MP HighCourt Verdict on freedom of Speech: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सरकारी शिक्षक फैजान अंसारी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है. इस मामले में हाईकोर्ट ने कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी की व्यक्तिगत नाराजगी किसी साहित्यिक कृति को अपराध नहीं बना सकती है. यह पूरा मामला व्हाट्सएप स्टेटस पर लगाई गई मात्र 2 मिनट 21 सेकंड की एक उर्दू नज़्म से शुरू हुआ था, जिसकी वजह से पूरे बैतूल जिले में भारी विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस ने शख्त कार्रवाई करते हुए मामला दर्ज करने के साथ ही शिक्षक का मोबाइल भी जब्त कर लिया था.
एमपी राज्य कर्मचारी संघ के दबाव में हुई थी कार्रवाई
यह पूरा मामला 22 जुलाई 2025 का है, जब हर्राधना (डुधिया) प्राथमिक विद्यालय में पदस्थ संविदा शिक्षक फैजान अंसारी ने एक मुशायरे का वीडियो अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर लगाया था. 'बेहया' शीर्षक वाली यह नज़्म महिलाओं के अधिकारों, पितृसत्ता और सामाजिक नियंत्रण पर आधारित थी. हालांकि, इस पोस्ट के बाद विवाद खड़ा हो गया. मध्य प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के जिला अध्यक्ष सचिन राय के नेतृत्व में कर्मचारियों ने चिचोली थाने का घेराव कर विरोध प्रदर्शन किया. इसके बाद शिकायत में आरोप लगाया गया कि यह वीडियो महिलाओं के प्रति अपमानजनक है और इससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है. दबाव में आई पुलिस ने भी भारतीय न्याय संहिता की धारा 353(2) के तहत मामला दर्ज कर अंसारी का मोबाइल फोन जब्त कर लिया.
"साहित्य कोई अपराध नहीं है"
अब इस मामले की सुनवाई करते हुए जबलपुर हाईकोर्ट के जज बीपी शर्मा ने एक स्पष्ट संवैधानिक लकीर खींच दी है. अदालत ने पाया कि उक्त नज़्म उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित मंच 'रेख्ता' पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है. कोर्ट ने इसे महिलाओं के मानवाधिकारों और शोषण पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी माना. इसके साथ ही अदालत ने यह भी पाया कि इस कविता में किसी धर्म, समुदाय या वर्ग पर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हमला नहीं किया गया था. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अंसारी ने बिना किसी भड़काऊ टिप्पणी या संदेश के केवल इस वीडियो को साझा किया था, जिससे हिंसा भड़काने का कोई इरादा सिद्ध नहीं होता.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि किसी कलात्मक अभिव्यक्ति पर आपराधिक मामला तभी चलाया जा सकता है, जब उसमें हिंसा या नफरत फैलाने का स्पष्ट इरादा हो. केवल किसी की भावनाओं के आहत होने या आशंका के आधार पर कानूनी कार्रवाई करना गलत है. अदालत ने एफआईआर के बाद अंसारी को झेलनी पड़ी मानसिक प्रताड़ना, धमकियों और ट्रोलिंग का भी संज्ञान लिया. कोर्ट ने बैतूल एसपी को निर्देश दिया कि शिक्षक को आवश्यक सुरक्षा प्रदान की जाए और चिचोली पुलिस को उनका जब्त मोबाइल तुरंत वापस करने का आदेश भी दिया.














