Mahabharat Samagam Bhopal: वैश्विक सभ्यताओं के संघर्ष और औदार्य की महागाथा महाभारत (Mahabharat Samagam) पर केन्द्रित देश का पहला और अब तक का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन भोपाल के भारत भवन में 16 से 24 जनवरी 2026 तक आयोजित होगा. इस नौ दिवसीय समागम में महाभारत को लेकर नाटक, नृत्य-नाट्य, कठपुतली वर्कशॉप, लोक एवं शास्त्रीय प्रस्तुतियां, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, इमर्सिव डोम थियेटर के जरिए युद्ध के खिलाफ शांति का संदेश दिया जायेगा. अधिकारियों ने बताया कि इस दौरान पर प्रदर्शनी नेपथ्य, अस्त्र-शस्त्र, चक्रव्यूह एवं पताकाएँ, महाभारत आधारित चित्र प्रदर्शनी, भारतीय कठपुतली तथा प्रकाशनों सभ्यताओं की सांस (वैश्विक कविताओं का संकलन), भूली बिसरी सभ्यताएँ पुस्तकों का लोकार्पण भी होगा. इस समागम का शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव (CM Mohan Yadav) द्वारा किया जाएगा. वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित यह आयोजन महाभारत को केवल युद्ध कथा के रूप में नहीं, बल्कि शांति, करुणा और सभ्यतागत विवेक के महाकाव्य के रूप में प्रस्तुत करेगा.
श्रीकृष्ण का संदेश आज के समय में भी प्रभावी : श्रीराम तिवारी
वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने बताया कि आज रूस, चीन, अमेरिका, यूक्रेन, ईरान, इराक, वेनेजुएला, क्यूबा, बांग्लोदश, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया युद्ध, हिंसा और टूटती सभ्यताओं की पीडा से गुजर रही है, ऐसे समय में महाभारत हमें आत्ममंथन और शांति का मार्ग दिखाता है. सभ्यताओं के संघर्ष और औदार्य की इस महागाथा में युद्ध की अनिवार्यता के साथ-साथ उसके दुष्परिणामों का भी गहन बोध है. न्यासी सचिव ने कहा कि वास्तव में श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध को रोकने के लिए अपने जीवन के सर्वाधिक गंभीर और करुण प्रयास किए. उन्होंने बल नहीं, बल्कि संवाद को प्राथमिकता दी; अस्त्र नहीं, बल्कि विवेक को आगे रखा. शांति-दूत बनकर वे हस्तिनापुर गए और कौरवों से केवल पाँच गाँव माँगकर यह सिद्ध किया कि धर्म का मार्ग त्याग और सहमति से होकर जाता है. श्रीकृष्ण का संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक है. वे सिखाते हैं कि युद्ध कभी पहली पसंद नहीं होनी चाहिए, और जब संघर्ष अनिवार्य हो जाए, तब भी उसका उद्देश्य विनाश नहीं, बल्कि न्याय और लोककल्याण होना चाहिए. महाभारत में श्रीकृष्ण का प्रयास मानवता के लिए शांति, संवाद और विवेक की अमर सीख है. उन्होंने बताया कि महाभारत युद्ध में 185 से अधिक जनजातियां शामिल थीं.
इन देशों की प्रस्तुति
न्यासी सचिव ने कहा कि वैश्विक सभ्यताओं का इतिहास संघर्ष और औदार्य की साझा गाथा है. संघर्ष ने उन्हें दृढ़ता, साहस और पहचान दी, जबकि औदार्य ने सहअस्तित्व, करुणा और संवाद सिखाया. टकराव के बीच भी संस्कृतियाँ एक-दूसरे से सीखती रहीं और मानवता को आगे बढ़ाया. इसी उद्देश्य से भारत के साथ इंडोनेशिया, श्रीलंका, जापान के प्रतिष्ठित नाट्य समूह अपनी-अपनी प्रस्तुतियाँ देंगे. श्रीराम तिवारी ने कहा कि वीर भारत न्यास के उद्देश्यों के अनुरूप आने वाले वर्षों में इस समागम को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विस्तार किया जायेगा.
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