- इंदौर में दूषित पानी से संक्रमण के कारण 70 वर्षीय उर्मिला यादव की मृत्यु हो गई, जो पूरी तरह स्वस्थ थीं.
- उर्मिला यादव के पोते को भी दूषित पानी से संक्रमण हुआ, जिसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और अभी ठीक नहीं है.
- इलाके में हफ्ते भर से गंदा पानी आ रहा था, कई शिकायतों के बाद भी सरकारी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.
Indore Contaminated Water Tragedy: उर्मिला यादव बिल्कुल ठीक थीं. न चलने में दिक्कत, न सांस में, न किसी बीमारी की परछाईं. उनकी उम्र सत्तर थी, लेकिन चाल में जीवन था. ग्यारह महीने पहले घर में रौनक आई थी शादी के पंद्रह साल बाद बेटे संजय के यहां बेटा पैदा हुआ था. उर्मिला पहली बार दादी बनी थीं. लेकिन दादी बनने का सुख उन्हें ज्यादा दिन नसीब नहीं हुआ.
शुक्रवार की शाम उन्हें उल्टियां शुरू हुईं. उसके बाद दस्त, शनिवार सुबह पेशे से दर्जी संजय यादव उन्हें क्लॉथ मार्केट अस्पताल ले गया. एक दिन आईसीयू में रहीं. रविवार सुबह ग्यारह बजे उनकी सांसें थम गईं. डॉक्टरों ने कोशिश की, लेकिन संक्रमण तेज था. शरीर जवाब दे गया.
पानी से आया संक्रमण
परिवार कहता है कि यह संक्रमण पानी से आया. संजय कहते हैं कि मां बिल्कुल स्वस्थ थीं, किसी तरह की बीमारी नहीं थी. दूषित पानी पीने के बाद हालत गिरती चली गई. उसी पानी से उनका ग्यारह महीने का बेटा भी बीमार पड़ा. उसे चाचा नेहरू अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. आज छुट्टी मिली है. हालत अभी भी ठीक नहीं है. संजय कहते हैं, 'वो बच्चा बहुत मान का है, पंद्रह साल बाद हुआ है. मां सिर्फ आठ-दस महीने ही अपने पोते के साथ खेल पाईं.'
हफ्ते भर से गंदा पानी आ रहा था
इलाके में हफ्ते भर से गंदा पानी आ रहा था. कहीं ड्रेनेज खुदी थी, कहीं पाइप लाइन. कहीं किसी ने ध्यान नहीं दिया. संजय कहते हैं कि हमने शिकायत की थी, लेकिन किसी ने नहीं सुनी. अस्पताल में भी कोई मदद नहीं मिली. वो कहते हैं कि 22 घंटे में 40 हजार रुपये भर दिए, कर्ज लेकर. सारे बिल मेरे पास हैं. सबूत हैं. फिर भी मां को बचा नहीं पाया.
उर्मिला यादव की मौत के बाद उनके घर में मातम पसरा है.
सरकार की तरफ से कोई नहीं आया- संजय
संजय बताते हैं कि सरकार की तरफ से कोई नहीं आया. कुछ लोग कांग्रेस से आए, आश्वासन देकर चले गए. कोई अफसर, कोई मंत्री, कोई नेता घर नहीं आया. नेता चौक पर बैठे हैं, बुला रहे हैं कि वहां आओ. अब हम मां का पूजा कार्यक्रम करें या वहां जाएं? संजय पूछते हैं कि मैंने मुखाग्नि दी है. तीन दिन तो कहीं जा भी नहीं सकता. उन्हें यहां आना चाहिए था.
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पोते के साथ खेल भी नहीं पाई मां
घर में अभी भी पूजा की तैयारी है. अगरबत्ती की खुशबू है. एक कोने में बच्चे का झूला है, दादी नहीं है. संजय कहते हैं कि मां सिर्फ दादी बन पाई थीं, पोते के साथ खेल भी नहीं पाई और सरकार को ये भी नहीं दिखा कि किसी के घर में क्या टूटा है.
यह कहानी सिर्फ उर्मिला यादव की नहीं है. यह उस शहर की है जो खुद को सबसे साफ कहता है और उन घरों की है जहां अब साफ पानी से ज्यादा साफ जवाब की जरूरत है. क्योंकि जब मां पानी से मर जाए तो सवाल सिर्फ बीमारी का नहीं होता. सिस्टम का होता है.
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