV ने देखा कि इन महिलाओं का काम केवल कचरा उठाने तक सीमित नहीं है. उन्हें घंटों तक गंदगी और बदबू के बीच रहना पड़ता है. तेज धूप में रिक्शा चलाना, बारिश में भीगते हुए काम करना और खराब सड़कों पर भारी वाहन खींचना उनके रोजमर्रा का हिस्सा है. उबड़-खाबड़ रास्तों के कारण कई बार रिक्शा पलट जाते हैं, जिससे चोट और दुर्घटना का खतरा बना रहता है.
Chhattisgarh Sanitation Workers: तेज धूप में कचरा गाड़ी चलाती सफाई दीदी
बीमारी बन रही जिंदगी का हिस्सा
लगातार कठिन परिस्थितियों में काम करने की वजह से अधिकांश सफाई दीदियां शारीरिक समस्याओं का सामना कर रही हैं. कई महिलाओं को चक्कर आना, सिरदर्द, ब्लड प्रेशर, कमजोरी और थकान जैसी दिक्कतें बनी रहती हैं. सफाई दीदी लक्ष्मी निर्मलकर बताती हैं कि भीषण गर्मी में कई बार हालत इतनी खराब हो जाती है कि काम करना मुश्किल हो जाता है, लेकिन मजबूरी में ड्यूटी जारी रखनी पड़ती है.
“वेतन कम, खर्च ज्यादा”
सबसे बड़ी परेशानी उनका बेहद कम वेतन है. सफाई दीदियों को हर महीने केवल 8 हजार रुपये मानदेय मिलता है. दर्दनाक बात यह है कि इसी पैसे से उन्हें अपने पैडल रिक्शा और ई-रिक्शा की मरम्मत भी करवानी पड़ती है. सफाई दीदी सातो साहू का कहना है कि हर महीने 1500 से 2000 रुपये वाहन की रिपेयरिंग में ही खर्च हो जाते हैं. इसके बाद घर चलाना बेहद मुश्किल हो जाता है.
कचरे के ढेर के बीच घंटों काम
NDTV की टीम ने देखा कि मणिकंचन केंद्र पहुंचने के बाद भी उनका काम खत्म नहीं होता. यहां घंटों तक कचरे की छंटाई की जाती है. सूखे और गीले कचरे को अलग करना, प्लास्टिक और अन्य सामग्री छांटना बेहद कठिन और अस्वास्थ्यकर काम है. गंदगी और बदबू के बीच ये महिलाएं लगातार शहर को स्वच्छ रखने में जुटी रहती हैं.
Chhattisgarh Sanitation Workers: महासमुंद की सफाई दीदी
सम्मान से ज्यादा मिलता है दुर्व्यवहार
सिर्फ शारीरिक परेशानी ही नहीं, कई महिलाओं को अधिकारियों और प्रभारियों के दुर्व्यवहार का सामना भी करना पड़ता है. महिलाओं का कहना है कि समस्याएं बताने पर अक्सर उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता. इसके बावजूद परिवार की आर्थिक जरूरतों के कारण वे काम छोड़ नहीं पातीं.
बदलते मौसम में समय बदलने की मांग
महिलाएं लंबे समय से मांग कर रही हैं कि भीषण गर्मी और बारिश के दौरान उनके काम का समय बदला जाए. उनका कहना है कि सुबह जल्दी या शाम के समय काम कराया जाए, ताकि तेज धूप से राहत मिल सके. साथ ही ई-रिक्शा और पैडल रिक्शा का रखरखाव नगर पालिका द्वारा कराने की मांग भी लगातार उठाई जा रही है.
Chhattisgarh Sanitation Workers: महासमुंद नगर पालिका परिषद
नगर पालिका उपाध्यक्ष ने किया समर्थन
जब हमने जिम्मेदारों से सवाल किया तो नगर पालिका उपाध्यक्ष देवीचंद राठी ने सफाई दीदियों की मांगों को जायज बताया है. उन्होंने कहा कि इस संबंध में कलेक्टर से चर्चा की गई है और महिलाओं के काम के समय में बदलाव सहित अन्य समस्याओं के समाधान का आग्रह किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं के साथ किसी प्रकार का दुर्व्यवहार नहीं होना चाहिए.
CMO ने दिया समाधान का आश्वासन
नगर पालिका CMO मनोज के खांडे ने भी माना कि सफाई दीदियों की मांगें उचित हैं. उन्होंने कहा कि शासन और कलेक्टर स्तर पर चर्चा कर समस्याओं का समाधान किया जाएगा. CMO ने यह भी आश्वासन दिया कि भविष्य में ई-रिक्शा और पैडल रिक्शा के मेंटेनेंस का खर्च नगर पालिका उठाने पर विचार करेगी.
शहर की सफाई का बोझ, लेकिन जिंदगी बदहाल
महासमुंद शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी उठाने वाली ये महिलाएं खुद अभाव और संघर्ष की जिंदगी जी रही हैं. ये महिलाएं शहर की स्वच्छता व्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनके श्रम और स्वास्थ्य को वह सम्मान और सुरक्षा आज तक नहीं मिल पाई जिसकी वे हकदार हैं.
सवाल सिस्टम से भी
यह कहानी सिर्फ 117 महिलाओं की नहीं, बल्कि उन हजारों सफाई कर्मियों की है जो शहरों को स्वच्छ रखने के लिए अपनी सेहत और जिंदगी दांव पर लगा देते हैं. सवाल यह है कि क्या “स्वच्छ शहर” का सपना उन हाथों की सुरक्षा और सम्मान के बिना पूरा हो सकता है, जो हर दिन गंदगी के बीच काम करके शहर को साफ रखते हैं?
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